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Ghaziabad News: ओपीडी में इलाज के लिए आए खांसी के सभी मरीजों की होेगी टीबी जांच
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गाजियाबाद। सरकारी अस्पतालों की ओपीडी में इलाज के लिए आने वाले खांसी के सभी मरीजों की टीबी जांच होगी। इसके लिए सीएमओ ने अस्पतालों के सीएमएस को निर्देश जारी किया है। इस समय जिले में 21,528 मरीजों का इलाज चल रहा है। इस समय जिले में उपचार करा रहे मरीजों में 16909 के बैंक खाते मिल चुके हैं, इनमें से 14890 मरीजों के खाते में 53,131,000 रुपये भुगतान किया जा चुका है।
जिला क्षय रोग अधिकारी डॉ. अमित विक्रम ने बताया बलगम की जांच कराने के लिए लोगों को जिला अस्पताल तक न जाना पड़े, इसके लिए नगरीय प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र में बलगम जांच केंद्र स्थापित किए गए हैं। डीटीओ ने बताया कि यदि 15 दिनों तक खांसी ठीक न हो तो बलगम की जांच कराना जरूरी हो जाता है। जिला क्षय रोग अधिकारी ने बताया टीबी के लिहाज से साहिबाबाद, पसौंडा, भोपुरा, लोनी, मंडोला, खोडा, विजय नगर, घूकना, मुरादनगर, मोदी नगर, भोजपुर और फरीदनगर को संवेदनशील क्षेत्र माना गया है। खासकर घनी आबादी में टीबी का खतरा ज्यादा होता है। यह बीमारी सांस के जरिए एक से दूसरे व्यक्ति में फैलती है, इसलिए पूर्व में चिन्हित किए गए टीबी मरीजों के परिजनों की स्क्रीनिंग विशेष रूप से की जाएगी। डीटीओ ने बताया कि टीबी का बीच में उपचार छोड़ने से टीबी खतरनाक रूप लेती है, जिसे एमडीआर और एक्सडीआर श्रेणी में रखा जाता है। ऐसी स्थिति में टीबी की दवाएं मरीज पर असर करना बंद कर देती हैं।
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जिला क्षय रोग अधिकारी डॉ. अमित विक्रम ने बताया बलगम की जांच कराने के लिए लोगों को जिला अस्पताल तक न जाना पड़े, इसके लिए नगरीय प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र में बलगम जांच केंद्र स्थापित किए गए हैं। डीटीओ ने बताया कि यदि 15 दिनों तक खांसी ठीक न हो तो बलगम की जांच कराना जरूरी हो जाता है। जिला क्षय रोग अधिकारी ने बताया टीबी के लिहाज से साहिबाबाद, पसौंडा, भोपुरा, लोनी, मंडोला, खोडा, विजय नगर, घूकना, मुरादनगर, मोदी नगर, भोजपुर और फरीदनगर को संवेदनशील क्षेत्र माना गया है। खासकर घनी आबादी में टीबी का खतरा ज्यादा होता है। यह बीमारी सांस के जरिए एक से दूसरे व्यक्ति में फैलती है, इसलिए पूर्व में चिन्हित किए गए टीबी मरीजों के परिजनों की स्क्रीनिंग विशेष रूप से की जाएगी। डीटीओ ने बताया कि टीबी का बीच में उपचार छोड़ने से टीबी खतरनाक रूप लेती है, जिसे एमडीआर और एक्सडीआर श्रेणी में रखा जाता है। ऐसी स्थिति में टीबी की दवाएं मरीज पर असर करना बंद कर देती हैं।
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