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सुप्रीम कोर्ट में केंद्र के हलफनामे से शिअद-भाजपा गठबंधन मुश्किल में

Tue, 15 Mar 2016 10:56 AM IST
ब्यूरो/अमर उजाला, चंडीगढ़
ब्यूरो/अमर उजाला, चंडीगढ़ Updated Tue, 15 Mar 2016 10:56 AM IST
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SAD-BJP alliance in trouble due to centre's affidavit in Supreme Court on SYL issue
बादल और मोदी - फोटो : file photo

 सतलुज-यमुना लिंक नहर के मुद्दे पर एक बार फिर सियासत गरम हो गई है। संबंधित केस की सुनवाई सुप्रीम कोर्ट में आठ मार्च को होनी है। इससे पहले पंजाब और हरियाणा के राजनीतिक दल इस मुद्दे पर आमने-सामने आ गए हैं।

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सुप्रीम कोर्ट में केस की सुनवाई के दौरान 29 फरवरी को केंद्र सरकार की ओर से पेश हलफनामे ने पंजाब के सत्ताधारी शिअद-भाजपा गठबंधन को मुश्किल में डाल दिया है। शीर्ष अदालत में पंजाब सरकार के टर्मिनेशन ऑफ रिवर्स वाटर एक्ट-2004 पर प्रेसिडेंशियल रेफरेंस को लेकर सुनवाई चल रही है। इसमें सॉलिसिटर जनरल ने हलफनामा देकर कहा है कि केंद्र सरकार इस मुद्दे पर सुप्रीम कोर्ट की ओर से साल 2002 व 2004 में जारी आदेशों का समर्थन करती है।
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इन आदेशों में पंजाब को एसवाईएल नहर का निर्माण करने केनिर्देश दिए गए थे। पंजाब इनका शुरू से विरोध करता आ रहा है। केंद्र और पंजाब में शिअद और भाजपा की सरकार है। ऐसे में केंद्र सरकार के इस कदम से पंजाब सरकार घिरती नजर आ रही है। कांग्रेस और आम आदमी पार्टी ने इसे लेकर सरकार पर हमले तेज कर दिए हैं।
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फिर भी बादल का रुख साफ
दूसरी ओर पंजाब के मुख्यमंत्री प्रकाश सिंह बादल ने साफ किया है कि पंजाब का एक बूंद भी पानी नहीं दिया जाएगा। जाहिर है यदि सुप्रीम कोर्ट का फैसला पंजाब के खिलाफ आया तो शिअद के लिए काफी मुश्किल खड़ी हो सकती है। क्योंकि विधानसभा चुनाव को एक साल से भी कम समय बचा है।

पंजाबी सूबा बनने के साथ ही शुरू हो गया था विवाद

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प्रकाश सिंह बादल, पंजाब सीएम - फोटो : amar ujala

पंजाब और हरियाणा के बीच नदियों केपानी के बंटवारे को लेकर विवाद नवंबर-1966 में पंजाबी सूबा बनने केसाथ ही शुरू हो गया था। केंद्र सरकार ने पंजाब री-ऑर्गेनाइजेशन एक्ट में सेक्शन 78-80 जोड़ दिए थे। इसके तहत पंजाब में नदियों केपानी और हाइडिल पॉवर पर केंद्र का नियंत्रण हो गया था। अप्रैल-1976 में केंद्र सरकार ने एक नोटिफिकेशन जारी किया। इसके तहत पंजाब की नदियों के कुल 15.85 मिलियन एकड़ फीट पानी में से पंजाब व हरियाणा को 3.5-3.5 एमएएफ अलॉट कर दिया गया।

बाकी पानी राजस्थान, दिल्ली व जेएंडके को दिया गया। पंजाब सरकार इसके खिलाफ सुप्रीम कोर्ट चली गई। दिसंबर-1981 में तत्कालीन पीएम इंदिरा गांधी ने पंजाब, हरियाणा व राजस्थान के मुख्यमंत्रियों की बैठक बुलाई। केंद्र और तीनों राज्यों में कांग्रेस की सरकारें थीं। बैठक में एक त्रिपक्षीय समझौता हुआ। इसमें नए सिरे से बंटवारा तय हुआ। इस बार पानी 15.85 एमएएफ से बढ़कर 17.17 एमएएफ हो गया था। इसमें पंजाब को अपने हिस्से 4.22 एमएएफ के अलावा 1.32 एमएएफ और मिला। हरियाणा का हिस्सा 3.5 एमएएफ ही रहा। इसके बाद पंजाब ने सुप्रीम कोर्ट से केस वापस ले लिया।

