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पीयू में छोटे विभागों के विलय पर फिलहाल लगा विराम.. अब पीयू सीनेट पर नजर
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चंडीगढ़। पंजाब यूनिवर्सिटी के छोटे विभागों का विलय अब नई सीनेट ही कर पाएगी। पीयू ने इस पर चल रहा काम फिलहाल रोक दिया है। इसका कारण यह है कि कमेटी की ओर से विलय का जो प्रस्ताव तैयार किया जाना था, उसे भी आखिरी मंजूरी सीनेट की ओर से ही दी जानी थी। इसलिए अब सीनेट के हवाले ही यह काम छोड़ दिया गया है।
वर्ष 2015 में नैक की टीम ने ग्रेडिंग के लिए पीयू का दौरा किया था। इस टीम ने पीयू की कई खामियों को उजागर किया और फिर अपनी रिपोर्ट सौंपी। कुछ महत्वपूर्ण सुझाव भी दिए। इन सुझावों में एक यह भी था कि छोटे विभागों का विलय उनसे जुड़े दूसरे विभागों में कर दिया जाए। इसके पीछे तर्क था कि कर्मचारियों की संख्या बढ़ानी होगी और शिक्षक भी ज्यादा तैनात होंगे। विभागों को एक कर दिया जाएगा तो कम स्टाफ में भी काम चलाया जा सकेगा और कई अन्य सुविधाएं भी मिल सकेंगी।
नैक की टीम के सुझाव के बाद पीयू ने इसके लिए कमेटियां बनाईं, लेकिन ये कमेटियां कागजों में ही विभागों का विलय करती रहीं। कुछ न कुछ अड़चनें आती गईं। कई बार कमेटियां बनीं। वर्ष 2019 में भी कमेटी बनी। प्रस्ताव भी तैयार हुआ, लेकिन उसे लागू नहीं किया जा सका। हालांकि उस प्रस्ताव को पसंद नहीं किया गया। उसके बाद दोबारा विभागों का प्रस्ताव तैयार होने लगा। पीयू की एक कमेटी मार्च में इस प्रस्ताव पर तेजी से कार्य कर रही थी। जब हाईकोर्ट से सीनेट चुनाव कराने के आदेश आए तो कमेटी ने इस पर काम धीमा कर दिया। पीयू की प्राथमिकता अब सीनेट चुनाव करवाने की है।
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इनसेट
उर्दू भाषा को लेकर खड़ा हुआ था विवाद
पीयू की ओर से पिछले वर्षों में भाषा से जुड़े कोर्सों को एक करने की तैयारी की थी। उर्दू को विदेशी भाषा में शामिल कर दिया गया। इस पर हंगामा हो गया और लोगों ने इसे मुद्दा बना दिया। पंजाब के मुख्यमंत्री कैप्टन अमरिंदर सिंह ने भी इस पर आपत्ति दायर की थी। उन्होंने कहा कि उर्दू विदेशी भाषा नहीं है। मामला ऊपर तक पहुंचा तो इस प्रस्ताव को टाल दिया गया। मार्च में जो प्रस्ताव तैयार हो रहा था, उसमें विवाद की गुंजाइश न के बराबर बताई जा रही थी। हालांकि यह प्रस्ताव आगे बढ़ाया जाएगा।
इनसेट
विभागों के नए चेयरमैन कर सकते हैं विरोध
पीयू कमेटी ने विभागों के विलय पर प्रस्ताव तैयार किया था। उस प्रस्ताव को ही सीनेट यदि मंजूरी देेती है तो विभागों को कुछ राहत मिल सकती है। यदि सीनेट ने इसे स्वीकार न कर नए सिरे से काम किया तो फिर विभागों को आपत्ति हो सकती है। वह विरोध जता सकते हैं। हालांकि प्रस्ताव पहले सामने आए, उसके बाद ही कुछ निर्णय हो सकेगा।
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वर्ष 2015 में नैक की टीम ने ग्रेडिंग के लिए पीयू का दौरा किया था। इस टीम ने पीयू की कई खामियों को उजागर किया और फिर अपनी रिपोर्ट सौंपी। कुछ महत्वपूर्ण सुझाव भी दिए। इन सुझावों में एक यह भी था कि छोटे विभागों का विलय उनसे जुड़े दूसरे विभागों में कर दिया जाए। इसके पीछे तर्क था कि कर्मचारियों की संख्या बढ़ानी होगी और शिक्षक भी ज्यादा तैनात होंगे। विभागों को एक कर दिया जाएगा तो कम स्टाफ में भी काम चलाया जा सकेगा और कई अन्य सुविधाएं भी मिल सकेंगी।
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नैक की टीम के सुझाव के बाद पीयू ने इसके लिए कमेटियां बनाईं, लेकिन ये कमेटियां कागजों में ही विभागों का विलय करती रहीं। कुछ न कुछ अड़चनें आती गईं। कई बार कमेटियां बनीं। वर्ष 2019 में भी कमेटी बनी। प्रस्ताव भी तैयार हुआ, लेकिन उसे लागू नहीं किया जा सका। हालांकि उस प्रस्ताव को पसंद नहीं किया गया। उसके बाद दोबारा विभागों का प्रस्ताव तैयार होने लगा। पीयू की एक कमेटी मार्च में इस प्रस्ताव पर तेजी से कार्य कर रही थी। जब हाईकोर्ट से सीनेट चुनाव कराने के आदेश आए तो कमेटी ने इस पर काम धीमा कर दिया। पीयू की प्राथमिकता अब सीनेट चुनाव करवाने की है।
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उर्दू भाषा को लेकर खड़ा हुआ था विवाद
पीयू की ओर से पिछले वर्षों में भाषा से जुड़े कोर्सों को एक करने की तैयारी की थी। उर्दू को विदेशी भाषा में शामिल कर दिया गया। इस पर हंगामा हो गया और लोगों ने इसे मुद्दा बना दिया। पंजाब के मुख्यमंत्री कैप्टन अमरिंदर सिंह ने भी इस पर आपत्ति दायर की थी। उन्होंने कहा कि उर्दू विदेशी भाषा नहीं है। मामला ऊपर तक पहुंचा तो इस प्रस्ताव को टाल दिया गया। मार्च में जो प्रस्ताव तैयार हो रहा था, उसमें विवाद की गुंजाइश न के बराबर बताई जा रही थी। हालांकि यह प्रस्ताव आगे बढ़ाया जाएगा।
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विभागों के नए चेयरमैन कर सकते हैं विरोध
पीयू कमेटी ने विभागों के विलय पर प्रस्ताव तैयार किया था। उस प्रस्ताव को ही सीनेट यदि मंजूरी देेती है तो विभागों को कुछ राहत मिल सकती है। यदि सीनेट ने इसे स्वीकार न कर नए सिरे से काम किया तो फिर विभागों को आपत्ति हो सकती है। वह विरोध जता सकते हैं। हालांकि प्रस्ताव पहले सामने आए, उसके बाद ही कुछ निर्णय हो सकेगा।