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Hindi News ›   Chandigarh ›   Kab Tak Nirbhaya, Amar ujala Aprajita 100 million smiles, Womens Discussed for Girls Safety

#KabTakNirbhaya ‘हैवानियत करने वालों को होनी चाहिए सरेआम फांसी, बेटों को बनाएं संस्कारी’

Mon, 02 Dec 2019 05:00 PM IST
खुशबू गोयल न्यूज डेस्क, अमर उजाला, चंडीगढ़
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, चंडीगढ़ Published by: खुशबू गोयल Updated Mon, 02 Dec 2019 05:00 PM IST
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Kab Tak Nirbhaya, Amar ujala Aprajita 100 million smiles, Womens Discussed for Girls Safety
अपराजिता कार्यक्रम में पहुंची महिलाएं - फोटो : अमर उजाला
तेलंगाना में वेटरिनरी डॉक्टर के साथ रेप और हत्या की घटना से चंडीगढ़ में भी आक्रोश है। कोई हैदराबाद के हैवानों को सरेआम फांसी की मांग कर रहा है तो कोई उनके सामाजिक बहिष्कार की वकालत। किसी का कहना है कि कैंडल मार्च निकालने और सोशल मीडिया पर अपना रोष जारी करने से ऐसी घटनाओं को नहीं रोका जा सकता। लोगों को खुद भी जागरूक होना होगा। देर रात सड़क पर कोई अकेली लड़की दिखे तो उसकी मदद करें। इसी मुद्दे पर अमर उजाला कार्यालय में संवाद आयोजित किया गया। इसमें शामिल महानुभावों ने जिस बात पर सबसे ज्यादा जोर दिया, वह थी बेटों को सही संस्कार। बेटियों को मजबूत बनाना और उन्हें आत्म निर्भर बनाना। लड़कियां सुरक्षित रहें, यह हम सबकी सामूहिक जिम्मेदारी है।
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घर से ही दी जाए नैतिक मूल्यों की शिक्षा: नेहा
पंजाब विश्वविद्यालय में एनएसयूआई की कन्वीनर नेहा चौहान ने कहा कि लड़कियों की सुरक्षा का अहम कदम हमारे घरों से ही उठाया जा सकता है। जब घर से हमें अच्छे संस्कार और नैतिक मूल्यों के बारे में बताया जाएगा तो ऐसी घटनाओं को रोकने में महत्वपूर्ण कदम उठाए जा सकते हैं। हर जगह पुलिस के भरोसे तो सुरक्षा की बात नहीं की जा सकती। समाज को ऐसी घटनाओं को रोकने के लिए अपने आसपास नजर रखनी होगी। यदि कहीं परेशान लड़की दिखती है तो उसकी मदद करने के लिए आगे आना चाहिए।
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घटनाओं में संलिप्त व्यक्ति का सामाजिक बहिष्कार हो: गीतांजली
अधिवक्ता गीतांजली ने कहा कि 16 साल से कम बच्चियों से रेप की घटनाओं में 20 साल की सजा या आजीवन कारावास का प्रावधान बना दिया। गंभीर अपराध की श्रेणी में फांसी का भी प्रावधान बना दिया, लेकिन इसमें समाज की भूमिका नहीं दिखी। तारीख पर तारीख चलती रहती हैं और अपराधी को उसके अपराध की जानकारी ही नहीं होती। ऐसी घटनाओं में समाज को भी हिस्सा लेना होगा। मोमबत्तियां जलाकर या सोशल साइट्स पर अपना गुस्सा न निकालकर ऐसे अपराधियों का सामाजिक बहिष्कार करें। ताकि उन्हें उनका अपराधबोध हो सके।
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सुनवाई की समय सीमा घटे, सजा सख्त मिले: सुप्रीत कौर