अकाली दल ने खोला था धर्म युद्ध मोर्चा
अप्रैल-1982 में इंदिरा गांधी ने पटियाला केगांव कपूरी में एसवाईएल निर्माण कार्य का उद्घाटन किया। तभी अकाली दल ने इसके खिलाफ  धर्म युद्ध मोर्चा शुरू कर दिया। यह आंदोलन हिंसक होता गया और पंजाब को कई सालों तक आतंकवाद झेलना पड़ा। जुलाई-1985 में तत्कालीन पीएम राजीव गांधी और शिअद प्रधान हरचंद सिंह लोंगोवाल केबीच समझौता हुआ, जिसमें नदियों के पानी के बंटवारे पर ट्रिब्यूनल गठित करने का फैसला किया गया। ईराडी ट्रिब्यूनल बना, पर उसकी सिफारिशें लागू नहीं हो सकीं। सीएम एसएस बरनाला की सरकार में एसवाईएल का निर्माण शुरू हुआ। 90 फीसदी निर्माण के बाद 1992 में आतंकियों ने दो इंजीनियरों और कई मजदूरों को मार दिया, फिर निर्माण बंद हो गया। उधर, हरियाणा ने अपने हिस्से की नहर का निर्माण जून-1980 में ही कर लिया था।

एसवाईएल के निर्माण के लिए 1999 में सुप्रीम कोर्ट पहुंचा हरियाणा

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प्रकाश सिंह बादल, पंजाब सीएम - फोटो : amar ujala

विवाद का लंबा सिलसिला: पंजाब और हरियाणा के बीच नदियों केपानी के बंटवारे को लेकर विवाद नवंबर-1966 में पंजाबी सूबा बनने केसाथ ही शुरू हो गया था। केंद्र सरकार ने पंजाब री-ऑर्गेनाइजेशन एक्ट में सेक्शन 78-80 जोड़ दिए थे। इसके तहत पंजाब में नदियों केपानी और हाइडिल पॉवर पर केंद्र का नियंत्रण हो गया था।

अप्रैल-1976 में केंद्र सरकार ने एक नोटिफिकेशन जारी किया। इसके तहत पंजाब की नदियों के कुल 15.85 मिलियन एकड़ फीट पानी में से पंजाब व हरियाणा को 3.5-3.5 एमएएफ अलॉट कर दिया गया। बाकी पानी राजस्थान, दिल्ली व जेएंडके को दिया गया। पंजाब सरकार इसके खिलाफ सुप्रीम कोर्ट चली गई। दिसंबर-1981 में तत्कालीन पीएम इंदिरा गांधी ने पंजाब, हरियाणा व राजस्थान के मुख्यमंत्रियों की बैठक बुलाई। केंद्र और तीनों राज्यों में कांग्रेस की सरकारें थीं।

बैठक में एक त्रिपक्षीय समझौता हुआ। इसमें नए सिरे से बंटवारा तय हुआ। इस बार पानी 15.85 एमएएफ से बढ़कर 17.17 एमएएफ हो गया था। इसमें पंजाब को अपने हिस्से 4.22 एमएएफ के अलावा 1.32 एमएएफ और मिला। हरियाणा का हिस्सा 3.5 एमएएफ ही रहा। इसके बाद पंजाब ने सुप्रीम कोर्ट से केस वापस ले लिया।

अकाली दल ने खोला था धर्म युद्ध मोर्चा
अप्रैल-1982 में इंदिरा गांधी ने पटियाला केगांव कपूरी में एसवाईएल निर्माण कार्य का उद्घाटन किया। तभी अकाली दल ने इसके खिलाफ  धर्म युद्ध मोर्चा शुरू कर दिया। यह आंदोलन हिंसक होता गया और पंजाब को कई सालों तक आतंकवाद झेलना पड़ा। जुलाई-1985 में तत्कालीन पीएम राजीव गांधी और शिअद प्रधान हरचंद सिंह लोंगोवाल केबीच समझौता हुआ, जिसमें नदियों के पानी के बंटवारे पर ट्रिब्यूनल गठित करने का फैसला किया गया। ईराडी ट्रिब्यूनल बना, पर उसकी सिफारिशें लागू नहीं हो सकीं। सीएम एसएस बरनाला की सरकार में एसवाईएल का निर्माण शुरू हुआ। 90 फीसदी निर्माण के बाद 1992 में आतंकियों ने दो इंजीनियरों और कई मजदूरों को मार दिया, फिर निर्माण बंद हो गया। उधर, हरियाणा ने अपने हिस्से की नहर का निर्माण जून-1980 में ही कर लिया था।


