फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
डाउनलोड करें

सब्सक्राइब करें
Hindi News ›   Chandigarh ›   Peepal tree has become a heritage... big decisions were once taken here

Chandigarh News: विरासत बन गया पीपल का पेड़...कभी यहां होते थे बड़े-बड़े फैसले

Thu, 25 Jan 2024 04:41 AM IST
Chandigarh Bureau चंडीगढ़ ब्यूरो
Updated Thu, 25 Jan 2024 04:41 AM IST
विज्ञापन
Peepal tree has become a heritage... big decisions were once taken here
चंडीगढ़। पीपल का वह पेड़ अब विरासत बन गया, जिसके नीचे बैठकर कभी बड़े-बड़े फैसले हुआ करते थे। बात हो रही है सेक्टर-38 स्थित गुरुद्वारा साहिब शाहपुर चोलियां की। गुरुद्वारा साहिब परिसर में 300 वर्ष से भी अधिक पुराना पीपल का पेड़ है। इस पेड़ में बड़ और नीम भी साथ है। चंडीगढ़ के बनने से पहले यह गांव शाहपुर चोलियां था, जो अंबाला जिले में पड़ता था। इसका डाकखाना मुल्लांपुर गरीबदास होता था। गांव की जमीन का यूटी प्रशासन ने अधिग्रहण कर लिया, लेकिन गुरुद्वारा साहिब वहीं पर है। पीपल का पेड़ धर्मशाला के साथ लगा था। गांव में किसी भी प्रकार का मामला होता तो गांव के बड़े बुजुर्ग लोग इसी पेड़ के नीचे बातचीत कर सुलझाया करते थे। गांव के लोग यहां दोपहर में एकत्र होते थे। यहीं पर लोहार गांव के लोगों के हल व अन्य कृषि से जुड़े औजार बनाते थे। इसी पेड़ के नीचे रासलीला व पुआधी अखाड़ा लगता था। पूरी रात नाच गाना चलता था। यहीं कुआं होता था। उसमें रहट भी लगा करती थी।
विज्ञापन

प्रशासन गुरुघर को भी हेरिटेज घोषित करे
गुरुद्वारा साहिब के प्रधान जत्थेदार तारा सिंह ने बताया कि यह गुरुद्वारा साहिब आजादी से पहले बना है। इसे 1944 में निर्मित किया गया है। उनका यह रंगला गांव था। वर्ष 1973 में गांव की जमीन का प्रशासन ने अधिग्रहण कर लिया। अब यह गांव सेक्टर-38 बन गया है।
विज्ञापन

पेड़ की देखरेख करते हैं
तारा सिंह का कहना है कि प्रशासन पेड़ की देखरेख के लिए समय समय पर प्रूनिंग व दवाइयों का छिड़काव करवाता है। इसकी देखरेख गुरुद्वारा साहिब प्रबंधन करता है ताकि कहीं दीमक आदि न लग जाएं। गुरुद्वारा साहिब के परिसर में दो हेरिटेज पेड़ हैं। पीपल, नीम और बड़ एक साथ है। दूसरा पेड़ केवल बरगद का है।
विज्ञापन
विज्ञापन


1946 में बना था गुरुद्वारा
दूसरे विश्व युद्ध के दौरान गांव के सैनिक जर्मनी में लड़ाई के लिए गए थे। ये सभी सिख रेजिमेंट के सैनिक थे। जब ये सैनिक गांव आने लगे तो इनमें से एक हवलदार शमशेर सिंह को अंग्रेज ने श्री गुरुग्रंथ साहिब का स्वरूप भेंट किया। वह इस स्वरूप को मर्यादा के साथ अपने गांव लेकर आए। गांव के लोगों ने स्वरूप को धर्मशाला में स्थापित किया। इसके बाद गांव के लोगों ने मिलकर वर्ष 1946 में गुरुद्वारा साहिब का निर्माण किया। सैनिकों में हवलदार शमशेर सिंह, लखा सिंह, सूबेदार हजारा सिंह, सरदारा सिंह, बखतौर सिंह, लछमन सिंह, धर्म सिंह, कर्म सिंह, गुरनाम सिंह, गुरदियाल सिंह शामिल थे।
विज्ञापन
विज्ञापन

रहें हर खबर से अपडेट, डाउनलोड करें Android Hindi News App, iOS Hindi News App और Amarujala Hindi News APP अपने मोबाइल पे|
Get all India News in Hindi related to live update of politics, sports, entertainment, technology and education etc. Stay updated with us for all breaking news from India News and more news in Hindi.

विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन

एड फ्री अनुभव के लिए अमर उजाला प्रीमियम सब्सक्राइब करें

Next Article

AU ऐप में पढ़ें

Followed