पिलर बॉक्स घोटाले में 42 अफसर सस्पेंड
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फरीदाबाद के बल्लभगढ़ इलाके में हुए बिजली निगम के पिलर बॉक्स घोटाले में शामिल आरोपियों पर कार्रवाई शुरू हो गई है। घोटाले की जांच में जुटी स्टेट विजिलेंस टीम और विभाग की विजिलेंस टीम ने संयुक्त रिपोर्ट जारी कर 42 अधिकारियों को निलंबित कर दिया।
इस कार्रवाई के बाद विभाग में हड़कंप मच गया है। दागी अधिकारियों के हाथ-पांव फूल गए हैं। बिजली निगम के इतिहास में यह अब तक की सबसे बड़ी कार्रवाई है।
जिन बड़े अधिकारियों पर कार्रवाई हुई है उनमें दिल्ली में बैठने वाले इस क्षेत्र के चीफ इंजीनियर सुभाष देशवाल, फरीदाबाद के एसई आरएस यादव, एनआईटी के एक्सईएन राम निवास, ओल्ड फरीदाबाद के एक्सईएन जितेंद्र ढुल, बल्लभगढ़ के कुलदीप अत्री एवं एक्सईएन एनर्जी ऑडिट (हिसार) विकास दहिया का निलंबन किया गया है।
बिजली निगम के एमडी अरुण कुमार ने बताया कि जांच में जो तथ्य सामने आए है। उसके आधार पर कार्रवाई की गई है। योजना संबंधित जांच अभी भी जारी है। दोषियों को बख्शा नहीं जाएगा।
अमर उजाला की रिपोर्ट पर हुआ था खुलासा
एसडीओ रविंद्र बिरवाल, पंकज पवार, संदीप कुंडू, कुलदीप यादव, संजय मंगला, आरएस बेनीवाल, हर्ष कुमार, एसपी सिंह, धर्मेंद्र रोहिल, एसपी सचदेवा, प्रशांत कुमार, अनिल सोलंकी, एसएस रावत, मंदीप कुंडू, डीएस कादियान, देवेंद्र अत्री, सत्तार खान, प्रमोद कुमार, बृज मोहन को सेवाओं से हटाया गया है।
जेई पंकज कुमार, राकेश, रविंद्र कुमार, सुरेंद्र कुमार, सतीश चेची, वीबी सिंह, रविंद्र डागर, प्रदीप गिल, जोगिंदर सिंह, आरपी करदम, विनोद कुमार, निशांत रोहिला, कुलदीप सिंह, नीरज त्यागी, सतीश चंद एवं जगदीश के नाम शामिल हैं। ये सभी अधिकारी फरीदाबाद, पलवल, गुड़गांव और हिसार में कार्यरत हैं।
ये है पिलर बॉक्स घोटाला
राज्य सरकार ने जिले में बिजली चोरी रोकने के लिए वर्ष 2012 में पिलर बॉक्स योजना शुरू की गई थी। इसके तहत एक अलमारी नुमा बॉक्स में एक साथ 10 से 12 बिजली मीटरों को लगाकर उसे बंद करना था। ताकि मीटरों में कोई व्यक्ति छेड़छाड़ न कर सके।
योजना में वर्ष 2013 में एक शिकायत प्राप्त हुई थी। जिसके बाद से जांच की शुरू की गई। जिसमें गड़बड़ी सामने आई। जांच में दो निजी कंपनियों को गलत तरीके से फायदा पहुंचाने की बात कही गई थी। इसके बाद इस साल जनवरी 2014 में इसे बंद कर दिया गया।
जांच रिपोर्ट में इस बात की पुष्टि हुई है कि योजना में करीब 130 करोड़ रुपये का घोटाला हुआ है। योजना के तहत जो रेट बिजली निगम द्वारा तय किए गए थे उससे अधिक कीमत पर निजी कंपनी को ठेका दिया गया। इसके अलावा कंपनी के सामान की जांच अधिकारियों ने नहीं की।