अधिवक्ता सुप्रीत कौर बराड़ ने कहा कि निर्भया कांड हो या कठुआ कांड, बच्चियों व महिलाओं के साथ रेप की घटना हो या एसिड अटैक की घटना। सभी केस में एफआईआर दर्ज होने के बाद कोर्ट में सुनवाई चलती रहती है। जरूरी है कि ऐसी घटनाओं में एक समय सीमा निर्धारित करके तत्काल सजा सुनाई जाए। विदेशों की तर्ज पर जल्द और सख्त सजा का प्रावधान होना जरूरी है। क्योंकि सख्त सजा का प्रावधान न होने तक ऐसी घटनाओं पर रोक लगाना संभव ही नहीं है। इसलिए जरूरी है कि समय सीमा घटाकर सख्त सजा का प्रावधान हो।

एकल परिवार प्रथा ने खत्म कर दिया नैतिक शिक्षा का मूल्य: शिप्रा बंसल
मनोनीत पार्षद शिप्रा बंसल ने कहा कि पहले सामूहिक परिवार होते थे। पूरे परिवार के भाई-बहन साथ-साथ रहते थे। ऐसे में लड़कियों की इज्जत करने के साथ नैतिक शिक्षा का मूल्य भी बच्चों को बताया जाता था। इस कारण व्यक्ति की कभी भी इस तरह की संकुचित सोच नहीं होती थी। आदर्श विचारधारा के साथ वह समाज की बेहतरी के लिए प्रयास करता था। एकल परिवार ने सब खत्म कर दिया। माता-पिता नौकरी के चक्कर में बाहर रहते हैं, बच्चों के साथ होता है सिर्फ मोबाइल। इसलिए उनके विचारों को भी वहीं से दिशा मिलती है और ऐसी घटनाएं होती हैं।

पुलिस भर्ती के दौरान जवानों को मिले नैतिक मूल्यों की शिक्षा: मंजीत कौर
अधिवक्ता मंजीत कौर ने कहा कि ऐसी घटनाओं में पीड़िता को कभी समय से इलाज नहीं मिलता। पुलिस सिर्फ अपने बचाव के लिए सरकारी हॉस्पिटल तलाशती है। कागजी कार्रवाई के बाद पीड़िता का मेडिकल होता है। ऐसे में जरूरी है कि इसके लिए अलग से पुलिस विंग बने। उस विंग को भर्ती के दौरान नैतिक मूल्यों के बारे में ट्रेनिंग होनी चाहिए। समय-समय पर ट्रेनिंग कोर्स कराना चाहिए। आज किसी भी उम्र की महिला हो, सुरक्षित नहीं है। यहां तक कि पुलिस स्टेशन में महिलाएं सुरक्षित नहीं हैं। इसलिए पुलिस को नैतिक मूल्यों की जानकारी होना जरूरी है।

बच्चियों को डराएं नहीं, बल्कि उन्हें सामना करना सिखाएं: ज्योति मेहता

वकील ज्योति मेहता ने कहा कि बच्चियों के साथ छेड़छाड़ की घटनाएं होती हैं तो वह घर आकर नहीं बतातीं हैं। क्योंकि अपने मन की बात बताने पर परिजन कहेंगे कि उस रास्ते से मत जाना, उस समय मत जाना, वहां जाना छोड़ दो, यहां तक कि कई बार स्कूल या ट्यूशन भी बदलवा देते हैं। इसलिए बच्चियों को डराने के बजाय उन्हें हिम्मत दें। उनके साथ जाकर ऐसे व्यक्तियों को समझाएं। हम घर से ही बच्चों को डराना शुरू कर देते हैं। बच्चियों का डर ऐसी घटनाओं को अंजाम देने वालों का हौसला बढ़ा देता है।

आज गांधी जी के बंदरों के निर्देशों का विपरीत करने की जरूरत: मंजीत कौर
अधिवक्ता मंजीत कौर ने संवाद के अंत में कहा कि वर्तमान में गांधी जी के तीन बंदरों के निर्देशों का विपरीत करने की जरूरत है। जहां से बुरी आवाज आए वहां सुनें, शायद कोई मदद के लिए बुला रहा हो, संदिग्ध हो तो जरूर देखें, ताकि पता चले कि कहीं कुछ गलत तो नहीं हो रहा और जहां गलत लगे वहां बोलने की हिम्मत रखें ताकि उस गलत काम को रोका जा सके।

