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पंजाब-हरियाणा हाईकोर्ट का फैसला: पीड़ित के गुमनाम रहने का अधिकार सूचना के अधिकार से बड़ा
Tue, 24 Sep 2024 10:22 AM IST
निवेदिता वर्मा
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, चंडीगढ़
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, चंडीगढ़
Published by: निवेदिता वर्मा
Updated Tue, 24 Sep 2024 10:22 AM IST
सार
हाईकोर्ट ने कहा कि याचिकाकर्ता द्वारा मांगे गए सूचना के अधिकार पर विभिन्न प्रतिबंध लगाए जा सकते हैं। पीड़ित के बारे में पहचान और जानकारी का खुलासा करना नैतिकता और शालीनता के खिलाफ है, क्योंकि ऐसा कोई भी खुलासा पीड़ित को सम्मानपूर्वक जीवन जीने से रोकता है।
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पंजाब हरियाणा हाईकोर्ट
- फोटो : अमर उजाला
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विस्तार
पंजाब-हरियाणा हाईकोर्ट ने अहम फैसला सुनाते हुए यह स्पष्ट कर दिया है कि पीड़ित के गुमनाम रहने के अधिकार को सूचना के अधिकार की बलि नहीं चढ़ने दिया जा सकता।
हाईकोर्ट ने महिलाओं के विरुद्ध अपराध, किशोर न्याय अधिनियम, वैवाहिक विवादों से संबंधित संवेदनशील मामलों के आदेशों या केस विवरणों को हाईकोर्ट की वेबसाइट पर अपलोड करने पर प्रतिबंध लगाने के कार्यकारी समिति के निर्णय को चुनौती देने वाली याचिका को खारिज कर दिया।
पेशे से चंडीगढ़ हाईकोर्ट के वकील रोहित मेहता ने जनहित याचिका दाखिल करते हुए कहा था कि उच्च न्यायालय द्वारा पारित कार्यकारी आदेश गैग ऑर्डर की तरह हैं, जो पूर्ण गोपनीयता के सिद्धांत को लागू करते हैं। याचिका में भारतीय न्याय संहिता (बीएनएस) की धारा 73 और भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (बीएनएसएस) की धारा 366 (3) को भी चुनौती दी गई थी, जो न्यायालय की अनुमति के बिना ट्रायल कोर्ट में लंबित यौन अपराधों से संबंधित मामलों की संबंधित कार्यवाही के प्रकाशन पर रोक लगाती है।
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हाईकोर्ट ने कहा कि याचिकाकर्ता द्वारा मांगे गए सूचना के अधिकार पर विभिन्न प्रतिबंध लगाए जा सकते हैं। पीड़ित के बारे में पहचान और जानकारी का खुलासा करना नैतिकता और शालीनता के खिलाफ है, क्योंकि ऐसा कोई भी खुलासा पीड़ित को सम्मानपूर्वक जीवन जीने से रोकता है। पीड़ित को शरीर, मन या प्रतिष्ठा को किसी भी तरह के नुकसान से बचाने के लिए पीड़ित की पहचान उजागर करने पर प्रतिबंध लगाकर सुरक्षा और प्रतिरक्षा उपलब्ध कराई जा सकती है।
खंडपीठ ने कहा कि पीड़ित के गुमनाम रहने का अधिकार सीधे तौर पर व्यक्तित्व और गरिमा से संबंधित है। यदि पीड़ित की पहचान का खुलासा हो जाता है, खासकर महिलाओं/किशोरों के खिलाफ अपराधों के मामले में तो यह उनके व्यक्तित्व और गरिमा चोट लगेगी। हाईकोर्ट ने कहा कि सूचना का अधिकार जीवन के अधिकार के अधीन है।
पीठ ने कहा कि सूचना का अधिकार भारत की संप्रभुता और अखंडता, राज्य की सुरक्षा, सार्वजनिक व्यवस्था, शालीनता या नैतिकता या अदालत की अवमानना, मानहानि या किसी अपराध के लिए उकसाने से संबंधित कानून द्वारा लगाए गए उचित प्रतिबंधों के अधीन है। इस प्रकार सूचना के अधिकार पर प्रतिबंध अनुच्छेद 21 के तहत जीवन के अधिकार की तुलना में कहीं अधिक स्पष्ट है।
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हाईकोर्ट ने महिलाओं के विरुद्ध अपराध, किशोर न्याय अधिनियम, वैवाहिक विवादों से संबंधित संवेदनशील मामलों के आदेशों या केस विवरणों को हाईकोर्ट की वेबसाइट पर अपलोड करने पर प्रतिबंध लगाने के कार्यकारी समिति के निर्णय को चुनौती देने वाली याचिका को खारिज कर दिया।
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पेशे से चंडीगढ़ हाईकोर्ट के वकील रोहित मेहता ने जनहित याचिका दाखिल करते हुए कहा था कि उच्च न्यायालय द्वारा पारित कार्यकारी आदेश गैग ऑर्डर की तरह हैं, जो पूर्ण गोपनीयता के सिद्धांत को लागू करते हैं। याचिका में भारतीय न्याय संहिता (बीएनएस) की धारा 73 और भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (बीएनएसएस) की धारा 366 (3) को भी चुनौती दी गई थी, जो न्यायालय की अनुमति के बिना ट्रायल कोर्ट में लंबित यौन अपराधों से संबंधित मामलों की संबंधित कार्यवाही के प्रकाशन पर रोक लगाती है।
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हाईकोर्ट ने कहा कि याचिकाकर्ता द्वारा मांगे गए सूचना के अधिकार पर विभिन्न प्रतिबंध लगाए जा सकते हैं। पीड़ित के बारे में पहचान और जानकारी का खुलासा करना नैतिकता और शालीनता के खिलाफ है, क्योंकि ऐसा कोई भी खुलासा पीड़ित को सम्मानपूर्वक जीवन जीने से रोकता है। पीड़ित को शरीर, मन या प्रतिष्ठा को किसी भी तरह के नुकसान से बचाने के लिए पीड़ित की पहचान उजागर करने पर प्रतिबंध लगाकर सुरक्षा और प्रतिरक्षा उपलब्ध कराई जा सकती है।
खंडपीठ ने कहा कि पीड़ित के गुमनाम रहने का अधिकार सीधे तौर पर व्यक्तित्व और गरिमा से संबंधित है। यदि पीड़ित की पहचान का खुलासा हो जाता है, खासकर महिलाओं/किशोरों के खिलाफ अपराधों के मामले में तो यह उनके व्यक्तित्व और गरिमा चोट लगेगी। हाईकोर्ट ने कहा कि सूचना का अधिकार जीवन के अधिकार के अधीन है।
पीठ ने कहा कि सूचना का अधिकार भारत की संप्रभुता और अखंडता, राज्य की सुरक्षा, सार्वजनिक व्यवस्था, शालीनता या नैतिकता या अदालत की अवमानना, मानहानि या किसी अपराध के लिए उकसाने से संबंधित कानून द्वारा लगाए गए उचित प्रतिबंधों के अधीन है। इस प्रकार सूचना के अधिकार पर प्रतिबंध अनुच्छेद 21 के तहत जीवन के अधिकार की तुलना में कहीं अधिक स्पष्ट है।