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युवाओं के जोश पर भारी 101 साल के लायक राम का जज्बा
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लायक राम
- फोटो : NOIDA
युवाओं के जोश पर भारी है 101 साल के लायक राम का जज्बा
साहिबाबाद। यूपी गेट पर चल रहे आंदोलन में कुछ किसान ऐसे हैं जो उम्र के तो सौ साल पूरे कर चुके हैं लेकिन उनका जोश और जज्बा युवाओं से कम नहीं है। इनमें कई किसान आंदोलन के पहले दिन से अभी तक यहां डटे हुए हैं। अमरोहा के रहने वाले 101 वर्ष के लायक राम इन्हीं में से एक हैं। जब उन्हें पता चला कि कृषि कानूनों के खिलाफ किसान यूपी गेट पर एकत्रित हो रहे हैं तो वह भी अपने घर से निकल गए। उनकी उम्र को देखते हुए परिवार के लोगों ने रोका भी लेकिन वह जिद कर यहां आ गए। रास्ते में पुलिस वालों ने मदद करते हुए उन्हें आनंद विहार की बस में बैठा दिया। तब से वह यहीं पर डटे हुए हैं। लायक राम का कहना है कि आंदोलन में हर एक आदमी की अपनी अहमियत है। वह बुजुर्ग हो गए हैं, लेकिन किसानों की मांगों के लिए गोली खाने तक को तैयार हैं। उनकी जान चली जाएगी, लेकिन वह यहां से बिना मांग पूरी हुए लौटने वाले नहीं हैं। उन्होंने बताया कि उनका जन्म 1919 में हुआ था। जब देश आजाद हुआ तो वह 28 वर्ष के थे। उन्होंने अंग्रेजों से आजादी की लड़ाई भी लड़ी और आज किसानों के आजादी की लड़ाई लड़ रहे हैं।
पहले दिन से किसानों की लड़ाई लड़ रहे 98 वर्षीय सोरन सिंह
बुलंदशहर के रहने वाले 98 वर्षीय सोरन सिंह 41 दिनों से आंदोलन में शामिल हैं। जब 27 नवंबर को राकेश टिकैत यूपी गेट पहुंचे थे तो वह भी उनके साथ आंदोलन स्थल पर आए थे। तभी से वह यहां पर डटे हुए हैं। उनके साथ उनके बेटे और पोते भी आए थे। जब वह जाने लगे तो उन्हें भी साथ चलने को कहा लेकिन उन्होंने जाने से मना कर दिया। उन्होंने कहा कि उन्हें कोई समस्या नहीं है। यह तीन कानून ही किसानों की सबसे बड़ी समस्या हैं। यह वापस हो जाएं तो सारी समस्या खत्म हो जाएंगी। जब तक आंदोलन चलेगा, तब तक वह यहीं पर डटे रहेंगे। उन्होंने बताया कि बारी-बारी से उनके परिवार के लोग आंदोलन में शामिल होने आ जा रहे हैं, लेकिन वह यहीं पर किसानों की लड़ाई लड़ने के लिए डटे हुए हैं।
पोते ने कह दी ऐसी बात कि ले ली न लौटने की प्रतिज्ञा
आंदोलन के प्रति समर्पण का जज्बा सिर्फ बुजुर्ग ही नहीं बच्चों में भी कम नहीं है। इसका उदाहरण है जगत सिंह राठी का दस वर्षीय पोता। मेरठ के रहने वाले जगत सिंह राठी की उम्र 80 वर्ष है। वह भी आंदोलन में पहले दिन से जुटे हैं और अपनी सेवा दे रहे हैं। वह बताते हैं कि आंदोलन के एक सप्ताह बाद रात में अपने घर चले गए थे। सुबह जब उनका दस वर्षीय पोता उठा तो उनसे बोला कि सब ठीक है। सरकार ने कृषि कानून वापस ले लिए क्या। उन्होंने कहा, अभी नहीं, तो पोते ने कहा कि आप फिर आंदोलन बीच में छोड़ वापस क्यों आ गए। जगत सिंह ने बताया कि पोते की बात उनके दिल को छू गई। वह तभी अपने बेटे के साथ आंदोलन में लौट आए। उनका कहना है कि जब परिवार के लोग इतना समझते हैं और साथ दे रहे हैं तो वह कैसे पीछे हटेंगे। उनका कहना है जब तक सरकार तीनों कानूनों को वापस नहीं ले लेती, तब तक वह नहीं लौटेंगे।
