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विसरा रिपोर्ट के इंतजार से गहरा रहा मौत का ‘रहस्य’
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विसरा रिपोर्ट के इंतजार से गहरा रहा मौत का ‘रहस्य’
गाजियाबाद। हत्या और हादसों में हुई मौतों पर ली जा रही विसरा रिपोर्ट महज दिखावा रह गई है। ऐसा प्रतीत हो रहा है कि पीड़ितों को टरकाने या भीड़ का गुस्सा शांत करने के लिए विसरा रिपोर्ट का सहारा लिया जा रहा है। शायद यही कारण है कि फोरेंसिक लैब भेजे जाने वाले मामलों की रिपोर्ट देने में न तो लैब जल्दबाजी कर रही है और न पुलिस ही संज्ञान ले रही है। जिले की पुलिस द्वारा भेजे गए विसरा सैंपल की जांच रिपोर्ट न आने के कारण मौतों का रहस्य बरकरार है।
पोस्टमार्टम के दौरान डॉक्टरों की टीम जब मौत का कारण स्पष्ट करने में अक्षम होती है तो मृतक का विसरा सुरक्षित कर दिया जाता है। इसके अलावा पुलिस द्वारा बताए गए मौत के कारण से जुड़ी बात डॉक्टर को नहीं दिखती है, तब भी विसरा सुरक्षित करते हैं। सड़क हादसे या गोली मारकर हत्या करने के मामले में विसरा जांच की जरूरत नहीं होती। लेकिन शव देखने के बाद अगर मौत संदिग्ध लगे या जहर देने की आशंका हो तो विसरा की जांच कराई जाती है। ऐसे ही मामले गाजियाबाद में भी देखने को मिले, जिनमें पोस्टमार्टम के दौरान मौत का कारण स्पष्ट न होने पर विसरा जांच के लिए भेजा गया।
इसे कहते हैं विसरा
पोस्टमार्टम करने के दौरान शव के विसरल पार्ट यानि किडनी, लीवर, दिल, पेट के अंगों का सैंपल लिया जाता है, इसे विसरा कहते हैं। इस विसरे को जांच के लिए केमिकल एक्जामिनर के पास भेजा जाता है। मौत के कारण, मौत का समय, बॉडी के किस पार्ट के फेल होने से मौत हुई आदि सवालों के जवाब विसरा रिपोर्ट आने के बाद पुलिस को मिल जाते हैं।
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81 फीसदी मामलों की रिपोर्ट नहीं आई
जिले में महिला थाना सहित 16 पुलिस थाने हैं। नौ थानों द्वारा इस साल भेजे गए विसरा की बात करें तो महज 81 प्रतिशत विसरा की जांच अभी तक फोरेंसिक लैब में पेंडिंग है। इन नौ थानों से 11 महीनों में 82 विसरा सुरक्षित किया गया। लेकिन रिपोर्ट महज 16 विसरा की आ सकी। बाकी विसरा रिपोर्ट के इंतजार में पीड़ित पक्ष टकटकी लगाए बैठे हैं।
बिना विसरा रिपोर्ट के चार्जशीट भेज देती है पुलिस
कानून विशेषज्ञों की मानें तो विसरा रिपोर्ट भेजने की बात कहकर पुलिस अपनी जिम्मेदारी से पल्ला झाड़ लेती है। विसरा रिपोर्ट मिलने केबाद ही कार्रवाई होगी, यह कहकर पीड़ित पक्ष को टरका दिया जाता है। मामला शांत होने पर बिना विसरा रिपोर्ट ही चार्जशीट कोर्ट में दाखिल कर दी जाती है। बाद में वादी पक्ष को मामला कोर्ट में विचाराधीन होने का पाठ पढ़ा दिया जाता है।
थाना विसरा भेजे रिपोर्ट आई
मुरादनगर 08 03
इंदिरापुरम 22 03
साहिबाबाद 10 03
मसूरी 12 02
कोतवाली 09 03
कविनगर 08 02
विजयनगर 06 00
सिहानी गेट 07 01
खोड़ा 06 01
वर्जन ...
