{"_id":"655ded1b94cde1a4610a24cc","slug":"delhi-high-court-says-arning-spouse-cannot-be-allowed-put-responsibility-of-expenses-on-partner-2023-11-22","type":"story","status":"publish","title_hn":"Delhi: कमाने वाले दंपती को खर्चों की जिम्मेदारी एक-दूसरे पर नहीं डालनी चाहिए, हाईकोर्ट ने भरण-पोषण भी किया कम","category":{"title":"City & states","title_hn":"शहर और राज्य","slug":"city-and-states"}}
Delhi: कमाने वाले दंपती को खर्चों की जिम्मेदारी एक-दूसरे पर नहीं डालनी चाहिए, हाईकोर्ट ने भरण-पोषण भी किया कम
Wed, 22 Nov 2023 05:41 PM IST
श्याम जी.
पीटीआई, दिल्ली
पीटीआई, दिल्ली
Published by: श्याम जी.
Updated Wed, 22 Nov 2023 05:41 PM IST
सार
दिल्ली हाईकोर्ट ने एक मामले की सुनवाई करते हुए कहा कि अगर अलग रह रही पत्नी के पास रुपये कमाने की उचित क्षमता है और उसके बाद भी पति पर जिम्मेदारी डाल रही है तो यह गलत है। भरण-पोषण प्रदान करके खर्चों को पूरा करने की एकतरफा जिम्मेदारी डालने की अनुमति नहीं दी जानी चाहिए।
विज्ञापन
दिल्ली हाईकोर्ट
विस्तार
उच्च न्यायालय ने स्पष्ट किया कि एक पति या पत्नी, जिसके पास कमाने की उचित क्षमता है, लेकिन पर्याप्त स्पष्टीकरण के बिना बेरोजगार रहना चुनता है, को दूसरे पति या पत्नी पर भरण-पोषण के रूप में खर्च का बोझ डालने की अनुमति नहीं दी जानी चाहिए। न्यायमूर्ति वी कामेश्वर राव और न्यायमूर्ति अनूप कुमार मेंदीरत्ता की खंडपीठ ने एक पारिवारिक अदालत द्वारा एक पत्नी को उसके पति द्वारा दायर तलाक की कार्यवाही के लंबित रहने के दौरान दिए गए गुजारा भत्ते को कम करते हुए यह टिप्पणी की।
विज्ञापन
पीठ ने कहा पति या पत्नी के पास कमाने की उचित क्षमता है, लेकिन जो बिना किसी पर्याप्त स्पष्टीकरण या रोजगार हासिल करने के ईमानदार प्रयासों के संकेत के बिना बेरोजगार और बेकार रहना पसंद करता है, उसे खर्चों को पूरा करने की एकतरफा जिम्मेदारी दूसरे पक्ष पर डालने की अनुमति नहीं दी जानी चाहिए। न्यायालय ने कहा कि भरण-पोषण की राशि की गणना गणितीय परिशुद्धता के साथ नहीं की जानी चाहिए, बल्कि उस पति या पत्नी को राहत प्रदान करने के उद्देश्य से की जानी चाहिए जो कार्यवाही के लंबित रहने के दौरान अपना भरण-पोषण करने में असमर्थ है।
विज्ञापन
उच्च न्यायालय के समक्ष अपील में पति ने उस आदेश को चुनौती दी थी जिसमें तलाक की कार्यवाही के लंबित रहने के दौरान अपनी पत्नी को प्रति माह 30,000 का भुगतान करने का निर्देश दिया गया था। पति के वकील ने तर्क दिया कि उसे घरेलू हिंसा से महिलाओं की सुरक्षा अधिनियम के तहत अपनी पत्नी को 21,000 का भुगतान करने का निर्देश दिया गया था और एचएमए कार्यवाही में इसे बढ़ाकर 30,000 कर दिया गया था।
विज्ञापन
अपनी कम आय का हवाला देते हुए पति ने कहा कि उसकी पत्नी दिल्ली विश्वविद्यालय से स्नातक है और पहले एक अस्पताल में रिसेप्शनिस्ट के रूप में काम करते हुए 25,000 कमाती है।
अदालत को बताया गया कि अपीलकर्ता (पति) को अपनी बहनों, भाई और वृद्ध माता-पिता का भरण-पोषण करना है, साथ ही अपने भाई की शादी के लिए लिया गया ऋण भी चुकाना है। जवाब में पत्नी के वकील ने कहा कि वह केवल एक सामाजिक कार्यकर्ता है और उस अस्पताल से कोई वेतन नहीं ले रही थी जहां वह वर्तमान में काम करती है।
पीठ ने कहा कटौती के बाद पति का वेतन केवल 56,492 है। यह भी नोट किया गया कि फैमिली कोर्ट ने अपनी अलग रह रही पत्नी को दिए जाने वाले गुजारा भत्ते को बढ़ाने के लिए कोई कारण नहीं बताया है। पीठ ने अंतरिम गुजारा भत्ता 30,000 से घटाकर 21,000 कर दिया। हालाँकि, न्यायालय ने यह भी कहा कि मुद्रास्फीति और बढ़ती कीमतों को देखते हुए, प्रत्येक अगले वर्ष के दौरान रखरखाव स्वतः ही 1,500 प्रति माह बढ़ जाएगा।