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84 वर्षीय बुजुर्ग ने घर जाने के बजाय मंगा लिए कपड़े
मुजफ्फरनगर के रहने वाले महावीर सिंह 84 वर्ष के हैं। वह भी पहले दिन से आंदोलन में यूपी गेट पर डटे हैं। वह गांव के अन्य किसानों के साथ यहां पर आए हैं। ट्रैक्टर-ट्रॉली में बैठकर वह यहां पहुंचे। जब उनके साथियों ने यहां रुकने का फैसला किया तो उन्होंने भी अपने साथियों के साथ यहीं रुकने की ठान ली। वह अपने साथ कुछ भी लेकर नहीं आए थे। बाद में उन्होंने अपने घर से बेटों से कपड़े मंगाए। उन्होंने कहा कि इस आंदोलन में अपनी जान तक देने को तैयार हैं।
बुजुर्ग बोले, आंधी तूफान से बड़ी समस्या तीन कानून
आंदोलन में शामिल होने आए बुजुर्ग किसानों को तमाम तरह की परेशानियों से गुजरना पड़ रहा है लेकिन बातचीत में उनके चेहरे से इसका आभास नहीं होता। किसानों का कहना है कि सबसे बड़ी परेशानी उनके लिए ये तीन कृषि कानून हैं। इसका समाधान ही सब परेशानी का समाधान है। सरकार इसे वापस ले ले तो बेहतर होगा। वरना आंधी, बारिश तूफान क्यों न आए वह यहीं डटे रहेंगे।
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साहिबाबाद। यूपी गेट पर चल रहे आंदोलन में कुछ किसान ऐसे हैं जो उम्र के तो सौ साल पूरे कर चुके हैं लेकिन उनका जोश और जज्बा युवाओं से कम नहीं है। इनमें कई किसान आंदोलन के पहले दिन से अभी तक यहां डटे हुए हैं। अमरोहा के रहने वाले 101 वर्ष के लायक राम इन्हीं में से एक हैं। जब उन्हें पता चला कि कृषि कानूनों के खिलाफ किसान यूपी गेट पर एकत्रित हो रहे हैं तो वह भी अपने घर से निकल गए। उनकी उम्र को देखते हुए परिवार के लोगों ने रोका भी लेकिन वह जिद कर यहां आ गए। रास्ते में पुलिस वालों ने मदद करते हुए उन्हें आनंद विहार की बस में बैठा दिया। तब से वह यहीं पर डटे हुए हैं। लायक राम का कहना है कि आंदोलन में हर एक आदमी की अपनी अहमियत है। वह बुजुर्ग हो गए हैं, लेकिन किसानों की मांगों के लिए गोली खाने तक को तैयार हैं। उनकी जान चली जाएगी, लेकिन वह यहां से बिना मांग पूरी हुए लौटने वाले नहीं हैं। उन्होंने बताया कि उनका जन्म 1919 में हुआ था। जब देश आजाद हुआ तो वह 28 वर्ष के थे। उन्होंने अंग्रेजों से आजादी की लड़ाई भी लड़ी और आज किसानों के आजादी की लड़ाई लड़ रहे हैं।
पहले दिन से किसानों की लड़ाई लड़ रहे 98 वर्षीय सोरन सिंह
