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Chandigarh News: अफसोस की बात... नई पीढ़ी साहित्य को सहेजने में नहीं ले रही रुचि

Fri, 31 Mar 2023 01:09 AM IST
Chandigarh Bureau चंडीगढ़ ब्यूरो
Updated Fri, 31 Mar 2023 01:09 AM IST
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Sadly, the new generation is not taking interest in saving literature
चंडीगढ़। 60-70 के दशक में लोगों में किताबें को लेकर काफी रुचि थी और उनका मनोरंजन का सबसे बेहतरीन साधन था। रूपायन, प्रेमचंद, गुरुदत्त आदि को पढ़ने का दौर था। पर आज घरों से किताबें और युवाओं की साहित्य से रुचि गायब है। सरकार भी साहित्य को प्रोत्साहन करने में नाकामयाब साबित हो रही है। वर्तमान में जरूरी है कि भारत के राज्य एक दूसरे के साहित्य को समझें, पंजाब का साहित्य मलयालम में, कन्नड़ का बंगाली में और इसी प्रकार स्थानीय पुस्तकों का अन्य स्थानीय भाषा में अनुवाद होना चाहिए। यह बात वीरवार को ‘भारतीय साहित्य से कौन डरता है’ विषय पर आयोजित चर्चा में मौजूद पैनलिस्ट ने कही। अवसर था सेक्टर-31 की सीआईआई नॉर्थन रीजन हेडक्वार्टर में आयोजित दो दिवसीय थिंक फेस्ट का। फेस्ट के पहले दिन भारतीय साहित्य, पंजाब कला और कश्मीर पर चर्चा हुई। पैनल में साहित्य में जेसीबी पुरस्कार जीत चुके खालिद जावेद, क्रॉसवर्ड ट्रांसलेशन अवार्ड से पुरस्कृत अरुनाव सिन्हा, स्पीकिंग टाइगर पब्लिशिंग हाउस के सह संस्थापक रवि सिंह रहे शामिल रहे। चर्चा का संचालन लेखिका निरुपमा दत्त ने किया। चर्चा में सभी ने इस बात पर सहमति जताई कि वर्तमान समय में घरों से किताबें गायब होती जा रही हैं। समय के साथ हुए बदलाव के अलावा सरकार साहित्य का प्रोत्साहन करने में नाकामयाब साबित हो रही है। इसका नतीजा यह है कि युवा साहित्य से बेखबर हैं। खालिद जावेद ने कहा बिना साहित्य के पली पीढ़ी समाज के लिए नुकसानदायक है। अच्छे साहित्य की पहचान न होना, अच्छे लेखकों को बेहतर मौके न मिल पाना और खराब साहित्य का प्रचलन में आना भी समाज के लिए खतरा है। रवि सिंह ने कहा यूनाइटेड किंगडम, कनाडा, आदि देशों में न केवल लेखकों को बढ़ावा देने के लिए ट्रांसलेशन फंड जैसे आयाम हैं बल्कि लिखने की आजादी भी है।
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भारत की विविधता समझने के लिए स्थानीय साहित्य का अनुवाद जरूरी
साहित्य में अनुवाद की भूमिका पर प्रकाश डालते हुए रवि सिंह ने बताया कि अभी तक साहित्य का अनुवाद केवल हिंदी और अंग्रेजी भाषा तक सीमित रहा है। देश के हरेक राज्य का अपना अलग साहित्य है, पर सभी एक-दूसरे से अनजान है। वर्तमान समय में जरूरी है कि राज्य एक दूसरे के साहित्य को समझें, पंजाब का साहित्य मलयालम में, कन्नड़ का बंगाली में और इसी प्रकार स्थानीय पुस्तकों का अन्य स्थानीय भाषा में सीधा अनुवाद हो।
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अनुवाद शब्दों का अर्थ नहीं बताता, पर उसे समझने का देता है रास्ता
70 से अधिक पुस्तकों का अनुवाद कर चुके अरुनाव सिन्हा ने बताया किसी भी पुस्तक का कभी भी 100 प्रतिशत अनुवाद नहीं होता। भाषा लोगों के सोचने के तरीके, रहन-सहन को बयां करती है। अर्थ भाषा के साथ बदलते हैं। इसलिए अनुवादक शब्दों का अर्थ नहीं बताता बल्कि उसे समझने का रास्ता दर्शाता है। इसके अलावा कलाकार रब्बी शेरगिल, ठुकराल और तागरा ने समकालीन पंजाब के कला के बारे में अपने विचार व्यक्त किए। कश्मीर की स्थिति पर लेखक आशीष कोल और इंदर सलिम ने विचार प्रस्तुत किए और 2019 के बाद हुए बदलावों पर प्रकाश डाला।
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