मोबाइल को हथियार के रूप में इस्तेमाल करें: महाल
पंजाब विश्वविद्यालय स्टूडेंट काउंसिल के ज्वाइंट सेक्रेटरी मनप्रीत सिंह महाल ने कहा कि रेप या छेड़छाड़ की घटनाओं में अलग-अलग स्तर पर लोगों को जागरूक करना होगा। आज हर लड़की के पास मोबाइल है। इसे सिर्फ बात करने के लिए नहीं, बल्कि हथियार के तौर पर उपयोग करना चाहिए। अपराधी के सामने डरने से ज्यादा जरूरी है, हिम्मत दिखाना। वर्तमान में महिला हेल्पलाइन नंबर तो कई चलाए जा रहे हैं, लेकिन उनके बारे में पता शायद बहुत कम लड़कियों को है। इसलिए जरूरी है कि लड़कियों की सुरक्षा के लिए दिए जाने वाले नंबरों का ज्यादा से ज्यादा प्रचार प्रसार हो।

लड़कियां सिर्फ बहन नहीं, दोस्त भी होती हैं: रोहित

छात्र रोहित कुमार ने कहा कि पहले हमारे परिजन बताते थे कि किस तरह लोगों से बातचीत करनी है। लड़कियों की इज्जत करनी है। वर्तमान में हमारी नींव ही कमजोर हो गई है। परिवार के पास समय नहीं बच्चों को संस्कार देने के लिए। वहीं समाज में बताया जाता है कि लड़कियां सिर्फ बहन नहीं हैं, बल्कि एक अच्छी दोस्त भी होती हैं। जो हमारे अच्छे और बुरे समय में सही दिशा भी दिखाती हैं। आज समय से पहले बच्चों को मोबाइल मिल जाते हैं। सही मार्गदर्शन न मिलने पर बच्चों के लिए यही मोबाइल गलत राह पर ले जाता है।

बचपन से ही समाज सिखाता है भेदभाव की भावना: अजय
पंजाब विश्वविद्यालय के छात्र अजय कुमार ने कहा कि बचपन से ही समाज में भेदभाव करना सिखाया जाता है। घर में भाई-बहनों में, स्कूल में छात्र-छात्राओं और बड़े होने पर समाज लड़का-लड़की में भेद बताने लगता है। जब शुरू से ही ऐसा माहौल बनाया जाएगा तो फिर इस तरह के विचार आना स्वाभाविक हैं। इसलिए जरूरी है कि घर से ही समानता का अधिकार बताया जाए। लड़कियों के लिए लड़कों के मन में इज्जत करने के बारे में बताया जाए। ताकि लड़कों के विचारों को स्वतंत्रता मिले और संकुचित विचारधारा के कारण ऐसी घटनाओं को अंजाम न दें।

मजिस्ट्रेट के पास दे सकते हैं शिकायत
रेप या छेड़छाड़ की घटनाओं में पुलिस के व्यवहार से बच्चियां डर जातीं हैं। ऐसे में वह पुलिस के पास जाने से पहले ही शिकायत करने से मना कर देतीं हैं। ऐसी स्थिति में परिजन या बच्चियां एक एप्लीकेशन सीधे ज्यूडीशियल मजिस्ट्रेट को दे सकतीं हैं। मजिस्ट्रेट के निर्देश पर पुलिस को केस दर्ज कर कार्रवाई करनी होगी।

स्वच्छता की तरह सरकार इसे भी एक मुद्दा बनाए
संवाद में वक्ताओं ने कहा कि जिस तरह देश में स्वच्छता अभियान चल रहा है, उसी तरह ऐसी घटनाओं को रोकने के लिए सरकार अभियान चलाए। 18 साल से कम उम्र के बच्चों को नशा का सेवन करने से रोकने की योजना बने। क्योंकि ज्यादातर केस में अपराधी नशा किए रहते हैं। पुलिस ऐसी घटनाओं में गंभीरता से काम करे। स्कूल में बच्चों को मिलने वाली सजा पर उसका समर्थन न करें। पहले मामले को सुनें और आगे से गलती न करने के बारे में समझाएं। ऐसे कुछ सुझाव पर अमल किया जाए तो ऐसी घटनाओं पर रोक लगाई जा सकती है।
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