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Gurugram News: 80 जांच अधिकारी निलंबित, थानेदार, एसीपी और डीसीपी भी जांच के घेरे में
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गृहमंत्री अनिल विज की कार्रवाई के बाद पुलिस विभाग में मचा हुआ है हड़कंप
एक साल से ज्यादा समय बीत जाने के बावजूद जांच पूरी न होने पर दिया था निलंबन का आदेश
निलंबित जांच अधिकारियों ने वरिष्ठ अधिकारियों की कार्यशैली पर उठाया सवाल
मयंक तिवारी
गुरुग्राम। प्रदेश के गृह मंत्री अनिल विज की ओर से जांच में कोताही बरतने वाले पुलिस अधिकारियों के निलंबन के मामले में सबसे बड़ी संख्या कमिश्नरेट गुरुग्राम की है। जिसमें 80 लापरवाह जांच अधिकारी शामिल हैं। जबकि सबसे कम संख्या पानीपत जिले की है। यहां पर तीन जांच अधिकारी निलंबित हुए हैं। कमिश्नरेट के अलग-अलग जोन में निलंबित होने वाले पुलिस अधिकारियों में हवलदार से लेकर सब इंस्पेक्टर तक शामिल हैं। सरकार की ओर से निलंबन के बाद वहां पर तैनात रहने वाले पुलिस अधिकारियों पर भी सवाल खड़ा हुआ है।
कमिश्नरेट के 80 वह मामले हैं जिसमें पुलिस आयुक्त से लेकर सभी डीसीपी, एसीपी व थाना प्रभारी कटघरे में हैं। पूर्व पुलिस आयुक्त का तबादला मुख्यालय हो चुका है। जबकि डीसीपी और एसीपी अपने पदों पर बने हुए हैं। कमिश्नरेट में चर्चा इस बात की है कि जिन थाना प्रभारियों के कार्य काल में मामले को दबाकर रखा गया, उनका यहां से तबादला हो चुका है।। सरकार की ओर से उनके खिलाफ क्या एक्शन लिया जा रहा है।
नाम न छापने की शर्त पर एक निलंबित जांच अधिकारी बताते हैं कि धोखाधड़ी का मामला दर्ज हो गया। जांच के दौरान उसके पास वरिष्ठ अधिकारियों का फोन आ गया। मामले को ठंडे बस्ते में डाल दिया गया। उसमें हुई देरी से जांच अधिकारी का क्या लेना देना है। व्यवस्था के अनुसार पेंडिंग मामले का जिम्मेदार थाना प्रभारी होता है, उसके बाद एसीपी व डीसीपी को क्या इस मामले की सजा मिलेगी। बता दें कि कमिश्नरेट में ज्यादा मामले धोखाधड़ी के ही शामिल हैं।
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पुलिस महानिदेशक का आदेश हुआ वायरल
पुलिस महानिदेशक शत्रुजीत कपूर ने पद भार ग्रहण करने के बाद एक आदेश जारी किया था। जिसमें कहा था कि कही पर भी अगर भ्रष्टाचार या जांच में कोताही मिलती जाती है तो थाना प्रभारी से लेकर डीएसपी व एसपी जिम्मेदार होंगे। प्रदेश सरकार की ओर से इतने बड़े एक्शन के बाद आगे क्या होगा, यह यक्ष प्रश्न बना हुआ है।
मंडी में उगाही का मामला भी चर्चा का विषय बना
शिवाजी नगर थाने में दर्ज एक मामले में अपराध शाखा की पुलिस टीम ने गैंगस्टर कौशल के 14 लोगों को गिरफ्तार कर जेल भेजा है। मामला मंडी से उगाही और उसकी बंदरबांट का खुलासा होने पर एनआईए तक के लोग सूंघने में जुटे थे। एक सब इंस्पेक्टर सहित तीन को निलंबित किया जा चुका है। जांच पूरी हो चुकी है। पहले ज्यादा लोगों के नाम बताए जा रहे थे । बाद में एक जाति विशेष के लोगों को फायदा पहुंचाने की बात कह कर फाइल बंद हो गई है। इसकी भी चर्चा महकमे में जोरों पर है।
जांच अधिकारी के निलंबन से उठने वाले सवाल
: क्या थाना प्रभारी व एसीपी डीसीपी को लंबित मामलों की जानकारी नहीं होती थी।
: पुलिस आयुक्त के साथ होने वाली बैठक में गलत आंकड़े पेश किया जाते थे।
: वरिष्ठ अधिकारियों के साथ होने वाली बैठक चाय तक ही सीमित होती थी।
: अगर किसी जांच अधिकारी के पास ज्यादा मामले थे तो थाना प्रभारी उसे किसी अन्य को मार्क क्यों नहीं करता था।
: फाइलों को जांच से निपटाने से रोकने के लिए जिम्मेवार कौन है क्या प्रदेश सरकार उसे भी सजा देगी।
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इन जिलों से इतने जांच अधिकारी निलंबित हुए हैं...
