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Hindi News ›   Chandigarh ›   Many Women student Leaders of Panjab University did not pursue career in politics after college

शादी का दबाव, कॅरिअर की चाह: पंजाब यूनिवर्सिटी के छात्रसंघ चुनाव में सक्रिय रहती महिला नेता, पढ़ाई के बाद छोड़ देती हैं सियासत

Mon, 16 May 2022 11:04 AM IST
निवेदिता वर्मा कविता बिश्नोई, अमर उजाला, चंडीगढ़
कविता बिश्नोई, अमर उजाला, चंडीगढ़ Published by: निवेदिता वर्मा Updated Mon, 16 May 2022 11:04 AM IST
सार

75 से 80 प्रतिशत छात्राएं होने के बावजूद पंजाब यूनिवर्सिटी की छात्र राजनीति में अब लड़कियों की भागीदारी महज 20 प्रतिशत तक सिमट कर रह गई है। छात्राएं स्वीकार करती हैं कि पढ़ाई के दौरान कैंपस में तो उन्हें राजनीतिक गतिविधियों में हिस्सा लेने की छूट होती है लेकिन पढ़ाई पूरी होते ही उन पर अच्छे कॅरियर, शादी आदि का दबाव बढ़ जाता है।

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Many Women student Leaders of Panjab University did not pursue career in politics after college
पंजाब यूनिवर्सिटी में चुनाव प्रचार में हिस्सा लेतीं छात्राएं। - फोटो : फाइल

विस्तार

चंडीगढ़ की पंजाब यूनिवर्सिटी ने सक्रिय राजनीति को पवन बंसल, सत्यपाल जैन, राजीव प्रताप रूडी समेत कई सितारे दिए लेकिन महिला नेता यहां से कम ही निकलीं। बीते लंबे समय से पीयू की छात्र राजनीति से ऐसी कोई महिला नेता सामने नहीं आई, जिसने राष्ट्रीय स्तर पर अपनी पहचान बनाई हो। ऐसा नहीं कि पीयू की छात्र राजनीति में महिलाओं की भागीदारी कम है। यहां की छात्राएं पढ़ाई के साथ राजनीति में खूब सक्रिय हैं लेकिन पढ़ाई के बाद वह राजनीति को कॅरिअर के रूप में नहीं चुनतीं।

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छात्र जीवन में इन छात्राओं ने छात्रसंघ के विभिन्न पदों पर चुनाव लड़ा और जीत भी हासिल की मगर पढ़ाई पूरी होते ही सामाजिक बंधन या शादी के कारण राजनीति को बिसार दिया। इसका असर यह है कि 75 से 80 प्रतिशत छात्राएं होने के बावजूद पंजाब यूनिवर्सिटी की छात्र राजनीति में अब लड़कियों की भागीदारी महज 20 प्रतिशत तक सिमट कर रह गई है।
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पंजाब यूनिवर्सिटी की छात्र राजनीति में हिस्सा लेने वाली कई छात्राएं स्वीकार करती हैं कि पढ़ाई के दौरान कैंपस में तो उन्हें राजनीतिक गतिविधियों में हिस्सा लेने की छूट होती है लेकिन पढ़ाई पूरी होते ही उन पर अच्छे कॅरियर, शादी आदि का दबाव बढ़ जाता है। यही नहीं सक्रिय राजनीति में न जाने का पारिवारिक और सामाजिक दबाव भी रहता है। ऐसे में लड़कियां अच्छी वक्ता या नेता होने के बावजूद सक्रिय राजनीति में अपना कॅरिअर नहीं बना पातीं। 

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पीयू छात्रसंघ चुनाव में कब-कब लड़कियों ने लिया हिस्सा

