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'संख्या के आधार पर किसी खास वर्ग को निजता के अधिकार से वंचित नहीं किया जा सकता'

Fri, 25 Aug 2017 11:45 AM IST
amarujala.com, Presented By: विकास जांगड़ा
amarujala.com, Presented By: विकास जांगड़ा Updated Fri, 25 Aug 2017 11:45 AM IST
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No particular class can be denied to right to privacy on the basis of the number says supreme court
supreme court
निजता को मौलिक अधिकार बताते हुए नौ सदस्यीय संविधान पीठ ने भारतीय दंड संहिता की धारा-377 (समलैंगिकता) को अपराध में दायरे लाने के सुप्रीम कोर्ट की दो सदस्यीय पीठ के फैसले को कानूनन गलत बताया है। मालूम हो कि सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में दिल्ली हाईकोर्ट के फैसले को पलट दिया था। अब संविधान पीठ के फैसले के बाद एलजीबीटी समूह के लोगों की उम्मीद फिर से जग उठी है।
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न्यायमूर्ति डीवाई चंद्रचूड़ सहित तीन अन्य जजों द्वारा लिखे गए फैसले में कहा गया कि सुप्रीम कोर्ट ने जिस आधार पर धारा-377 पर दिल्ली हाईकोर्ट के फैसले को पलट दिया था, वह अपुष्ट था और उसका समर्थन नहीं किया जा सकता। सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि चूंकि भारत में लेस्बियन, गे, बाईसेक्सुअल और ट्रांसजेंडर (एलजीबीटी) की संख्या कम है इसलिए छोटे से समूह की निजता को अधिकार का लाभ नहीं दिया जा सकता। 
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न्यायमूर्ति चंद्रचूड़ ने सुप्रीम कोर्ट द्वारा लिए गए आधार पर असहमति जताई है। उन्होंने कहा है कि भले की किसी समूह के लोगों की संख्या कम हो लेकिन उनकी निजता की अनदेखी करने के फैसले को सही नहीं कहा जा सकता। संवैधानिक अधिकार महज संख्या के आधार पर नहीं दी जा सकती।
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न्यायमूर्ति चंद्रचूड़ ने कहा है कि यौन अनुकूलता या प्राथमिकता निजता का मूल तत्व है। यौन अनुकूलता के आधार पर किसी व्यक्ति के साथ भेदभाव उस व्यक्ति केसम्मान और उसके व्यक्तित्व की गरिमा पर प्रहार है। समानता का मतलब यह है कि समाज के हर व्यक्ति के यौन अनुकूलता या प्राथमिकता को संरक्षण मिले और वह भी हर प्लेटफार्म पर। निजता के अधिकार और यौन अनुकूलता या प्राथमिकता का संरक्षण अनुच्छेद-14,15 और 21 के तहत प्रदत्त मूल अधिकारों में निहित है।

न्यायमूर्ति संजय किशन कौल ने भी अपने फैसले में कहा कि संख्या के आधार पर किसी खास वर्ग के लोगों को निजता के अधिकार से वंचित नहीं किया जा सकता। निजता के अधिकार की अनदेखी इस आधार पर नहीं की जा सकती कि इसका असर जनसंख्या के एक छोटे से हिस्से पर ही पड़ेगा।


न्यायमूर्ति चंद्रचूड़ ने कहा है कि चूंकि धारा-377 का मामला बड़ी पीठ के पास लंबित है इसलिए इसकी संवैधानिक वैधता का मसला उस पीठ के पास छोड़ दिया जाता है। मालूम हो कि धारा-377 को दायर पुनर्विचार याचिका पर सुप्रीम कोर्ट का फैसला आना बाकी है।
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