गुरुग्राम 80, यमुनानगर 57, फरीदाबाद 32, पंचकुला 10, अंबाला 30, करनाल 31, पानीपत 3, हिसार 14, सिरसा 66, जींद 24, रेवाड़ी 5, रोहतक 31 और सोनीपत 9 लोग शामिल हैं।
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एक साल से ज्यादा समय बीत जाने के बावजूद जांच पूरी न होने पर दिया था निलंबन का आदेश
निलंबित जांच अधिकारियों ने वरिष्ठ अधिकारियों की कार्यशैली पर उठाया सवाल
मयंक तिवारी
गुरुग्राम। प्रदेश के गृह मंत्री अनिल विज की ओर से जांच में कोताही बरतने वाले पुलिस अधिकारियों के निलंबन के मामले में सबसे बड़ी संख्या कमिश्नरेट गुरुग्राम की है। जिसमें 80 लापरवाह जांच अधिकारी शामिल हैं। जबकि सबसे कम संख्या पानीपत जिले की है। यहां पर तीन जांच अधिकारी निलंबित हुए हैं। कमिश्नरेट के अलग-अलग जोन में निलंबित होने वाले पुलिस अधिकारियों में हवलदार से लेकर सब इंस्पेक्टर तक शामिल हैं। सरकार की ओर से निलंबन के बाद वहां पर तैनात रहने वाले पुलिस अधिकारियों पर भी सवाल खड़ा हुआ है।
कमिश्नरेट के 80 वह मामले हैं जिसमें पुलिस आयुक्त से लेकर सभी डीसीपी, एसीपी व थाना प्रभारी कटघरे में हैं। पूर्व पुलिस आयुक्त का तबादला मुख्यालय हो चुका है। जबकि डीसीपी और एसीपी अपने पदों पर बने हुए हैं। कमिश्नरेट में चर्चा इस बात की है कि जिन थाना प्रभारियों के कार्य काल में मामले को दबाकर रखा गया, उनका यहां से तबादला हो चुका है।। सरकार की ओर से उनके खिलाफ क्या एक्शन लिया जा रहा है।
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नाम न छापने की शर्त पर एक निलंबित जांच अधिकारी बताते हैं कि धोखाधड़ी का मामला दर्ज हो गया। जांच के दौरान उसके पास वरिष्ठ अधिकारियों का फोन आ गया। मामले को ठंडे बस्ते में डाल दिया गया। उसमें हुई देरी से जांच अधिकारी का क्या लेना देना है। व्यवस्था के अनुसार पेंडिंग मामले का जिम्मेदार थाना प्रभारी होता है, उसके बाद एसीपी व डीसीपी को क्या इस मामले की सजा मिलेगी। बता दें कि कमिश्नरेट में ज्यादा मामले धोखाधड़ी के ही शामिल हैं।
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पुलिस महानिदेशक का आदेश हुआ वायरल
पुलिस महानिदेशक शत्रुजीत कपूर ने पद भार ग्रहण करने के बाद एक आदेश जारी किया था। जिसमें कहा था कि कही पर भी अगर भ्रष्टाचार या जांच में कोताही मिलती जाती है तो थाना प्रभारी से लेकर डीएसपी व एसपी जिम्मेदार होंगे। प्रदेश सरकार की ओर से इतने बड़े एक्शन के बाद आगे क्या होगा, यह यक्ष प्रश्न बना हुआ है।
मंडी में उगाही का मामला भी चर्चा का विषय बना
शिवाजी नगर थाने में दर्ज एक मामले में अपराध शाखा की पुलिस टीम ने गैंगस्टर कौशल के 14 लोगों को गिरफ्तार कर जेल भेजा है। मामला मंडी से उगाही और उसकी बंदरबांट का खुलासा होने पर एनआईए तक के लोग सूंघने में जुटे थे। एक सब इंस्पेक्टर सहित तीन को निलंबित किया जा चुका है। जांच पूरी हो चुकी है। पहले ज्यादा लोगों के नाम बताए जा रहे थे । बाद में एक जाति विशेष के लोगों को फायदा पहुंचाने की बात कह कर फाइल बंद हो गई है। इसकी भी चर्चा महकमे में जोरों पर है।
जांच अधिकारी के निलंबन से उठने वाले सवाल
: क्या थाना प्रभारी व एसीपी डीसीपी को लंबित मामलों की जानकारी नहीं होती थी।
: पुलिस आयुक्त के साथ होने वाली बैठक में गलत आंकड़े पेश किया जाते थे।
: वरिष्ठ अधिकारियों के साथ होने वाली बैठक चाय तक ही सीमित होती थी।
: अगर किसी जांच अधिकारी के पास ज्यादा मामले थे तो थाना प्रभारी उसे किसी अन्य को मार्क क्यों नहीं करता था।
: फाइलों को जांच से निपटाने से रोकने के लिए जिम्मेवार कौन है क्या प्रदेश सरकार उसे भी सजा देगी।
इन जिलों से इतने जांच अधिकारी निलंबित हुए हैं...
गुरुग्राम 80, यमुनानगर 57, फरीदाबाद 32, पंचकुला 10, अंबाला 30, करनाल 31, पानीपत 3, हिसार 14, सिरसा 66, जींद 24, रेवाड़ी 5, रोहतक 31 और सोनीपत 9 लोग शामिल हैं।