1. वर्ष 1998 में सोपू से सारिका मलिक ने उपाध्यक्ष पद पर जीत हासिल की थी 
2. वर्ष 1999 में सोपू से स्मृति शर्मा ने उपाध्यक्ष पद पर जीत हासिल की थी 
3. वर्ष 2006 में इनसो से दिव्या गिल ने उपाध्यक्ष के लिए चुनाव लड़ा था लेकिन हार गईं
4. वर्ष 2009 में इनसो से दीपिका ठाकुर ने सेक्रेटरी पद पर जीत दर्ज की थी  
5. वर्ष 2010 में इनसो से विभा सेठी ने उपाध्यक्ष पद पर जीत दर्ज की थी 
6. वर्ष 2012 में इनसो से रीता घेल ने अध्यक्ष पद के लिए चुनाव लड़ा था लेकिन जीत नहीं पाईं 
7. वर्ष 2013 में इनसो से आभा शर्मा ने सेक्रेटरी पद का चुनाव लड़ा और जीत दर्ज की थी
8. वर्ष 2015 में इनसो से स्वाति टिवाना ने ज्वाइंट सेक्रेटरी पद पर जीत दर्ज की थी  
9. वर्ष 2016 में इनसो से सभ्या जायसवाल ने उपाध्यक्ष पद के लिए चुनाव लड़ा था लेकिन हार गईं 
10. वर्ष 2017 में इनसो से शैविलिनी सिंह ने सेक्रेटरी पद पर चुनाव लड़ा था लेकिन जीत नहीं पाईं 
11. वर्ष 2014 में एसएफएस से अमन ने अध्यक्ष पद के लिए चुनाव लड़ा था लेकिन जीत नहीं पाईं 
12. वर्ष 2017 में एसएफएस से हसनप्रीत ने अध्यक्ष पद के लिए चुनाव लड़ा था लेकिन जीत नहीं पाईं
13. वर्ष 2018 में एसएफएस से कनुप्रिया ने अध्यक्ष पद के लिए चुनाव लड़ा और पहली महिला अध्यक्ष बनकर उभरी थीं 
14. वर्ष 2019 में एसएफएस से प्रिया ने अध्यक्ष पद के लिए चुनाव लड़ा था लेकिन जीत दर्ज नहीं कर सकीं  
15. वर्ष 2017 में पीएसयू ललकार से अमन ने जनरल सेक्रेटरी के लिए चुनाव लड़ा था लेकिन जीत नहीं पाईं 
16. वर्ष 2016 में एनएसयूआई से सिया ने अध्यक्ष पद के लिए चुनाव लड़ा था लेकिन जीत नहीं पाईं
17. वर्ष 2017 में एनएसयूआई से ईज्या सिंह ने सेक्रेटरी पद के लिए चुनाव लड़ा था लेकिन जीत नहीं पाईं  
18. वर्ष 2017 में वानी सूद ने जनरल सेक्रेटरी पद का चुनाव जीता था 
19. वर्ष 2013 में एबीवीपी की दिशा अरोड़ा ने उपाध्यक्ष पद का चुनाव जीता था
20. वर्ष 2016 में एबीवीपी की मानवी गांधी ने ज्वाइंट सेक्रेटरी का चुनाव लड़ा था लेकिन जीत नहीं पाईं

पीयू छात्रसंघ चुनाव एक नजर में 

1965-66 : पंजाब यूनिवर्सिटी में अप्रत्यक्ष रूप से छात्रसंघ चुनाव की शुरुआत हुई
1983 : आपातकाल के बाद से पीयू में छात्रसंघ चुनाव पर रोक लगा दी गई थी  
1997 : 1996 में छात्रों के प्रदर्शन के बाद तत्कालीन वीसी एमएम पुरी ने फिर से छात्रसंघ चुनावों को बहाल करवाया 
1977 : पीयू में प्रत्यक्ष रूप से छात्रसंघ चुनाव शुरू हुए। इससे पहले विभागों के डिपार्टमेंट रिप्रेजंटेटिव (डीआर) छात्रसंघ अध्यक्ष, उपाध्यक्ष इत्यादि का चुनाव करते थे। 
 

