इकलाख ने आखिरी बार हिंदू दोस्त को फोन कर मांगी थी मदद
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दादरी में मोहम्मद इकलाख की पीट-पीटकर हत्या करने के मामले में ये बात सामने आई है कि इकलाख ने मरने से पहले अपने हिंदू दोस्त को मदद के लिए फोन किया था। जब भीड़ उसके घर की ओर बढ़ रही थी तब उसने अपने बचपन के दोस्त मनोज सिसोदिया को फोन कर मदद मांगी थी।
उस वक्त मनोज ने पुलिस को फोन किया और फिर दौड़ा-दौड़ा अपने दोस्त के घर पहुंचा। सिसोदिया और पुलिस दोनों ही इकलाख के घर उसका फोन जाने के 15 मिनट के अंदर पहुंच गए थे लेकिन तब तक बहुत देर हो चुकी थी।
पुलिस के अनुसार इकलाख के फोन के कॉल रिकॉर्ड से ये पता चला है कि उसने आखिरी कॉल सोमवार को रात करीब साढ़े दस बजे मनोज को की थी। मनोज इकलाख के घर से करीब 500 मीटर दूर रहता है और गांव में ही एक परचून की दुकान चलाता है।
इकलाख के आखिरी शब्द, 'हम खतरे में है'
सिसोदिया के अनुसार वो अपने दोस्त की मौत पर स्तब्ध था क्योंकि उस रात से पहले गांव में आजतक कभी सांप्रदायिक हिंसा नहीं हुई थी।
सिसोदिया ने बताया कि उस रात वो सोने की तैयारी कर रहा था। तब उसने देखा कि इकलाख का नाम उसके मोबाइल पर दिख रहा है। जब मनोज ने फोन उठाया तो इकलाख काफी डरा हुआ था। वो बोला, 'मनोज भाई, हम खतरे में हैं। किसी तरह पुलिस को फोन करके फोर्स बुलवा दो।' मनोज ने बताया इकलाख से उसकी यही आखिरी बात हुई थी।
तब मनोज ने तुरंत पुलिस को फोन कर बताया कि उसके दोस्त की जिंदगी खतरे में है। मनोज फोन रखते ही अपने दोस्त के घर की ओर दौड़ा। मनोज इकलाक के घर तक बिना रुके दौड़कर पहुंचा लेकिन तब तक काफी देर हो चुकी थी।
पुलिस भी 15 मिनट में पहुंच चुकी थी लेकिन तब तक इकलाख मर चुका था। मनोज का कहना है कि शायद अगर वो कुछ पहले पहुंचता तो वह भीड़ को शांत करने में कामयाब हो पाता।
मनोज को है अपनी जान का डर
इकलाख की पोस्टमॉर्टम रिपोर्ट के अनुसार वो कई चोटों और रक्तस्राव के कारण हुई। ये चोट उसके सिर पर किसी भोतरी चीज से मारने के कारण हुई थी।
मनोज के अनुसार उसे खुद जान का खतरा है और ये डर तब और ज्यादा था जब वो दानिश को अस्पताल छोड़कर आया था। उसे डर था कि कही भीड़ उसपर भी हमला करेगी क्योंकि वो भी इकलाख के साथ भोजन किया करता था।
इस बात की पुष्टि सब-इंस्पेक्टर सतबीर चौहान भी करते हैं कि इकलाख ने आखिरी कॉल सिसोदिया को ही की थी। जब इकलाक का मोबाइल चेक किया गया था तो लास्ट डायल कॉल सिसोदिया को ही किया गया था।
'जब से बोलना सीखा तब से इकलाख था मेरा दोस्त'
इकलाख के साथ अपनी सालों पुरानी दोस्ती को याद करते हुए कहते हैं कि जब से उन्होंने बोलना सीखा है, वो इकलाख को जानते हैं। वो बताते हैं कि जब इकलाख का बड़ा बेटा एयरफोर्स में भर्ती हुआ तो उन्होंने इकलाख के साथ मिलकर जश्न मनाया था।
मनोज ने इकलाख की बेटी को अपने घर के आंगन में बढ़ता और खेलता देखा है। मनोज कहते हैं कि ये ऐसा गांव नहीं है जहां हिंदू-मुस्लिम आपस में घुलते-मिलते नहीं।
हालांकि यहां केवल 30-40 परिवार ही मुस्लिमों के हैं लेकिन यहां कभी भी उन्होंने कोई खतरा नहीं झेला।
'हमें अकेला छोड़ दें सब ठीक हो जाएगा'
सिसोदिया ने बताया कि गांव वाले राजनेताओं की भड़काऊ बयानों और भारी पुलिस बल की गांव में तैनाती से खासा दुखी हैं। मनोज बोले कि बिसहाड़ा एक तरह के सर्कस में तब्दील हो गया है।
यहां लगातार पुलिस तैनात है। हर दिन यहां कोई राजनेता आता है और उनके साथ में आते हैं मीडिया वाले। इन सबके बीच गांव को समय ही नहीं मिला कि वो अपने दुख से उबर पाए।
बिसहाड़ा के ही एक अन्य व्यक्ति विष्णु सिंह ने कहा कि राजनेताओं और मीडिया को ये बताने की जरूरत नहीं है कि हमें किस तरह सभ्य बनना है। इनके टोन काफी भड़काऊ होते हैं। ये सदियों में अपनी तरह की पहली घटना है और आखिरी। हम बिल्कुल आराम से रहेंगे अगर हमें अकेला छोड़ दिया जाए।