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पितृपक्ष में कीजिए श्राद्ध बरसेगी पितरों की कृपा
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नीरज कुमार
चंडीगढ़। इस वर्ष पितृपक्ष का शुभारंभ सर्वार्थ सिद्धि एवं सिद्धि योग में 21 सितंबर से हो रहा है। इसमें 6 सर्वार्थ सिद्धि और दो सिद्धि योग शामिल हैं। मान्यता है कि इस योग में किया गया कोई भी कार्य फलदायी और सफल होता है। इस तरह पूरे पितृपक्ष में पितरों की कृपा बरसेगी। यह कहना है सेक्टर-30 के भृगु ज्योतिष केंद्र के प्रमुख पंडित बीरेंद्र नारायण मिश्र का।
उन्होंने कहा कि अपने पूर्वजों को याद करने और उनकी आत्मा की शांति के लिए पितृ पक्ष में पिंडदान, श्राद्ध किया जाता है ताकि उनकी कृपा बनी रहे और उनके आशीर्वाद से जिंदगी में सफलता, सुख समृद्धि मिले। पितृ पक्ष का समापन अंतिम श्राद्ध यानी अमावस्या को 6 अक्तूूबर को होगी।
बीरेंद्र नारायण मिश्र ने बताया कि आश्विन कृष्ण पक्ष श्राद्धपक्ष और पितृपक्ष कहलाता है। दिवंगत व्यक्तियों की मृत्यु तिथियों के अनुसार इस पक्ष में उनका श्राद्ध किया जाता है। श्राद्ध दो प्रकार के होते हैं। पार्वण और एकोदिष्ट श्राद्ध। आश्विन कृष्ण के पितृपक्ष में किए जाने वाले श्राद्ध को पार्वण श्राद्ध कहा जाता है। पार्वण श्राद्ध अपराह्न में मृत्यु तिथि के दिन की जाती है। उन्हाेंने बताया कि वर्ष में मृत्यु तिथि पर मासपक्ष में किए जाने वाले श्राद्ध को एकोदिष्ट श्राद्ध कहते हैं। एकोदिष्ट श्राद्ध हमेशा मध्याह्न में की जाती है।
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प्रोष्टपदी श्राद्ध...
यह पार्वण श्राद्ध है। भाद्रपद शुक्लपक्ष पूर्णिमा में यह श्राद्ध किया जाता है। यदि व्यक्ति की मृत्यु पूर्णिमा को हो तो उनका श्राद्ध भाद्रपद शुक्ल पूर्णिमा को होता है।
पितृपक्ष में श्राद्ध की तिथियां
पूर्णिमा श्राद्ध 20 सितंबर, प्रतिपदा श्राद्ध 21, द्वितीया श्राद्ध 22, तृतीया श्राद्ध 23, चतुर्थी श्राद्ध 24, पंचमी श्राद्ध 25, षष्ठी श्राद्ध 27, सप्तमी श्राद्ध 28, अष्टमी श्राद्ध 29, नवमी श्राद्ध 30 सितंबर को, दशमी श्राद्ध एक अक्तूबर, एकादशी श्राद्ध 2 को द्वादशी श्राद्ध 3 को, त्रयोदशी श्राद्ध 4 को, चतुर्दशी श्राद्ध 5 को और अमावस्या श्राद्ध 6 अक्तूबर को होगी।
यह जानना भी जरूरी...
बीरेंद्र नारायण मिश्र ने बताया कि इस वर्ष 26 और 27 सितंबर दोनों ही दिन षष्ठी तिथि लगभग समान रूप से अपराह्नव्यापिनी है। ऐसी स्थिति में धर्मशास्त्र का नियम है कि यह तिथि यदि 60 घड़ी से अधिक हो तो श्राद्ध दूसरे दिन किया जाए, इसलिए षष्ठी का श्राद्ध 26 को न होकर 27 सितंबर को होगी।
जिनकी मृत्यु तिथि पूर्णिमा हो, उनका श्राद्ध प्रोष्ठपदी पूर्णिमा को ही करना चाहिए। इस साल भाद्रपद शुक्ल पक्ष पूर्णिमा 20 सितंबर को अपराह्नव्यापिनी है। अपराह्ण काल पितरों का समय कहा गया है, इसलिए प्रोष्ठपदी पूर्णिमा का श्राद्ध 20 सितंबर को होगा।
सौभाग्यवती स्त्री का श्राद्ध हमेशा नवमी तिथि में को की जाती है। भले ही मृत्यु की तिथि कोई अन्य हो। इसी प्रकार संन्यासी की श्राद्ध हमेशा द्वादशी तिथि को होती है। मृत्यु शस्त्र, विष से या अकाल हुई हो श्राद्ध चतुर्दशी के दिन होती है। चतुर्दशी में सामान्य मृत्यु से मरने वालों का श्राद्ध अमावस्या या त्रयोदशी को करना चाहिए। शास्त्रों में यह भी विधान दिया गया है कि यदि किसी व्यक्ति को अपने पूर्वजों के देहांत की तिथि ज्ञात नहीं है तो ऐसे में इन पूर्वजों का श्राद्ध कर्म आश्विन अमावस्या को किया जा सकता है।