मुकदमे की शुरूआत में उपलब्ध नहीं होती विसरा रिपोर्ट
विसरा रिपोर्ट, असलहा रिपोर्ट, ब्लड जांच रिपोर्ट सामान्यत: मुकदमा शुरू होने के दौरान उपलब्ध नहीं होती। ट्रायल केदौरान अकसर अदालत द्वारा रिमांडर भेजने के बाद ही देर-सवेरे फोरेंसिक रिपोर्ट कोर्ट में पेश होती है। - पंकज शर्मा, सीनियर क्रिमिनल एडवोकेट
वर्जन ...
विसरा रिपोर्ट अकसर देरी से आती है। इससे मुकदमे पर विपरीत प्रभाव पड़ता है। इसका सबसे कारण फोरेंसिक लैब की कमी है। डीजीपी रहते हुए हमने मंडल स्तर पर फोरेंसिक लैब खोलने की सिफारिश की थी। हर जिले में फोरेंसिक टीम होनी चाहिए, जो हर घटनास्थल पर जाकर सुबूत जुटाए। लेकिन आमतौर पर सुबूत जुटाने का काम पुलिसकर्मी करते हैं, जो प्रशिक्षित नहीं होते। ऐसे में विसरा रिपोर्ट केसाथ छेड़छाड़ की संभावना भी बनी रहती है। - अरविंद जैन, पूर्व डीजीपी, उत्तर प्रदेश
वर्जन ...
सात सेक्शन के तहत औसतन 250 जांच फोरेंसिक लैब में आती हैं। विसरा की जांच के प्रेसेस में 15 से 20 दिन का वक्त लग जाता है। कुछ केस कोर्ट के आदेशों पर पहले करने पड़ते हैं तो सहारनपुर शराब कांड जैसे मामलों की रिपोर्ट भी जल्दी देनी होती है। ऐसे में कुछ जांच रिपोर्ट लेट हो सकती हैं। लेकिन, हमारे यहां ढाई महीने के भीतर रिपोर्ट भेज दी जाती है। - डॉ. सुधीर कुमार, डिप्टी डायरेक्टर, फोरेंसिक साइंस लैबोरेट्री
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गाजियाबाद। हत्या और हादसों में हुई मौतों पर ली जा रही विसरा रिपोर्ट महज दिखावा रह गई है। ऐसा प्रतीत हो रहा है कि पीड़ितों को टरकाने या भीड़ का गुस्सा शांत करने के लिए विसरा रिपोर्ट का सहारा लिया जा रहा है। शायद यही कारण है कि फोरेंसिक लैब भेजे जाने वाले मामलों की रिपोर्ट देने में न तो लैब जल्दबाजी कर रही है और न पुलिस ही संज्ञान ले रही है। जिले की पुलिस द्वारा भेजे गए विसरा सैंपल की जांच रिपोर्ट न आने के कारण मौतों का रहस्य बरकरार है।
पोस्टमार्टम के दौरान डॉक्टरों की टीम जब मौत का कारण स्पष्ट करने में अक्षम होती है तो मृतक का विसरा सुरक्षित कर दिया जाता है। इसके अलावा पुलिस द्वारा बताए गए मौत के कारण से जुड़ी बात डॉक्टर को नहीं दिखती है, तब भी विसरा सुरक्षित करते हैं। सड़क हादसे या गोली मारकर हत्या करने के मामले में विसरा जांच की जरूरत नहीं होती। लेकिन शव देखने के बाद अगर मौत संदिग्ध लगे या जहर देने की आशंका हो तो विसरा की जांच कराई जाती है। ऐसे ही मामले गाजियाबाद में भी देखने को मिले, जिनमें पोस्टमार्टम के दौरान मौत का कारण स्पष्ट न होने पर विसरा जांच के लिए भेजा गया।
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इसे कहते हैं विसरा
