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गंभीर बीमारियों की वजह बन रही नाइट शिफ्ट की नौकरी
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तीन दिवसीय सम्मेलन की शुरुआत करते एपीआई के पदाधिकारी।
नोएडा। नाइट शिफ्ट (रात्रि पाली) में काम करना मानसिक और शारीरिक दोनों ही तरह से शरीर को नुकसान पहुंचा रहा है। मल्टीनेशनल कंपनियां हों या फिर हेल्थ सेक्टर, यहां रात्रि पाली में काम करने वाले लोगों की सेहत पर बुरा असर पड़ा है। सामान्य लोगों की अपेक्षा इनमें दिल, किडनी और कैंसर जैसी बड़ी बीमारियों का खतरा बढ़ा है। साथ ही, हाइपरटेंशन और मधुमेह भी ऐसे लोगों को तेजी से जकड़ रहा है। वर्ल्ड कांग्रेस ऑन क्रोनोमेडिसिन-2021 के 7वें संस्करण के तहत वार्षिक सम्मेलन में विशेषज्ञों ने नाइट शिफ्ट में काम करने वाले युवाओं के गिरते स्वास्थ्य स्तर पर अपनी राय रखी।
तीन दिवसीय सम्मेलन में दिल्ली-एनसीआर के अलावा देशभर से 250 विशेषज्ञ चर्चा के लिए पहुंच रहे हैं। वर्चुअल माध्यम से भी विदेशी डॉक्टर और बायोलॉजिस्ट कई जानकारियां साझा करेंगे। एसोसिएशन ऑफ फिजिशियन ऑफ इंडिया (एपीआई) के संयुक्त सचिव एवं मेट्रो अस्पताल के इंटरनल मेडिसिन एक्सपर्ट डॉ. एस चक्रवर्ती, आयोजन समिति की साइंटिफिक चेयरमैन डॉ. मीनाक्षी जैन व आयोजन समिति के सचिव डॉ. एके शुक्ला ने पहले दिन सत्र की औपचारिक शुरुआत की। डॉ. एसवी मधु ने कहा कि रात और दिन की पाली में काम करने वाले स्वास्थ्यकर्मियों के दो ग्रुप पर शोध किया गया। एक वर्ष या इससे ज्यादा समय तक रात्रि पाली में काम करने वाले लोगों में हृदयाघात का खतरा अधिक पाया गया।
ज्यादातर लोग हाइपरटेंशन और मधुमेह टाइप-टू से पीड़ित मिले। डॉ. एके शुक्ला ने कहा कि बदलती जीवनशैली के कारण लोगों को कई तरह की बीमारियां हो रही हैं। रात को देर तक जागने की वजह बच्चों के दिमागी विकास में बाधा बन रही है। जबकि, बड़ों के काम करने की क्षमता प्रभावित हो रही है। बच्चों के लिए रात में कम से कम 9.5 घंटे और व्यस्कों के लिए 7.5 घंटे की नींद जरूरी है। विशेषज्ञों ने बताया कि जब व्यक्ति सुबह के समय उठता है तो उसका ब्लड प्रेशर बढ़ा होता है। वहीं, रात के समय कम होता है। इससे सुबह के समय दिल के दौरे ज्यादा पड़ते हैं। विशेषज्ञों ने कहा कि सुबह और रात को शारीरिक गतिविधियां बदलती हैं। मेडिकल साइंस ही नहीं बीमारियां और उनसे लड़ने का तरीका भी बदल रहा है। डॉ. सौरभ श्रीवास्तव, डॉ. मीनाक्षी सिंह, डॉ. वंदना गर्ग आदि अपनी राय रखी।
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तीन दिवसीय सम्मेलन में दिल्ली-एनसीआर के अलावा देशभर से 250 विशेषज्ञ चर्चा के लिए पहुंच रहे हैं। वर्चुअल माध्यम से भी विदेशी डॉक्टर और बायोलॉजिस्ट कई जानकारियां साझा करेंगे। एसोसिएशन ऑफ फिजिशियन ऑफ इंडिया (एपीआई) के संयुक्त सचिव एवं मेट्रो अस्पताल के इंटरनल मेडिसिन एक्सपर्ट डॉ. एस चक्रवर्ती, आयोजन समिति की साइंटिफिक चेयरमैन डॉ. मीनाक्षी जैन व आयोजन समिति के सचिव डॉ. एके शुक्ला ने पहले दिन सत्र की औपचारिक शुरुआत की। डॉ. एसवी मधु ने कहा कि रात और दिन की पाली में काम करने वाले स्वास्थ्यकर्मियों के दो ग्रुप पर शोध किया गया। एक वर्ष या इससे ज्यादा समय तक रात्रि पाली में काम करने वाले लोगों में हृदयाघात का खतरा अधिक पाया गया।
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ज्यादातर लोग हाइपरटेंशन और मधुमेह टाइप-टू से पीड़ित मिले। डॉ. एके शुक्ला ने कहा कि बदलती जीवनशैली के कारण लोगों को कई तरह की बीमारियां हो रही हैं। रात को देर तक जागने की वजह बच्चों के दिमागी विकास में बाधा बन रही है। जबकि, बड़ों के काम करने की क्षमता प्रभावित हो रही है। बच्चों के लिए रात में कम से कम 9.5 घंटे और व्यस्कों के लिए 7.5 घंटे की नींद जरूरी है। विशेषज्ञों ने बताया कि जब व्यक्ति सुबह के समय उठता है तो उसका ब्लड प्रेशर बढ़ा होता है। वहीं, रात के समय कम होता है। इससे सुबह के समय दिल के दौरे ज्यादा पड़ते हैं। विशेषज्ञों ने कहा कि सुबह और रात को शारीरिक गतिविधियां बदलती हैं। मेडिकल साइंस ही नहीं बीमारियां और उनसे लड़ने का तरीका भी बदल रहा है। डॉ. सौरभ श्रीवास्तव, डॉ. मीनाक्षी सिंह, डॉ. वंदना गर्ग आदि अपनी राय रखी।
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