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चंडीगढ़। इस वर्ष पितृपक्ष का शुभारंभ सर्वार्थ सिद्धि एवं सिद्धि योग में 21 सितंबर से हो रहा है। इसमें 6 सर्वार्थ सिद्धि और दो सिद्धि योग शामिल हैं। मान्यता है कि इस योग में किया गया कोई भी कार्य फलदायी और सफल होता है। इस तरह पूरे पितृपक्ष में पितरों की कृपा बरसेगी। यह कहना है सेक्टर-30 के भृगु ज्योतिष केंद्र के प्रमुख पंडित बीरेंद्र नारायण मिश्र का।
उन्होंने कहा कि अपने पूर्वजों को याद करने और उनकी आत्मा की शांति के लिए पितृ पक्ष में पिंडदान, श्राद्ध किया जाता है ताकि उनकी कृपा बनी रहे और उनके आशीर्वाद से जिंदगी में सफलता, सुख समृद्धि मिले। पितृ पक्ष का समापन अंतिम श्राद्ध यानी अमावस्या को 6 अक्तूूबर को होगी।
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बीरेंद्र नारायण मिश्र ने बताया कि आश्विन कृष्ण पक्ष श्राद्धपक्ष और पितृपक्ष कहलाता है। दिवंगत व्यक्तियों की मृत्यु तिथियों के अनुसार इस पक्ष में उनका श्राद्ध किया जाता है। श्राद्ध दो प्रकार के होते हैं। पार्वण और एकोदिष्ट श्राद्ध। आश्विन कृष्ण के पितृपक्ष में किए जाने वाले श्राद्ध को पार्वण श्राद्ध कहा जाता है। पार्वण श्राद्ध अपराह्न में मृत्यु तिथि के दिन की जाती है। उन्हाेंने बताया कि वर्ष में मृत्यु तिथि पर मासपक्ष में किए जाने वाले श्राद्ध को एकोदिष्ट श्राद्ध कहते हैं। एकोदिष्ट श्राद्ध हमेशा मध्याह्न में की जाती है।
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प्रोष्टपदी श्राद्ध...
यह पार्वण श्राद्ध है। भाद्रपद शुक्लपक्ष पूर्णिमा में यह श्राद्ध किया जाता है। यदि व्यक्ति की मृत्यु पूर्णिमा को हो तो उनका श्राद्ध भाद्रपद शुक्ल पूर्णिमा को होता है।
पितृपक्ष में श्राद्ध की तिथियां
पूर्णिमा श्राद्ध 20 सितंबर, प्रतिपदा श्राद्ध 21, द्वितीया श्राद्ध 22, तृतीया श्राद्ध 23, चतुर्थी श्राद्ध 24, पंचमी श्राद्ध 25, षष्ठी श्राद्ध 27, सप्तमी श्राद्ध 28, अष्टमी श्राद्ध 29, नवमी श्राद्ध 30 सितंबर को, दशमी श्राद्ध एक अक्तूबर, एकादशी श्राद्ध 2 को द्वादशी श्राद्ध 3 को, त्रयोदशी श्राद्ध 4 को, चतुर्दशी श्राद्ध 5 को और अमावस्या श्राद्ध 6 अक्तूबर को होगी।
यह जानना भी जरूरी...
बीरेंद्र नारायण मिश्र ने बताया कि इस वर्ष 26 और 27 सितंबर दोनों ही दिन षष्ठी तिथि लगभग समान रूप से अपराह्नव्यापिनी है। ऐसी स्थिति में धर्मशास्त्र का नियम है कि यह तिथि यदि 60 घड़ी से अधिक हो तो श्राद्ध दूसरे दिन किया जाए, इसलिए षष्ठी का श्राद्ध 26 को न होकर 27 सितंबर को होगी।
जिनकी मृत्यु तिथि पूर्णिमा हो, उनका श्राद्ध प्रोष्ठपदी पूर्णिमा को ही करना चाहिए। इस साल भाद्रपद शुक्ल पक्ष पूर्णिमा 20 सितंबर को अपराह्नव्यापिनी है। अपराह्ण काल पितरों का समय कहा गया है, इसलिए प्रोष्ठपदी पूर्णिमा का श्राद्ध 20 सितंबर को होगा।
सौभाग्यवती स्त्री का श्राद्ध हमेशा नवमी तिथि में को की जाती है। भले ही मृत्यु की तिथि कोई अन्य हो। इसी प्रकार संन्यासी की श्राद्ध हमेशा द्वादशी तिथि को होती है। मृत्यु शस्त्र, विष से या अकाल हुई हो श्राद्ध चतुर्दशी के दिन होती है। चतुर्दशी में सामान्य मृत्यु से मरने वालों का श्राद्ध अमावस्या या त्रयोदशी को करना चाहिए। शास्त्रों में यह भी विधान दिया गया है कि यदि किसी व्यक्ति को अपने पूर्वजों के देहांत की तिथि ज्ञात नहीं है तो ऐसे में इन पूर्वजों का श्राद्ध कर्म आश्विन अमावस्या को किया जा सकता है।