पोस्टमार्टम करने के दौरान शव के विसरल पार्ट यानि किडनी, लीवर, दिल, पेट के अंगों का सैंपल लिया जाता है, इसे विसरा कहते हैं। इस विसरे को जांच के लिए केमिकल एक्जामिनर के पास भेजा जाता है। मौत के कारण, मौत का समय, बॉडी के किस पार्ट के फेल होने से मौत हुई आदि सवालों के जवाब विसरा रिपोर्ट आने के बाद पुलिस को मिल जाते हैं।
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81 फीसदी मामलों की रिपोर्ट नहीं आई
जिले में महिला थाना सहित 16 पुलिस थाने हैं। नौ थानों द्वारा इस साल भेजे गए विसरा की बात करें तो महज 81 प्रतिशत विसरा की जांच अभी तक फोरेंसिक लैब में पेंडिंग है। इन नौ थानों से 11 महीनों में 82 विसरा सुरक्षित किया गया। लेकिन रिपोर्ट महज 16 विसरा की आ सकी। बाकी विसरा रिपोर्ट के इंतजार में पीड़ित पक्ष टकटकी लगाए बैठे हैं।
बिना विसरा रिपोर्ट के चार्जशीट भेज देती है पुलिस
कानून विशेषज्ञों की मानें तो विसरा रिपोर्ट भेजने की बात कहकर पुलिस अपनी जिम्मेदारी से पल्ला झाड़ लेती है। विसरा रिपोर्ट मिलने केबाद ही कार्रवाई होगी, यह कहकर पीड़ित पक्ष को टरका दिया जाता है। मामला शांत होने पर बिना विसरा रिपोर्ट ही चार्जशीट कोर्ट में दाखिल कर दी जाती है। बाद में वादी पक्ष को मामला कोर्ट में विचाराधीन होने का पाठ पढ़ा दिया जाता है।
थाना विसरा भेजे रिपोर्ट आई
मुरादनगर 08 03
इंदिरापुरम 22 03
साहिबाबाद 10 03
मसूरी 12 02
कोतवाली 09 03
कविनगर 08 02
विजयनगर 06 00
सिहानी गेट 07 01
खोड़ा 06 01
वर्जन ...
मुकदमे की शुरूआत में उपलब्ध नहीं होती विसरा रिपोर्ट
विसरा रिपोर्ट, असलहा रिपोर्ट, ब्लड जांच रिपोर्ट सामान्यत: मुकदमा शुरू होने के दौरान उपलब्ध नहीं होती। ट्रायल केदौरान अकसर अदालत द्वारा रिमांडर भेजने के बाद ही देर-सवेरे फोरेंसिक रिपोर्ट कोर्ट में पेश होती है। - पंकज शर्मा, सीनियर क्रिमिनल एडवोकेट
वर्जन ...
विसरा रिपोर्ट अकसर देरी से आती है। इससे मुकदमे पर विपरीत प्रभाव पड़ता है। इसका सबसे कारण फोरेंसिक लैब की कमी है। डीजीपी रहते हुए हमने मंडल स्तर पर फोरेंसिक लैब खोलने की सिफारिश की थी। हर जिले में फोरेंसिक टीम होनी चाहिए, जो हर घटनास्थल पर जाकर सुबूत जुटाए। लेकिन आमतौर पर सुबूत जुटाने का काम पुलिसकर्मी करते हैं, जो प्रशिक्षित नहीं होते। ऐसे में विसरा रिपोर्ट केसाथ छेड़छाड़ की संभावना भी बनी रहती है। - अरविंद जैन, पूर्व डीजीपी, उत्तर प्रदेश
वर्जन ...
सात सेक्शन के तहत औसतन 250 जांच फोरेंसिक लैब में आती हैं। विसरा की जांच के प्रेसेस में 15 से 20 दिन का वक्त लग जाता है। कुछ केस कोर्ट के आदेशों पर पहले करने पड़ते हैं तो सहारनपुर शराब कांड जैसे मामलों की रिपोर्ट भी जल्दी देनी होती है। ऐसे में कुछ जांच रिपोर्ट लेट हो सकती हैं। लेकिन, हमारे यहां ढाई महीने के भीतर रिपोर्ट भेज दी जाती है। - डॉ. सुधीर कुमार, डिप्टी डायरेक्टर, फोरेंसिक साइंस लैबोरेट्री