बुलंदशहर के रहने वाले 98 वर्षीय सोरन सिंह 41 दिनों से आंदोलन में शामिल हैं। जब 27 नवंबर को राकेश टिकैत यूपी गेट पहुंचे थे तो वह भी उनके साथ आंदोलन स्थल पर आए थे। तभी से वह यहां पर डटे हुए हैं। उनके साथ उनके बेटे और पोते भी आए थे। जब वह जाने लगे तो उन्हें भी साथ चलने को कहा लेकिन उन्होंने जाने से मना कर दिया। उन्होंने कहा कि उन्हें कोई समस्या नहीं है। यह तीन कानून ही किसानों की सबसे बड़ी समस्या हैं। यह वापस हो जाएं तो सारी समस्या खत्म हो जाएंगी। जब तक आंदोलन चलेगा, तब तक वह यहीं पर डटे रहेंगे। उन्होंने बताया कि बारी-बारी से उनके परिवार के लोग आंदोलन में शामिल होने आ जा रहे हैं, लेकिन वह यहीं पर किसानों की लड़ाई लड़ने के लिए डटे हुए हैं।
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पोते ने कह दी ऐसी बात कि ले ली न लौटने की प्रतिज्ञा
आंदोलन के प्रति समर्पण का जज्बा सिर्फ बुजुर्ग ही नहीं बच्चों में भी कम नहीं है। इसका उदाहरण है जगत सिंह राठी का दस वर्षीय पोता। मेरठ के रहने वाले जगत सिंह राठी की उम्र 80 वर्ष है। वह भी आंदोलन में पहले दिन से जुटे हैं और अपनी सेवा दे रहे हैं। वह बताते हैं कि आंदोलन के एक सप्ताह बाद रात में अपने घर चले गए थे। सुबह जब उनका दस वर्षीय पोता उठा तो उनसे बोला कि सब ठीक है। सरकार ने कृषि कानून वापस ले लिए क्या। उन्होंने कहा, अभी नहीं, तो पोते ने कहा कि आप फिर आंदोलन बीच में छोड़ वापस क्यों आ गए। जगत सिंह ने बताया कि पोते की बात उनके दिल को छू गई। वह तभी अपने बेटे के साथ आंदोलन में लौट आए। उनका कहना है कि जब परिवार के लोग इतना समझते हैं और साथ दे रहे हैं तो वह कैसे पीछे हटेंगे। उनका कहना है जब तक सरकार तीनों कानूनों को वापस नहीं ले लेती, तब तक वह नहीं लौटेंगे।
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84 वर्षीय बुजुर्ग ने घर जाने के बजाय मंगा लिए कपड़े
मुजफ्फरनगर के रहने वाले महावीर सिंह 84 वर्ष के हैं। वह भी पहले दिन से आंदोलन में यूपी गेट पर डटे हैं। वह गांव के अन्य किसानों के साथ यहां पर आए हैं। ट्रैक्टर-ट्रॉली में बैठकर वह यहां पहुंचे। जब उनके साथियों ने यहां रुकने का फैसला किया तो उन्होंने भी अपने साथियों के साथ यहीं रुकने की ठान ली। वह अपने साथ कुछ भी लेकर नहीं आए थे। बाद में उन्होंने अपने घर से बेटों से कपड़े मंगाए। उन्होंने कहा कि इस आंदोलन में अपनी जान तक देने को तैयार हैं।
बुजुर्ग बोले, आंधी तूफान से बड़ी समस्या तीन कानून
आंदोलन में शामिल होने आए बुजुर्ग किसानों को तमाम तरह की परेशानियों से गुजरना पड़ रहा है लेकिन बातचीत में उनके चेहरे से इसका आभास नहीं होता। किसानों का कहना है कि सबसे बड़ी परेशानी उनके लिए ये तीन कृषि कानून हैं। इसका समाधान ही सब परेशानी का समाधान है। सरकार इसे वापस ले ले तो बेहतर होगा। वरना आंधी, बारिश तूफान क्यों न आए वह यहीं डटे रहेंगे।