महिलाएं अच्छी वक्ता होती हैं, पर राजनीति में नहीं मिलता बराबर का मौका  

पंजाब यूनिवर्सिटी के साथ मैंने आम चुनाव में कांग्रेस के लिए कैंपेन काम किया। दोनों ही जगहों पर महिलाओं को निर्णय लेने के पदों और मुख्यधारा के पदों पर स्थान नहीं दिया जाता। महिलाओं को खुद को साबित करना पड़ता है। राजनीति में महिलाओं को समान स्थान बनाने के लिए अभी बहुत लंबा संघर्ष करना पड़ेगा। हमारे समय में पीयू में प्रदर्शन इत्यादि राजनीतिक गतिविधियों में भी लड़कियों की भागीदारी कम रहती थी क्योंकि लड़कियों पर घर से दबाव रहता था कि पढ़ाई में अच्छा प्रदर्शन करना है और कोई शिकायत नहीं आनी चाहिए। महिलाएं बहुत अच्छी वक्ता होती हैं इसलिए लोग भी उनकी बातें धैर्य से सुनते हैं और जुड़ाव भी अधिक महसूस करते हैं लेकिन राजनीति में उन्हें बराबर का मौका नहीं मिलता।  - बेनजीर, पूर्व डीआर, कानून विभाग 

लड़कियों के राजनीति में जाने के लिए अभिभावकों का सहयोग कम  
मैंने वर्ष 2016 में एनएसयूआई की तरफ से छात्रसंघ अध्यक्ष का चुनाव लड़ा था। पीयू के छात्रसंघ चुनाव में लड़कियां वोट तो देती हैं, लेकिन राजनीतिक गतिविधियों में उनकी भागीदारी बहुत कम (10 प्रतिशत तक) रहती है। वर्ष 2011 से पहले काफी लड़कियां चुनाव और राजनीतिक गतिविधियों में हिस्सा लेती थीं लेकिन समय के साथ यह ग्राफ बढ़ने के बजाय कम होता जा रहा है। लड़कियों के राजनीति में जाने के लिए अभिभावकों और समाज का सहयोग भी बहुत कम मिलता है, जिसके कारण वह पार्टी की वर्कर तो बन जाती हैं लेकिन लीडर नहीं बन पातीं। इसके लिए समान अवसर मिलना बहुत जरूरी है।  - सिया, राष्ट्रीय समन्वयक, एनएसयूआई  

लड़कियां मुद्दों पर सहमत होती, आवाज नहीं उठाती   
पंजाब यूनिवर्सिटी में लड़कियां छात्रहित से लेकर बहुत सारे सामाजिक मुद्दों पर मुखर होना चाहती हैं लेकिन चाहकर भी अपनी आवाज नहीं उठा पातीं। उन पर इस बात का पारिवारिक और सामाजिक दबाव रहता है कि राजनीति में भागीदारी नहीं करनी है। लड़कियों को राजनीति में आगे लाने के लिए मुझे लगता है उनकी लीडर भी महिला होनी चाहिए। पीयू में अभी भी बहुत सारे लड़कियों के मसले पार्टियों में मुख्यधारा में बैठे लड़के ही उठाते हैं। बहुत कम पार्टियों में लड़कियां किसी ओहदे पर हैं इसलिए पहले ये बदलाव बहुत जरूरी है, अगर लड़की लीडर होगी तो अन्य लड़कियां भी उन्हें देखकर प्रेरित होंगी।  - अमन, जनरल सेक्रेटरी उम्मीदवार, वर्ष 2017 

लड़कियों पर शादी का दबाव अधिक 
पंजाब यूनिवर्सिटी में छात्रसंघ चुनाव में अध्यक्ष पद के लिए मैंने वर्ष 2019 में चुनाव लड़ा था। उस दौरान कैंपेनिंग में लड़कियों की भागीदारी बहुत कम रहती थी। लड़कियां खुद से अपने मुद्दों को लेकर आगे नहीं आतीं, उन्हें प्रेरित कर आगे लाना पड़ता है। लड़कियों को पढ़ाई कर नौकरी या पढ़ाई के बाद शादी करने को लेकर अभिभावकों का दबाव रहता है। ये मुख्य कारण है कि छात्र राजनीति में लड़कियां आगे नहीं आ पातीं हैं। इसके अलावा लड़कियों को भी लगता है, राजनीति में जाकर समय ही बर्बाद होगा। - प्रिया, अध्यक्ष पद उम्मीदवार, वर्ष 2019 
 

