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उद्यमी प्रदेश के युवकों को नौकरी देने को तैयार लेकिन अनिवार्यता खत्म हो
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गुरुग्राम। जिले के उद्यमियों के लिए हरियाणा के युवाओं को नौकरियों में 75 फीसदी आरक्षण का कानून सिरदर्द बना हुआ है। अधिकांश औद्योगिक इकाइयां इस कानून को व्यवहारिक नहीं मान रहीं हैं। उनका कहना है कि पहले से ही हरियाणा के युवाओं को रोजगार में प्राथमिकता है। आगे भी रहेगी, लेकिन तकनीकी क्षेत्र में यहां के युवा इतनी संख्या में उपलब्ध नहीं हैं। ऐसे में सरकार को चाहिए कि इस कानून में इतना संशोधन करें कि आरक्षण की अनिवार्यता के स्थान पर प्राथमिकता कर दी जाए। आईएमटी मानेसर इंडस्ट्रियल एसोसिएशन ने मुख्यमंत्री से मिलने के लिए समय मांगा है।
वहीं इस बारे में उद्यमियों और विभिन्न एसोसिएशन के पदाधिकारियों की बैठकों का दौर शुरू हो गया है। जिसमें सभी की राय है कि सरकार का सीधे तौर पर विरोध नहीं करना है, लेकिन उद्योगों के सामने भविष्य में आने वाली समस्या के समाधान का विकल्प सरकार के सामने रखा जाए। उसी परिपेक्ष्य में एकमात्र यही विकल्प बताया गया है। आईएमटी मानेसर इंडस्ट्रियल एसोसिएशन के महासचिव मनोज त्यागी का कहना है कि संगठन के अधिकांश पदाधिकारी संशोधन कराकर अनिवार्यता के स्थान पर प्राथमिकता चाहते हैं। जिससे कि सरकार का उद्देश्य पूरा हो और उद्यमियों को भी किसी भी तरह की परेशानी न हो। उद्यमियों ने निर्णय लिया है कि उनके विभिन्न संगठनों का आठ सदस्यीय प्रतिनिधि मंडल सीएम से मिलेगा। मुलाकात के लिए सीएम कार्यालय से समय और दिन का इंतजार है। उद्यमियों का कहना है कि गारमेंट्स, ऑटो सेक्टर तथा कंस्ट्रक्शन सेक्टर की इंडस्ट्री के लिए तकनीकी रूप से दक्ष व्यक्ति हरियाणा में नहीं मिल सकेंगे। इनके तकनीकी कर्मचारी यूपी, बिहार, मध्यप्रदेश, झारखंड तथा अन्य प्रांतों के ही है। इसलिए कानून में संशोधन न होने पर इन सेक्टरों के उद्योगों के सामने दूसरे राज्यों में शिफ्ट होने के अलावा और कोई विकल्प नहीं रहेगा।
कानून को लेकर विशेषज्ञों से भी चर्चा
प्रदेश सरकार के हरियाणा के युवाओं को 75 फीसदी आरक्षण कानून की वैधानिकता को चुनौती देने की तैयारी की जा रही है। विधि विशेषज्ञों से इस बारे में विचार विमर्श किया जा रहा है। क्या इस कानून पर सुप्रीम कोर्ट के स्तर से रोक लगाई जा सकती है या फिर निष्प्रभावी किया जा सकता है। इन दोनों पहलुओं पर भी गंभीरता से विचार विमर्श हो रहा है। संकेत मिले हैं कि सामाजिक संगठन तथा कुछ एसोसिएशन के माध्यम से इस कानून को चुनौती भी दी जा सकती है।
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वर्जन-
हर नागरिक को देश के किसी भी प्रदेश में रोजी-रोटी कमाने का अधिकार है। ऐसे में राज्य का प्रतिबंध लगाकर आरक्षण का प्रावधान करना तर्क संगत नहीं है जबकि सरकार को आरक्षण की सीमा 75 फीसदी के स्थान पर 25 फीसदी करनी चाहिए। साथ ही आरक्षण स्थानीय स्तर पर स्किल्ड श्रमिकों के लिए ही रखा जाए। - सुनील सिंह पंवार, एडवाइजर, आईएमटी मानेसर इंडस्ट्रीयल एसोसिएशन
