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Faridabad News: मेले में देखने को मिल रही पारंपरिक शिल्प और विरासत की झलक
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लखनऊ से आई मुबारकपुर की शाही साड़ी बनी आकर्षण का केंद्र
18 हजार की है शुद्ध मूंगा सिल्क साड़ी
भारती दुबे
फरीदाबाद। सूरजकुंड दिवाली मेले में इस बार पारंपरिक शिल्प और विरासत की एक अनोखी झलक देखने को मिल रही है। लखनऊ से आए दीपक पहली बार मेले में मुबारकपुर की प्रसिद्ध साड़ी लेकर पहुंचे हैं, जो देखते ही देखते लोगों के बीच आकर्षण का केंद्र बन गई है।
करीब 18 हजार रुपये की इस साड़ी की खास बात यह है कि इसे शुद्ध मूंगा सिल्क से तैयार किया गया है और इस पर लखनऊ के राजा-महाराजाओं, हाथियों और किलों के बारीक डिजाइन बनाए गए हैं। यह पूरी साड़ी हाथों से बनाई गई है, जिसे दो कारीगरों ने मिलकर करीब दो महीने की मेहनत से तैयार किया है। इसकी सबसे ज्यादा खासियत इसमें लगी जरी की है, जिसकी 40 साल की गारंटी है।
2014 में चाचा राष्ट्रीय पुरस्कार से हुए थे सम्मानित
दीपक सूरजकुंड मेले में सिर्फ यह खास साड़ी ही नहीं, बल्कि कई बनारसी सूट और साड़ियां भी लेकर आए हैं, जिन्हें भी मेले में आने वाले लोग खूब पसंद कर रहे हैं। इस काम को लेकर 2014 में उनके चाचा को राष्ट्रीय पुरस्कार भी मिल चुका है। दीपक ने बताया कि हमारी कोशिश है कि पारंपरिक भारतीय कला को लोग समझें और अपनाएं। यह साड़ी सिर्फ कपड़ा नहीं, बल्कि हमारी विरासत और कारीगरी की पहचान है।
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18 हजार की है शुद्ध मूंगा सिल्क साड़ी
भारती दुबे
फरीदाबाद। सूरजकुंड दिवाली मेले में इस बार पारंपरिक शिल्प और विरासत की एक अनोखी झलक देखने को मिल रही है। लखनऊ से आए दीपक पहली बार मेले में मुबारकपुर की प्रसिद्ध साड़ी लेकर पहुंचे हैं, जो देखते ही देखते लोगों के बीच आकर्षण का केंद्र बन गई है।
करीब 18 हजार रुपये की इस साड़ी की खास बात यह है कि इसे शुद्ध मूंगा सिल्क से तैयार किया गया है और इस पर लखनऊ के राजा-महाराजाओं, हाथियों और किलों के बारीक डिजाइन बनाए गए हैं। यह पूरी साड़ी हाथों से बनाई गई है, जिसे दो कारीगरों ने मिलकर करीब दो महीने की मेहनत से तैयार किया है। इसकी सबसे ज्यादा खासियत इसमें लगी जरी की है, जिसकी 40 साल की गारंटी है।
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2014 में चाचा राष्ट्रीय पुरस्कार से हुए थे सम्मानित
दीपक सूरजकुंड मेले में सिर्फ यह खास साड़ी ही नहीं, बल्कि कई बनारसी सूट और साड़ियां भी लेकर आए हैं, जिन्हें भी मेले में आने वाले लोग खूब पसंद कर रहे हैं। इस काम को लेकर 2014 में उनके चाचा को राष्ट्रीय पुरस्कार भी मिल चुका है। दीपक ने बताया कि हमारी कोशिश है कि पारंपरिक भारतीय कला को लोग समझें और अपनाएं। यह साड़ी सिर्फ कपड़ा नहीं, बल्कि हमारी विरासत और कारीगरी की पहचान है।
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