पीयू राजनीति में 70:30 का अनुपात 

पंजाब यूनिवर्सिटी की छात्र राजनीति में अगर लड़कियों की भागीदारी की बात करें तो 70:30 का अनुपात रहता है। लड़कियां राजनीति में कम ही आगे आती हैं। पढ़ाई पर उनका फोकस ज्यादा रहता है। मैं फैशन टेक्नोलॉजी डिपार्टमेंट से थी इसलिए लड़कियों का अधिक साथ रहता था और लड़कियां अपने मुद्दों को लेकर सजग भी थीं अन्यथा पूरी यूनिवर्सिटी के माहौल को देखा जाए तो वहां लड़कियों की भागीदारी कम रहती है। - मोहिनी, पूर्व डीआर, फैशन टैक्नोलॉजी विभाग  

क्या कहती हैं पीयू की छात्राएं

1. नए विद्यार्थियों के राजनीति में आने में लगेगा समय  
नए विद्यार्थियों में अपने मुद्दों को उठाने या सामाजिक व राजनीतिक मुद्दों पर आगे आने में काफी झिझक है। इनको राजनीतिक माहौल में ढलने में समय लगेगा क्योंकि कोरोना के कारण कैंपस बंद होने से बड़ा अंतराल आ गया है। हालांकि मेस के बढ़े मूल्यों को लेकर जब गर्ल्स हॉस्टल में प्रदर्शन किया था, उस दौरान लड़कियों की भागीदारी अच्छी देखने को मिली थी।  - भवनजोत, छात्रा, दर्शनशास्त्र विभाग 

2. लॉकडाउन में निकली डिग्री, नहीं देखी छात्र राजनीति  
दो साल एमएससी के थे, इसमें डेढ़ साल पंजाब यूनिवर्सिटी के बंद रहने के कारण डिग्री ऑनलाइन ही रह गई। छात्र राजनीति देखी ही नहीं। अब अंतिम सेमेस्टर है तो अन्य गतिविधियों में हिस्सा लेने का समय भी नहीं है। विभागों में राजनीतिक गतिविधियां होते देखी हैं लेकिन वहां भी लड़कियों की भागीदारी कम ही होती है। अगर दस छात्र बैनर लेकर आए हैं तो उनमें मुश्किल से तीन लड़कियां होती हैं। - दीक्षा, छात्रा, भौतिकी विज्ञान 

3. राजनीति में कोई रुचि नहीं  
छात्र राजनीति में मेरी कोई रुचि नहीं है और हमने देखी भी नहीं है। हमारा पूरा कोर्स कोरोना काल में ही निकला है। राजनीति में अगर लड़कियां आती हैं तो हम उनका जरूर साथ देंगे क्योंकि अगर लड़की राजनीति में होगी तो वे हमारे मुद्दों को ठीक से उठाएगी, जो कि लड़कों की तरफ से नकार दिए जाते हैं।  - स्वाति, छात्रा, एमसएसी की छात्रा

4. लड़कियों पर कॅरिअर को लेकर अधिक दबाव 

लड़कियां अगर राजनीति में रुचि रखती भी हैं तो घर की तरफ से दबाव रहता है कि प्राथमिकता कॅरियर और पढ़ाई की ही रहे। लड़कियों को लड़कों के मुकाबले उतना पारिवारिक और सामाजिक सहयोग नहीं मिल पाता। वर्ष 2019 के छात्र चुनावों में काम किया था तब देखा था कि लड़कियां अपने दोस्तों के ग्रुप में अधिक सहयोग करती हैं। चुनावों में अधिक रुचि नहीं रहती है।  - तमन्ना, छात्रा, कानून विभाग 
 

