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Noida News: बीसीआई ने मनोज भाटी के लाइसेंस निरस्तीकरण पर लगाई रोक, फिर बने बार अध्यक्ष
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फोटो--
- यूपी बार काउंसिल की अनुशासनात्मक कार्रवाई प्रथम दृष्टया भ्रामक, अधिवक्ता अधिनियम के प्रावधानों पर उठाए सवाल
- अपील लंबित रहने तक प्रैक्टिस जारी रखने की अनुमति, रिकॉर्ड तलब, दिसंबर के पहले सप्ताह में होगी अंतिम सुनवाई
माई सिटी रिपोर्टर
ग्रेटर नोएडा। बार काउंसिल ऑफ इंडिया (बीसीआई) की अनुशासन समिति ने जिला दीवानी एवं फौजदारी बार एसोसिएशन गौतमबुद्धनगर के अध्यक्ष मनोज भाटी बोड़ाकी के लाइसेंस निरस्तीकरण के आदेश पर अंतरिम रोक लगा दी है। उत्तर प्रदेश बार काउंसिल की अनुशासन समिति ने उनका लाइसेंस निरस्त किया था। बीसीआई की समिति ने मामले की सुनवाई के दौरान प्रथम दृष्टया टिप्पणी की कि आरोपों का संबंध अधिवक्ता बनने से पहले की कथित गड़बड़ियों से है। ऐसे में अधिवक्ता अधिनियम के अध्याय-पांच के तहत अनुशासनात्मक कार्रवाई का आधार बनना स्पष्ट नहीं है। आदेश पर रोक लगने के बाद मनोज भाटी को दोबारा बार एसोसिएशन का अध्यक्ष बनाया गया है। सचिव शोभाराम चंदीला ने इसकी पुष्टि की है।
मनोज भाटी की ओर से राज्य बार काउंसिल के आदेश को कई आधारों पर चुनौती दी गई थी। उनके पक्ष ने दलील दी कि अनुशासन समिति के समक्ष उन्हें सुनवाई का उचित अवसर नहीं दिया गया। इसके अलावा शिकायत वर्ष 2021 में दर्ज होने और अंतिम निर्णय वर्ष 2026 में आने का मुद्दा भी उठाया गया। अपीलकर्ता पक्ष के अनुसार अधिवक्ता अधिनियम के तहत राज्य बार काउंसिल की अनुशासन समिति को एक वर्ष के भीतर मामले का निस्तारण करना होता है। निर्धारित अवधि में फैसला नहीं होने पर मामला बीसीआई को स्थानांतरित होने का प्रावधान है।
नामांकन से पहले की कथित गड़बड़ी पर सवाल : समिति के आदेश के अनुसार शिकायत में आरोप लगाया गया है कि मनोज भाटी ने अपनी डिग्रियों और उपस्थिति पत्रकों के संबंध में गलत जानकारी देकर अधिवक्ता के रूप में नामांकन कराया था। समिति ने प्रथम दृष्टया कहा कि आरोप नामांकन से पहले की कथित गलतबयानी से संबंधित हैं, जबकि अधिवक्ता अधिनियम का अध्याय-5 अधिवक्ताओं के पेशेगत और अन्य कदाचार से जुड़ा है। इसलिए इस प्रकरण में उक्त अध्याय के तहत कार्रवाई का आधार स्पष्ट नहीं दिखता। समिति ने यह भी उल्लेख किया कि यदि नामांकन के समय गलत जानकारी देने, तथ्य छिपाने या फर्जी डिग्री के आधार पर नामांकन कराने के आरोप सिद्ध होते हैं, तो उन पर अधिवक्ता अधिनियम की धारा-26 के तहत विचार किया जा सकता है।
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- यूपी बार काउंसिल की अनुशासनात्मक कार्रवाई प्रथम दृष्टया भ्रामक, अधिवक्ता अधिनियम के प्रावधानों पर उठाए सवाल
- अपील लंबित रहने तक प्रैक्टिस जारी रखने की अनुमति, रिकॉर्ड तलब, दिसंबर के पहले सप्ताह में होगी अंतिम सुनवाई
माई सिटी रिपोर्टर
ग्रेटर नोएडा। बार काउंसिल ऑफ इंडिया (बीसीआई) की अनुशासन समिति ने जिला दीवानी एवं फौजदारी बार एसोसिएशन गौतमबुद्धनगर के अध्यक्ष मनोज भाटी बोड़ाकी के लाइसेंस निरस्तीकरण के आदेश पर अंतरिम रोक लगा दी है। उत्तर प्रदेश बार काउंसिल की अनुशासन समिति ने उनका लाइसेंस निरस्त किया था। बीसीआई की समिति ने मामले की सुनवाई के दौरान प्रथम दृष्टया टिप्पणी की कि आरोपों का संबंध अधिवक्ता बनने से पहले की कथित गड़बड़ियों से है। ऐसे में अधिवक्ता अधिनियम के अध्याय-पांच के तहत अनुशासनात्मक कार्रवाई का आधार बनना स्पष्ट नहीं है। आदेश पर रोक लगने के बाद मनोज भाटी को दोबारा बार एसोसिएशन का अध्यक्ष बनाया गया है। सचिव शोभाराम चंदीला ने इसकी पुष्टि की है।
मनोज भाटी की ओर से राज्य बार काउंसिल के आदेश को कई आधारों पर चुनौती दी गई थी। उनके पक्ष ने दलील दी कि अनुशासन समिति के समक्ष उन्हें सुनवाई का उचित अवसर नहीं दिया गया। इसके अलावा शिकायत वर्ष 2021 में दर्ज होने और अंतिम निर्णय वर्ष 2026 में आने का मुद्दा भी उठाया गया। अपीलकर्ता पक्ष के अनुसार अधिवक्ता अधिनियम के तहत राज्य बार काउंसिल की अनुशासन समिति को एक वर्ष के भीतर मामले का निस्तारण करना होता है। निर्धारित अवधि में फैसला नहीं होने पर मामला बीसीआई को स्थानांतरित होने का प्रावधान है।
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नामांकन से पहले की कथित गड़बड़ी पर सवाल : समिति के आदेश के अनुसार शिकायत में आरोप लगाया गया है कि मनोज भाटी ने अपनी डिग्रियों और उपस्थिति पत्रकों के संबंध में गलत जानकारी देकर अधिवक्ता के रूप में नामांकन कराया था। समिति ने प्रथम दृष्टया कहा कि आरोप नामांकन से पहले की कथित गलतबयानी से संबंधित हैं, जबकि अधिवक्ता अधिनियम का अध्याय-5 अधिवक्ताओं के पेशेगत और अन्य कदाचार से जुड़ा है। इसलिए इस प्रकरण में उक्त अध्याय के तहत कार्रवाई का आधार स्पष्ट नहीं दिखता। समिति ने यह भी उल्लेख किया कि यदि नामांकन के समय गलत जानकारी देने, तथ्य छिपाने या फर्जी डिग्री के आधार पर नामांकन कराने के आरोप सिद्ध होते हैं, तो उन पर अधिवक्ता अधिनियम की धारा-26 के तहत विचार किया जा सकता है।
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