भारत में मोबाइल से बढ़ रही है नपुंसकता
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मोबाइल और इलेक्ट्रॉनिक गजट से युवाओं में नपुंसकता बढ़ रही है। यदि समय रहते इस पर नियंत्रण नहीं किया जा सका तो आने वाले दिनों में और भी समस्या बढ़ेगी। एम्स में इलाज के आने वाले 15 से 20 फीसदी युवक-युवतियों में यह समस्या देखी जा रही है।
अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (एम्स) की गाइनोकोलॉजी विभाग की प्रमुख प्रो. डॉ. अलका कृपलानी ने बताया कि मोबाइल, इंटरनेट, अधिक समय तक कंप्यूटर पर बैठने और अन्य इलेक्ट्रॉनिक गजट केअधिक इस्तेमाल से नपुंसकता बढ़ रही है। मेट्रो शहर और आधुनिक जीवन शैली अपनाने वाले युवा-युवतियों में यह समस्या ज्यादा देखी जा रही है।
माता-पिता बनने में हो रही है दिक्कत
इलेक्ट्रॉनिक गजट के अधिक इस्तेमाल से जहां युवतियों में अंडाणु की संख्या घट रही तो युवाओं में शुक्राणु की संख्या घट रही है। ऐसी स्थिति में माता-पिता दोनों बनना मुश्किल हो रहा है।
डॉ. कृपलानी ने बताया कि ऐसी स्थिति से निपटने के लिए युवतियों में किसी अन्य महिला से अंडाणु लेकर उसमे इंजेक्ट किया जाता है, तो युवाओं में किसी अन्य पुरुष से शुक्राणु लेकर इंजेक्ट किया जाता है। इसके बाद ये माता-पिता बन पाते हैं।
डॉ. कृपलानी ने बताया कि आजकल युवतियां अपने भविष्य को लेकर काफी चिंतित होती हैं, इसलिए पारिवारिक जीवन से ज्यादा अपने नौकरी-पेशा जीवन को ज्यादा महत्व देती है। इस चक्कर में 35 को पार कर जाती है। इस उम्र में मां बनने में दिक्कत आनी शुरू हो जाती है। क्योंकि कई बार इस उम्र में भी अंडाणु बनना कम हो जाता है।