75 फीसदी आरक्षण लागू होने से कंपनियों को क्षति होगी। उन्हें प्रशिक्षित कर्मचारी नहीं मिलेंगे। ऐसे में विकल्प के तौर पर डीसी की अध्यक्षता में बनी कमेटी व्यवहारिक नहीं होगी। क्योंकि डीसी अपनी सुविधा के अनुसार बैठक आयोजित करेंगे, जबकि हमें तत्काल कर्मचारियों की आवश्यकता होगी। - केदार नाथ पांडेय, निदेशक, जीकेन फर्नीचर
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वहीं इस बारे में उद्यमियों और विभिन्न एसोसिएशन के पदाधिकारियों की बैठकों का दौर शुरू हो गया है। जिसमें सभी की राय है कि सरकार का सीधे तौर पर विरोध नहीं करना है, लेकिन उद्योगों के सामने भविष्य में आने वाली समस्या के समाधान का विकल्प सरकार के सामने रखा जाए। उसी परिपेक्ष्य में एकमात्र यही विकल्प बताया गया है। आईएमटी मानेसर इंडस्ट्रियल एसोसिएशन के महासचिव मनोज त्यागी का कहना है कि संगठन के अधिकांश पदाधिकारी संशोधन कराकर अनिवार्यता के स्थान पर प्राथमिकता चाहते हैं। जिससे कि सरकार का उद्देश्य पूरा हो और उद्यमियों को भी किसी भी तरह की परेशानी न हो। उद्यमियों ने निर्णय लिया है कि उनके विभिन्न संगठनों का आठ सदस्यीय प्रतिनिधि मंडल सीएम से मिलेगा। मुलाकात के लिए सीएम कार्यालय से समय और दिन का इंतजार है। उद्यमियों का कहना है कि गारमेंट्स, ऑटो सेक्टर तथा कंस्ट्रक्शन सेक्टर की इंडस्ट्री के लिए तकनीकी रूप से दक्ष व्यक्ति हरियाणा में नहीं मिल सकेंगे। इनके तकनीकी कर्मचारी यूपी, बिहार, मध्यप्रदेश, झारखंड तथा अन्य प्रांतों के ही है। इसलिए कानून में संशोधन न होने पर इन सेक्टरों के उद्योगों के सामने दूसरे राज्यों में शिफ्ट होने के अलावा और कोई विकल्प नहीं रहेगा।
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कानून को लेकर विशेषज्ञों से भी चर्चा
प्रदेश सरकार के हरियाणा के युवाओं को 75 फीसदी आरक्षण कानून की वैधानिकता को चुनौती देने की तैयारी की जा रही है। विधि विशेषज्ञों से इस बारे में विचार विमर्श किया जा रहा है। क्या इस कानून पर सुप्रीम कोर्ट के स्तर से रोक लगाई जा सकती है या फिर निष्प्रभावी किया जा सकता है। इन दोनों पहलुओं पर भी गंभीरता से विचार विमर्श हो रहा है। संकेत मिले हैं कि सामाजिक संगठन तथा कुछ एसोसिएशन के माध्यम से इस कानून को चुनौती भी दी जा सकती है।
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हर नागरिक को देश के किसी भी प्रदेश में रोजी-रोटी कमाने का अधिकार है। ऐसे में राज्य का प्रतिबंध लगाकर आरक्षण का प्रावधान करना तर्क संगत नहीं है जबकि सरकार को आरक्षण की सीमा 75 फीसदी के स्थान पर 25 फीसदी करनी चाहिए। साथ ही आरक्षण स्थानीय स्तर पर स्किल्ड श्रमिकों के लिए ही रखा जाए। - सुनील सिंह पंवार, एडवाइजर, आईएमटी मानेसर इंडस्ट्रीयल एसोसिएशन
75 फीसदी आरक्षण लागू होने से कंपनियों को क्षति होगी। उन्हें प्रशिक्षित कर्मचारी नहीं मिलेंगे। ऐसे में विकल्प के तौर पर डीसी की अध्यक्षता में बनी कमेटी व्यवहारिक नहीं होगी। क्योंकि डीसी अपनी सुविधा के अनुसार बैठक आयोजित करेंगे, जबकि हमें तत्काल कर्मचारियों की आवश्यकता होगी। - केदार नाथ पांडेय, निदेशक, जीकेन फर्नीचर