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'रब्बा-रब्बा मींह वर्सा' का मंचन, हुआ कुछ ऐसा कि निकले सभी के आंसू
ब्यूरो/अमर उजाला, चंडीगढ़
Updated Tue, 18 Oct 2016 09:34 AM IST
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पंजाबी नाटक रब्बा रब्बा मींह वर्सा... का मंचन
- फोटो : अमर उजाला
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टैगोर थिएटर में सोमवार को सीएसएनए चिल्ड्रन थिएटर फेस्टिवल के पहले दिन नाटक रब्बा रब्बा मींह वर्सा... का मंचन किया गया, जिसमें फरीदकोट के थिएटर ग्रुप नाट्यम के 11 कलाकारों ने प्रस्तुति दी। नाटक का निर्देशन कीर्ति किरपाल ने किया। इस दो दिवसीय थिएटर फेस्टिवल का आयोजन चंडीगढ़ संगीत नाटक अकादमी की ओर से किया जा रहा है।
एक घंटे के इस नाटक के माध्यम से संदेश दिया गया कि हर चीज एक मात्रा में ही होनी चाहिए। जरूरत से ज्यादा मात्रा में मिली चीज इंसान के लिए घातक होती है। इस कमेडी नाटक के दौरान हर डायलॉग पर दर्शकों ने खूब तालियां बजाई। नाटक में कॉमेडी के साथ-साथ इमोशनल टच भी था। इसमें पाली नाम के एक स्टूडेंट और एक पागल लड़के की कहानी को दिखाया गया। स्कूल में सभी स्टूडेंट बारिश के लिए रब्बा रब्बा मींह वर्सा की फरियाद भगवान से करते हैं, जबकि पाली नाम का स्टूडेंट इस फरियाद में शामिल नहीं होता है।
वह बारिश के नाम से कांपने लगता है। इस पर उसके टीचर ने पाली से इसका कारण पूछा तो वह बताता है कि मेरे पिता जी अभी ही बिस्तर से उठे हैं, वह मजदूर हैं। अगर आज बारिश हो जाती है तो उन्हें काम नहीं मिलेगा। हमें आज भी भूखा ही सोना पड़ेगा। ऐसे में मैं बारिश की फरियाद कैसे कर सकता हूं?
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इसके बाद उस पागल इंसान की कहानी दिखाई जाती है जिसके खेत, मां-बाप और पूरा घर बाढ़ की चपेट में आ जाता है। इस दुख से वह पागल हो जाता है। यह पूरा नाटक फरीदकोट के सरकारी स्कूल के सातवीं और आठवीं कक्षा में पढ़ने वाले स्टूडेंट ने पेश किया।
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एक घंटे के इस नाटक के माध्यम से संदेश दिया गया कि हर चीज एक मात्रा में ही होनी चाहिए। जरूरत से ज्यादा मात्रा में मिली चीज इंसान के लिए घातक होती है। इस कमेडी नाटक के दौरान हर डायलॉग पर दर्शकों ने खूब तालियां बजाई। नाटक में कॉमेडी के साथ-साथ इमोशनल टच भी था। इसमें पाली नाम के एक स्टूडेंट और एक पागल लड़के की कहानी को दिखाया गया। स्कूल में सभी स्टूडेंट बारिश के लिए रब्बा रब्बा मींह वर्सा की फरियाद भगवान से करते हैं, जबकि पाली नाम का स्टूडेंट इस फरियाद में शामिल नहीं होता है।
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वह बारिश के नाम से कांपने लगता है। इस पर उसके टीचर ने पाली से इसका कारण पूछा तो वह बताता है कि मेरे पिता जी अभी ही बिस्तर से उठे हैं, वह मजदूर हैं। अगर आज बारिश हो जाती है तो उन्हें काम नहीं मिलेगा। हमें आज भी भूखा ही सोना पड़ेगा। ऐसे में मैं बारिश की फरियाद कैसे कर सकता हूं?
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इसके बाद उस पागल इंसान की कहानी दिखाई जाती है जिसके खेत, मां-बाप और पूरा घर बाढ़ की चपेट में आ जाता है। इस दुख से वह पागल हो जाता है। यह पूरा नाटक फरीदकोट के सरकारी स्कूल के सातवीं और आठवीं कक्षा में पढ़ने वाले स्टूडेंट ने पेश किया।