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बेसुरी बांसुरी वाले दोस्त ने सूद को बचाया था आतंकियों से
ब्यूरो/अमर उजाला, चंडीगढ़।
Updated Sat, 09 Jan 2016 10:29 AM IST
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वो दिन में कभी नहीं भूल सकता, आतंकवादी मुझे सीआरपीएफ जवान समझकर उठाकर ले गए थे और मेरे एक दोस्त की बेसुरी बांसुरी की धुन ही मुझे बचा गई। अमर उजाला से खास बातचीत में जब उनसे जिंदगी के ऐसे किसी घटनाक्रम के बारे में पूछा गया जो उन्हें ताउम्र याद रहे तो उन्होंने यह बात साझा की।
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चंडीगढ़ संवाद कार्यक्रम में नवनियुक्त मेयर अरुण सूद ने बताया कि 1992 में जब वह अमृतसर की गुरु नानक देव यूनिवर्सिटी में एलएलबी की पढ़ाई कर रहे थे, उस दौरान आतंकवाद का समय था और शाम छह बजे के बाद पुलिस थाने भी बंद हो जाते थे, शाम को वाहन बंद हो जाते थे। उस समय वह गुरदासपुर के एबीवीपी के संगठन मंत्री थे।
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सूद ने बताया कि वह पठानकोट में एक बैठक में हिस्सा लेने गए थे, लेकिन अगले दिन उनका लॉ का एक पेपर था जिस कारण उन्हें लौटना पड़ा लेकिन उन्हें देर हो गई। उन्होंने बताया कि एक ट्रक वाले ने उन्हें कहा कि वह अमृतसर छोड़ देगा, लेकिन बटाला के पास ट्रक चालक ने आगे चलने से इंकार कर दिया। पेपर था इसलिए वह पैदल ही अमृतसर को चल पड़े। रात 11:30 बजे का समय होगा, पीछे से कुछ लोग (जो कि आतंकवादी थे) घोड़े पर आए।
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उनके बाल छोटे थे तो आतंकवादियों को लगा कि वह (सूद) सीआरपीएफ के जवान हैं। इसलिए उन्हें उठाकर ले गए। वह उन्हें सुनसान जगह पर ले गए और पूछताछ करते रहे। उन्होंने बताया कि एक आतंकवादी ऐसा था जो उनके साथ पढ़ने वाले एक दोस्त (बेदी) का चचेरा भाई था। उन्होंने बताया कि उनके दोस्त को बांसुरी बजाने का शौक था, लेकिन वह बेसुरी बजाता था तो कोई भी उसकी बांसुरी नहीं सुनता था, लेकिन वह बेदी दोस्त की बांसुरी आधे-आधे घंटे तक सुन लेते थे जिससे दोस्त खुश हो जाता था।
उन्होंने बताया कि बेदी का दोस्त बताने के बाद उग्रवादी ने उन्हें छोड़ तो दिया, लेकिन वह उसे विश्वविद्यालय के हॉस्टल में बेदी के पास ले गए और वहां उससे उनकी शिनाख्त करवाई। सूद ने बताया कि उस समय आतंकवादियों को उन्होंने पूछताछ के दौरान नहीं बताया कि वह संघ से जुड़े हुए हैं क्योंकि ऐसा बताने पर कुछ गड़बड़ हो जाती।