1999 में हरियाणा ने सुप्रीम कोर्ट में केस दायर कर एसवाईएल के  निर्माण की मांग की। सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को दोनों राज्यों के बीच विवाद निपटाने को कहा। 2002 और 2004 में सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र को पंजाब में एसवाईएल का निर्माण पूरा करने के आदेश दिया। हालांकि पंजाब ने दलील दी कि बंटवारा जिस समय हुआ था, तब 17.17 एमएएफ पानी था, जो अब घटकर 14.37 एमएएफ रह गया है। इसलिए ट्रिब्यूनल गठित कर पंजाब में पानी की उपलब्धता का आकलन किया जाए। इसकेअलावा पंजाब की दलील रही है कि राजस्थान और हरियाणा उसकेराइपेरियन स्टेट ही नहीं है, इसलिए उनका पंजाब के पानी पर कोई हक नहीं है।

एसवाईएल के मुद्दे पर अमरिंदर निकालेंगे मार्च

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कैप्टन अमरिंदर सिंह - फोटो : file photo

कैप्टन ने रद्द कर दिया था त्रिपक्षीय समझौता: जुलाई-2004 तत्कालीन सीएम कैप्टन अमरिंदर सिंह ने सभी पार्टियों को साथ लेकर टर्मिनेशन ऑफ रिवर्स वाटर एक्ट पास किया। इससे पानी से संबंधित पुराने सारे समझौते रद्द कर दिए गए, जिनमें 1981 का त्रिपक्षीय समझौता भी शामिल था। केंद्र सरकार ने इस एक्ट की वैधता पर प्रेसिडेंशियल रेफरेंस मांगा। साल 2004 से 2009 तक उस पर सुनवाई चलती रही, पर कुछ नहीं हुआ।

साल 2004 में बतौर सीएम पंजाब के पानी को बचाने वाले कैप्टन अमरिंदर सिंह अब एसवाईएल के मुद्दे पर मार्च निकालेंगे। जोकि अबोहर के अंतिम गांव से शुरू होगा और एसवाईएल के रूट के साथ चलेगा। मार्च की तारीख का ऐलान जल्द किया जाएगा। सीएम प्रकाश सिंह बादल पर हमला बोलते हुए कैप्टन ने कहा कि सरकार पंजाब के हितों की रक्षा में नाकाम रही है। जिन बादल ने पानी के मुद्दे पर धर्म युद्ध मोर्चा निकाला था, आज उन्हें यह पता ही नहीं चला कि उनकी गठबंधन साझीदार भाजपा इस मुद्दे पर सुप्रीम कोर्ट में क्या स्टैंड लेने जा रही है। उन्होंने आशंका जताई कि बादल यह मान कर चल रहे हैं कि एक्ट पर प्रेसिडेंशियल रेफ्रेंस पर फैसला नवंबर-16 में आएगा। उस समय इस्तीफा देकर वह सियासी फायदा ले सकेंगे। उन्हें चाहिए कि वह हरसिमरत कौर बादल का केंद्रीय कैबिनेट से इस्तीफा दिलाएं और भाजपा से नाता तोड़ें।

पानी की एक बूंद भी नहीं देंगे बादल
मुख्यमंत्री प्रकाश सिंह बादल ने पानी के मुद्दे पर विचार करने को शिअद कोर कमेटी की बैठक बुलाई थी। हालांकि वह ऐन मौके पर स्थगित हो गई। बादल ने कहा कि इस मुद्दे पर पार्टी का स्टैंड साफ है। पंजाब के पास किसी को देने के लिए पानी नहीं है। पानी की एक बूंद किसी को नहीं दी जाएगी। इसके लिए हर स्तर पर लड़ाई लड़ी जाएगी। अकाली दल कोई भी कुर्बानी देने के तैयार है। बादल ने कहा कि हरियाणा का पंजाब केपानी पर कोई हक नहीं बनता। वह किसानों के हितों की रक्षा के लिए कुछ भी करेंगे।

राजनाथ से मिले भाजपा नेता
भाजपा नेताओं का एक दल इस मुद्दे पर केंद्रीय गृहमंत्री राजनाथ सिंह से मिला है। कैबिनेट मंत्री मदन मोहन मित्तल की अगुवाई में गए दल में केंद्रीय राज्यमंत्री विजय सांपला, कैबिनेट मंत्री सुरजीत ज्याणी और अविनाश राय खन्ना शामिल थे। भाजपा नेताओं ने राजनाथ सिंह से कहा है कि पानी का मुद्दा बेहद संवेदनशील है। अगर पंजाब केसाथ नाइंसाफी हुई तो सूबे का माहौल खराब हो सकता है।

पंजाब के पक्ष में आप
आम आदमी पार्टी भी पानी के मुद्दे पर पंजाब केपक्ष में आ गई है। पार्टी के पंजाब प्रभारी संजय सिंह ने कहा कि पार्टी हर स्थिति में पंजाब के पक्ष का समर्थन करेगी। अगर पंजाब के साथ कोई भी नाइंसाफी हुई तो इसका डटकर विरोध किया जाएगा।

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