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पूरे परिवार को चबाने पड़े लोहे के चने: 10 बार हुई फाइल गुम, 24 साल बाद कारगिल शहीद परिवार को मिला प्लॉट

Fri, 05 Jul 2024 05:22 PM IST
Vikas Kumar हेमलता रावत, अमर उजाला, बल्लभगढ़
हेमलता रावत, अमर उजाला, बल्लभगढ़ Published by: Vikas Kumar Updated Fri, 05 Jul 2024 05:22 PM IST
सार

25 साल बीत जाने के बाद भी की शहादत की बात करते ही उनकी मां लीला देवी व अन्य परिवार के सदस्यों की आंखे नम हो जाती हैं। दूसरी ओर उनको गर्व भी होता है कि उनका बेटा देश की रक्षा करते हुए शहीद हुआ था। 

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File was lost 10 times Kargil martyr family got plot after 24 years
24 साल बाद कारगिल शहीद परिवार को मिला प्लॉट - फोटो : अमर उजाला

विस्तार

1999 में हुए कारगिल युद्ध में मश्कोह घाटी (कश्मीर) में पाकिस्तानी सेना के दांत खट्टे करते हुए पोस्ट पर कब्जा करने वाले गांव मोहना के शहीद फौजी वीरेंद्र सिंह अत्री, कई दुश्मनों को मौत के घाट उतारते हुए वीरगति को प्राप्त हुए थे। 24 वर्ष बाद सरकार से उनकी मां लीला देवी को मिले प्लॉट पर निर्माण कराना उनकी मां के लिए परेशानी का सबब बन गया है। शहीद की मां के कराए निर्माण को ग्रामीण दबंगों ने रातों-रात ढहा दिया। 24 वर्षों से प्लॉट मिलने की सरकारी प्रक्रिया में उनके पूरे परिवार को लोहे के चने चबाने से कम नहीं था। अब प्लॉट पर निर्माण करने के लिए दबंगों से भी जूझना पड़ रहा है।       

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25 साल बीत जाने के बाद भी की शहादत की बात करते ही उनकी मां लीला देवी व अन्य परिवार के सदस्यों की आंखे नम हो जाती हैं। दूसरी ओर उनको गर्व भी होता है कि उनका बेटा देश की रक्षा करते हुए शहीद हुआ था। शहीद के बलिदान पर सरकार की ओर से 200 गज का प्लॉट देने की बात कही थी। गांव मोहना में 200 गज का प्लॉट तो मिला लेकिन उसको किए गए निर्माण कार्य को भी बुधवार रात को ढहा दिया गया।

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24 साल बाद मिला सरकार से सम्मान
गांव मोहना निवासी शहीद वीरेंद्र सिंह के बड़े भाई डॉ. हरप्रसाद अत्री ने बताया कि शहीद वीरेंद्र को सरकार ने सम्मान के तौर पर गांव में 200 गज का प्लॉट देने की बात कही थी। जिसका लेकर उनके परिवार की ओर से बीडीपीओ कार्यालय में फाइल को जमा किया, लेकिन उस समय मौजूद अधिकारियों ने फाइल को गुम कर दिया। 

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करीब 10 बार कार्यालय में प्लॉट को लेकर फाइल को पूरे महत्वपूर्ण कागजात के साथ जमा किया, लेकिन हर बार अधिकारियों व कर्मचारियों की लापरवाही के चलते गुम हो जाती। अगर कोई फाइल चंडीगढ़ सरकार के पास पहुंच भी जाती तो उसमें कोई न कोई कागजातों की कमी को देखकर फाइल को वापस भेज दिया जाता था। उसके बाद विकास एवं पंचायत विभाग चंडीगढ़ द्वारा 12 दिसंबर 2022 को 200 गज का प्लाट देने का आदेश दिया था। 

विधानसभा से पारित होने के बाद 12 अप्रैल 2023 को 24 साल के बाद ग्राम पंचायत मोहना की उप तहसील में रजिस्ट्री हुई। सालों चक्कर लगाने के बाद जब मां लीला देवी उस प्लॉट पर निर्माण कार्य करवा रही थी तो बुधवार को आकर उसको भी तोड़ दिया गया। 

ऐसे हुए थे शहीद वीरेंद्र
गांव मोहना निवासी कालेराम के घर एक जनवरी 1978 को वीरेंद्र का जन्म हुआ। उन्होंने विज्ञान से 12वीं कक्षा की परीक्षा पास की और दिसम्बर 1998 में सेना में भर्ती हो गए। उन्हें जाट रेजिमेंट मिली थी। उनके प्रशिक्षण के अभी छह माह ही हुए थे कि कारगिल युद्ध छिड़ गया। सिपाही वीरेंद्र सिंह जब कारगिल की लड़ाई के लिए गए तो उनकी उम्र केवल 21 साल थी। उनकी तैनाती मश्कोह घाटी में थी। हरप्रसाद बताते हैं कि उनकी बटालियन को आदेश मिलने पर 17 जाट बटालियन के 25 जवानों की टुकड़ी ने पांच जुलाई की रात पिलर नंबर दो पहाड़ी पर चढ़ाई शुरू कर दी। पहाड़ की चोटी पर बैठे पाकिस्तानी सैनिक व घुसपैठियों ने भारतीय जवानों को आता देख फायरिंग शुरू कर दी। इस दौरान एक गोली वीरेंद्र सिंह के पैर में लगी। गोली लगने के बावजूद वीरेंद्र ने हिम्मत नहीं हारी। छह जुलाई को तड़के करीब 4.45 बजे भारतीय जवानों और पाकिस्तानी सेना के बीच जमकर गोलीबारी हुई। वीरेंद्र ने कई पाकिस्तानी सिपाहियों को मौत के घाट उतार दिया। चोटी फतह करने के बाद जब उनके साथी गोली निकालने का प्रयास कर रहे थे तभी उनके पास एक गोला आकर गिरा, जिसकी चपेट में आकर वीरेंद्र शहीद हो गए। 11 जुलाई 1999 को वरिष्ठ माध्यमिक विद्यालय में राजकीय व सैनिक सम्मान के साथ अंतिम संस्कार किया गया।

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