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Gurugram News: पटौदी के दो सपूतों की शहादत आज भी दिलों में जिंदा
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कारगिल युद्ध की 26वीं वर्षगांठ पर याद शौर्य को किया गया याद
प्रेमचंद पालमी
पटौदी। कारगिल युद्ध की 26वीं वर्षगांठ पर पटौदी के लोगों ने दो जांबाज सपूतों की वीरगाथा को याद किया। गांव दौलताबाद कुणी के शहीद बिजेन्द्र यादव और गांव मुमताजपुर के लांस नायक कमांडो शहीद आजाद सिंह की शहादत युवाओं को प्रेरणा देती है।
शहीद बिजेन्द्र यादव का जन्म 1 अगस्त 1981 को जगमाल यादव व ब्रहमो देवी के घर हुआ था। 19 मार्च 1998 को कुमाऊं रेजीमेंट में भर्ती हुए और कारगिल युद्ध के दौरान ऑपरेशन विजय और ऑपरेशन मेघदूत में भाग लेते हुए चोटी नंबर 5685 को दुश्मन से मुक्त कराने के दौरान 30 अगस्त 1999 को वीरगति को प्राप्त हुए।
गांव की सड़क नहीं बनी
शहीद बिजेन्द्र अविवाहित थे। उनके भाई राजेन्द्र यादव बताते हैं कि सरकार ने परिवार को फ्लैट, नौकरी, पेंशन और मुआवजा आदि उपलब्ध कराया, लेकिन गांव से उनके घर तक का रास्ता आज तक पक्का नहीं किया गया। यही कारण था कि 2014 में परिवार को गांव छोड़कर रेवाड़ी जिले के निखरी गांव में बसना पड़ा। राजेन्द्र कहते हैं, अगर सड़क बना दी जाती, तो हम गांव नहीं छोड़ते।
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दूसरे वीर सपूत लांस नायक कमांडो आजाद सिंह ने 9 जुलाई 1999 को मश्कोह घाटी में 21 पाकिस्तानी घुसपैठियों को मार गिराया, लेकिन दुश्मन की गोली उनके सीने में लगी और वे शहीद हो गए। उनका जन्म 4 मई 1969 को हुआ था और 1 जनवरी 1988 को भारतीय सेना की 8 रेजीमेंट में भर्ती हुए थे। उस समय उनका बेटा राजू पांच साल का और बेटी निधि मात्र डेढ़ साल की थी। शहीद आजाद सिंह की पत्नी सुशीला देवी बताती हैं कि सरकार से उन्हें सभी सुविधाएं मिलीं, लेकिन उन्हें इस बात का दुख है कि कारगिल विजय दिवस पर भी प्रशासन शहीद की प्रतिमा पर श्रद्धा सुमन अर्पित नहीं करता।
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प्रेमचंद पालमी
पटौदी। कारगिल युद्ध की 26वीं वर्षगांठ पर पटौदी के लोगों ने दो जांबाज सपूतों की वीरगाथा को याद किया। गांव दौलताबाद कुणी के शहीद बिजेन्द्र यादव और गांव मुमताजपुर के लांस नायक कमांडो शहीद आजाद सिंह की शहादत युवाओं को प्रेरणा देती है।
शहीद बिजेन्द्र यादव का जन्म 1 अगस्त 1981 को जगमाल यादव व ब्रहमो देवी के घर हुआ था। 19 मार्च 1998 को कुमाऊं रेजीमेंट में भर्ती हुए और कारगिल युद्ध के दौरान ऑपरेशन विजय और ऑपरेशन मेघदूत में भाग लेते हुए चोटी नंबर 5685 को दुश्मन से मुक्त कराने के दौरान 30 अगस्त 1999 को वीरगति को प्राप्त हुए।
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गांव की सड़क नहीं बनी
शहीद बिजेन्द्र अविवाहित थे। उनके भाई राजेन्द्र यादव बताते हैं कि सरकार ने परिवार को फ्लैट, नौकरी, पेंशन और मुआवजा आदि उपलब्ध कराया, लेकिन गांव से उनके घर तक का रास्ता आज तक पक्का नहीं किया गया। यही कारण था कि 2014 में परिवार को गांव छोड़कर रेवाड़ी जिले के निखरी गांव में बसना पड़ा। राजेन्द्र कहते हैं, अगर सड़क बना दी जाती, तो हम गांव नहीं छोड़ते।
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दूसरे वीर सपूत लांस नायक कमांडो आजाद सिंह ने 9 जुलाई 1999 को मश्कोह घाटी में 21 पाकिस्तानी घुसपैठियों को मार गिराया, लेकिन दुश्मन की गोली उनके सीने में लगी और वे शहीद हो गए। उनका जन्म 4 मई 1969 को हुआ था और 1 जनवरी 1988 को भारतीय सेना की 8 रेजीमेंट में भर्ती हुए थे। उस समय उनका बेटा राजू पांच साल का और बेटी निधि मात्र डेढ़ साल की थी। शहीद आजाद सिंह की पत्नी सुशीला देवी बताती हैं कि सरकार से उन्हें सभी सुविधाएं मिलीं, लेकिन उन्हें इस बात का दुख है कि कारगिल विजय दिवस पर भी प्रशासन शहीद की प्रतिमा पर श्रद्धा सुमन अर्पित नहीं करता।