क्या कहते हैं पंजाब यूनिवर्सिटी से निकले नेता

70 के दशक से वर्तमान में नहीं आया अधिक बदलाव   
पंजाब यूनिवर्सिटी के छात्रसंघ चुनावों में हम 70 के दशक में सक्रिय थे। मैंने जनरल सेक्रेटरी के लिए चुनाव लड़ा था। उस दौरान 80 डेलीगेट्स में 5 या 6 लड़कियां होती थीं। हालांकि उस दौरान उच्च शिक्षा में लड़कियों का प्रतिशत भी 40 के करीब था, जो कि आज बढ़कर 70 से 80 प्रतिशत हो गया है। इसके बावजूद भी वर्तमान में मुश्किल से 20 प्रतिशत लड़कियां राजनीति में रुचि दिखाती हैं। इसका कारण है कि लड़कियां पहले अच्छी नौकरी को प्राथमिकता देती हैं, जिससे भविष्य संवर सकें। दूसरा चुनाव आज के समय में बहुत महंगा और खराब हो गया है, लड़कियों को उस ढंग से सहयोग नहीं मिल पाता।  - सत्यपाल जैन, पीयू के पूर्व छात्रनेता व शहर के पूर्व सांसद, वर्तमान सीनेटर 

सामाजिक बाध्यता के कारण महिलाएं राजनीति में नहीं आ पाईं आगे  

पीयू छात्रसंघ चुनाव में मैं दो बार वर्ष 1998 और 1999 में अध्यक्ष चुना गया था। इन दोनों वर्षों में उपाध्यक्ष पद पर महिला चुनी गईं थीं। वर्ष 1998 में सारिका मलिक और वर्ष 1999 में स्मृति उपाध्यक्ष रहीं। पीयू परिसर में फिर भी छात्राएं राजनीति में दिखती हैं, लेकिन सक्रिय राजनीति में सामाजिक बाध्यताओं के कारण महिलाएं आगे नहीं बढ़ पातीं। देश के पास अच्छी महिला नेता बहुत कम हैं, हालांकि लड़कियां डिफेंस, ब्यूरोक्रेसी इत्यादि में अपना स्थान बना चुकी हैं। - डॉ. डीपीएस रंधावा, पूर्व छात्र नेता और वर्तमान सीनेटर 

राजनीति में लड़कियों के लिए शादी बड़ी बाधा  

राजनीति में आने के लिए लड़कियों के सामने बड़ी सामाजिक बाधा शादी होती है। अगर शादी से पहले वे अपना कॅरिअर शुरू भी करती हैं तो एक डर हमेशा बना रहता है कि शादी कहां की जाए या शादी के बाद उनको सहयोग मिल पाएगा या नहीं इसलिए अधिकतर महिलाएं शादी के बाद ही राजनीति में भागीदारी दिखाती हैं, उसमें भी पुरुष आगे रहते हैं, महिलाओं को उस हिसाब से प्राथमिकता नहीं दी जाती है। पीयू छात्र राजनीति में भी लड़कियों ने चुनाव लड़ा है, लेकिन डिग्री पूरी होने के बाद कोई भी लड़की आगे राजनीति में सक्रिय नहीं रहीं।  - डॉ. भारत, कानून विभाग

पीयू की छात्र राजनीति से निकलकर सक्रिय राजनीति में मुकाम हासिल करने वाले नेता
  • पवन कुमार बंसल, पूर्व सांसद कांग्रेस व पूर्व केंद्रीय मंत्री
  • सत्यपाल जैन, पूर्व सांसद भाजपा और भारत सरकार के एडिशनल सॉलिसिटर जनरल 
  • राजीव प्रताप रूडी, पूर्व सांसद भाजपा व पूर्व केंद्रीय मंत्री
  • देवेश मौदगिल, पूर्व मेयर, भाजपा
  • कुलजीत सिंह नागरा, पूर्व विधायक, कांग्रेस
  • दलवीर सिंह गोल्डी, पूर्व विधायक, कांग्रेस
  • खुशबाज सिंह जट्टाना, कांग्रेस नेता
  • बरिंदर सिंह ढिल्लन, कांग्रेस नेता
  • राजविंदर सिंह, कांग्रेस नेता
  • मालविंदर सिंह कंग, कांग्रेस नेता
  • यादविंदर सिंह, खन्ना, शिअद नेता
  • रोबिन बराड़, सोई के राष्ट्रीय अध्यक्ष 
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