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मीडिया पर पाबंदी के लिए इस्तेमाल नहीं हो सकता मानहानि कानून
Tue, 07 May 2019 05:27 AM IST
दुष्यंत शर्मा
अमर उजाला ब्यूरो, नई दिल्ली
अमर उजाला ब्यूरो, नई दिल्ली
Published by: दुष्यंत शर्मा
Updated Tue, 07 May 2019 05:27 AM IST
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स्टिंग ऑपरेशन समाज का एक अहम अंग है और यह गलत कामों को सामने लाने में बेहद मददगार है। मानहानि के कानून का इस्तेमाल मीडिया पर पाबंदी लगाने, उसे दबाने व खामोश करने के लिए नहीं किया जा सकता।
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यह भूलना चाहिए कि मानहानि कानून में विचार एवं अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर रोक और इसका गलत इस्तेमाल न हो यह देखना कोर्ट की जिम्मेदारी है। यह टिप्पणी हाईकोर्ट ने मानहानि की एक याचिका को खारिज करते हुए की है।
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न्यायमूर्ति राजीव सहाय एंडलॉ ने यह टिप्पणी इंडियन पोटाश लिमिटेड (आईपीएल) के मानहानि दावे को खारिज करते हुए की है। आईपीएल ने एक समाचार चैनल पर दावा कर 11 करोड़ रुपये का मुआवजा मांगा था। इस चैनल ने 2007 में कंपनी द्वारा चलाए जा रहे मिलावटी दूध के कारोबार का पर्दाफाश किया था।
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कोर्ट ने याचिका खारिज करते हुए राफेल मामले में सुप्रीम कोर्ट के ताजा फैसले का भी जिक्र किया कि आरटीआई कानून का अधिकार गोपनीय दस्तावेज अधिनियम से भी ऊपर है और इसे इसी तरह समझा भी जाना चाहिए। आज का समय आरटीआई का है और उससे सरकार से जुड़ी कई जानकारियां सामने आई हैं और बेहतर प्रशासन में मदद मिली है।
मामले में प्रतिवादी चैनल ने 27-28 अप्रैल 2007 को पश्चिमी उत्तर प्रदेश में कथित रूप से कंपनी द्वारा बेचे जा रहे मिलावटी व सिंथेटिक दूध का पर्दाफाश किया था। कोर्ट ने कहा कि हमारे समाज में दूध का विशेष महत्व है और यह भोजन का हिस्सा है। मिलावटी दूध स्वास्थ्य को प्रभावित करता है इसलिए यह हमेशा से जनहित से जुड़ा मुद्दा रहा है। इस मिलावट को स्टिंग ऑपरेशन के जरिए ही सामने लाया जा सकता है।
कोर्ट ने याचिका खारिज करते हुए कहा कि याची ने उसे नुकसान होने का कोई साक्ष्य पेश नहीं किया है और इसके मद्देनजर उसे मुआवजा दिलाने का आदेश नहीं दिया जा सकता। गलत काम बेहद चतुराई से गुपचुप तरीके से किए जाते हैं और ज्यादातर मामलों में कोई साक्ष्य नहीं होता। ऐसे मामलों का खुलासा गलत काम करने वालों को जाल में फंसाकर स्टिंग ऑपरेशन से ही किया जा सकता है। हालांकि इससे गलत करने वालों को सजा नहीं मिलती, लेकिन कुछ समय के लिए यह रुक अवश्य जाता है।