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विश्व थैलेसीमिया दिवस: खेलने कूदने की उम्र में जा रहे खून चढ़वाने, मगर थैलेसीमिक बच्चों के हौसले हैं बुलंद

Wed, 08 May 2024 01:34 PM IST
निवेदिता वर्मा वीणा तिवारी, अमर उजाला, चंडीगढ़
वीणा तिवारी, अमर उजाला, चंडीगढ़ Published by: निवेदिता वर्मा Updated Wed, 08 May 2024 01:34 PM IST
सार

विश्व थैलेसीमिया दिवस के अवसर पर अमर उजाला ने इस मर्ज से ग्रस्त बच्चों के माता-पिता से बात की। उन्होंने अपनी कहानी साझा करने के साथ ही युवाओं से अपील की कि उन्होंने शादी से पहले और गर्भावस्था के दौरान थैलेसीमिया की जांच न करने की जो गलती कि उसे कोई न करें। क्योंकि समय रहते उन्होंने जांच कराई होती तो आज उनके बच्चे शायद इस गंभीर मर्ज की चपेट में नहीं आए होते।

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Special Story of thalassemic children on World Thalassemia Day
World Thalassemia Day - फोटो : अमर उजाला

विस्तार

खेलने-कूदने की उम्र में ये बच्चे 25वें दिन अस्पताल में खून चढ़वाने जा रहे हैं। ये कोई ऐसी बीमारी नहीं जिसका इलाज कुछ महीनों या वर्षों में हो जाए। अब ये खून चढ़वाने का सिलसिला ताउम्र चलेगा। बात हो रही है थैलेसीमिया से ग्रस्त ट्राइसिटी के बच्चों की, जो इतनी गंभीर बीमारी से ग्रस्त होने के बावजूद अपने माता-पिता की बदौलत एक सामान्य जीवन जी रहे हैं। 

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जुड़वा बेटे आए चपेट में, मगर हौसला नहीं टूटा
पंचकूला निवासी अमित सूद और उनकी पत्नी अमिता माइनर थैलेसीमिक हैं। शादी के पहले उन्हें इसकी जानकारी नहीं थी। अमिता ने गर्भ धारण किया तब भी थैलेसीमिया की जांच नहीं हुई। 5 साल पहले जुड़वां बच्चों को जन्म दिया। जन्म के पांच महीने बाद पता चला कि दोनों बेटों को थैलेसीमिया है। इसे सुनकर अमित और अमिता के होश उड़ गए, लेकिन दोनों हिम्मत नहीं हारी। दोनों बेटों का पीजीआई में नियमित इलाज कराना शुरू किया। अमित और अमिता की जागरूकता के कारण उनके दोनों बच्चे बिल्कुल सामान्य जीवन जी रहे हैं और बाकी बच्चों के साथ स्कूल जाना और खेलना-कूदना भी कर रहे हैं।
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जांच न कराने पर दूसरी बेटी आ गई चपेट में
पीजीआई के ट्रांसफ्यूजन मेडिसिन में अपनी बेटी का इलाज करा रहीं पंचकूला की सपना गंभीर ने बताया कि वे और उनके पति माइनर थैलेसीमिक हैं। पहली बेटी के जन्म के समय जांच कराई, सबकुछ सामान्य रहा। दूसरी बेटी के जन्म के दौरान कुछ परिस्थितियां ऐसी थीं कि जांच नहीं हो सकी। उसके जन्म के बाद पता चला कि वो थैलेसीमिक है। उसके बाद तीसरी बेटी का जन्म हुआ वो भी पहली बेटी की तरह ही सामान्य है। लेकिन जरा सी चूक के कारण दूसरी बेटी इस गंभीर मर्ज की चपेट में आ गई। 
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सपना का कहना है कि अनजाने में अगर किसी कोई मर्ज हो जाए तो कुछ नहीं कहा जा सकता। लेकिन अब खतरा पहले से पता हो तो किसी भी तरह का चांस नहीं लेना चाहिए। सपना ने बताया कि अपनी स्थिति को देखते हुए ही उन्होंने ननद की शादी से पहले होने वाली ननदोई और ननद की थैलेसीमिया की जांच कराई। फिलहाल अपनी दूसरी बेटी को मानक के अनुसार तय इलाज दिला रही हैं। सपना का कहना है कि अगर माता-पिता जागरूक हो तो ऐसे बच्चे भी सामान्य बच्चों की तरह जीवन जी सकते हैं।

443 थैलेसीमिक को मिल रहा चिकित्सा उपचार
314 बच्चे - पीजीआईएमईआर
129 बच्चे - जीएमसीएच-32

443 मरीजों का राज्यवार ब्यौरा इस प्रकार है
चंडीगढ़- 82 बच्चे
पंजाब - 185 बच्चे
हरियाणा -121 बच्चे
अन्य -55 बच्चे

विवाहित रोगियों की संख्या
कुल विवाहित थैलेसीमिया 43
- सामान्य साथी 23
- बच्चे वाले जोड़े 14
- सबसे बुजुर्ग विवाहित रोगी की आयु 48 वर्ष है

चंडीगढ़ में कम हो रहा बीमारी का प्रकोप
चंडीगढ़ में संक्रमित बच्चे के जन्म का आंकड़ा सितंबर 2019 से 2024 में अब तक शून्य पर रहा। विशेषज्ञों का कहना है कि गर्भावस्था के दौरान होने वाले हाई परफॉरमेंस लिक्विड कोमैटोग्राफी (एचपीएलसी) टेस्ट से इसकी स्क्रीनिंग की जा सकती है। ट्राइसिटी में यह टेस्ट अनिवार्य कर दिया गया है। इसकी सुविधा पीजीआई में उपलब्ध है।


पंजीकृत बच्चों को मिल रहा मुफ्त इलाज
थैलेसीमिक चैरिटेबल ट्रस्ट के सदस्य सचिव राजिंदर कालरा ने बताया कि ऐसे मरीजों के लिए 1985 से नियमित रक्तदान शिविर आयोजित कर रहा है। वर्तमान में पीजीआई और जीएमसीएच-32 में दो दिवसीय देखभाल केंद्रों में 450 थैलेसीमिक बच्चे पंजीकृत हैं, जिनका इलाज हो रहा है। सभी रोगियों को खून चढ़ाने के लिए मुफ्त चिकित्सा सामग्री उपलब्ध कराई जाती है और गरीब रोगियों को निशुल्क दवाएं भी दी जाती हैं।

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