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सीपीएस नियुक्ति पर हरियाणा के सीएम को नोटिस
ब्यूरो/अमरउजाला, चंडीगढ़
Updated Tue, 28 Jul 2015 11:58 PM IST
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हरियाणा सरकार में बीते बुधवार को शामिल किए गए चार मुख्य संसदीय सचिवों की नियुक्ति को चुनौती देने वाली याचिका पर पंजाब-हरियाणा हाईकोर्ट की डिवीजन बेंच ने राज्य के मुख्यमंत्री मनोहर लाल खट्टर व सभी सीपीएस को नोटिस जारी कर जवाब मांगा है।
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जस्टिस एसके मित्तल व जस्टिस हरिंद्र सिंह सिद्धू वाली डिवीजन बेंच ने पूछा है कि नियुक्ति संविधान केकिस प्रावधान के तहत की गई। क्यों न नियुक्ति पर रोक लगा दी जाए।
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याचिका में आरोप लगाया था कि एक ओर भाजपा ने पंजाब में कैप्टन सरकार के कार्यकाल के दौरान सीपीएस नियुक्ति को चुनौती दी थी। अब हरियाणा में सत्ता में आने के बाद खुद भाजपा ने ही सीपीएस नियुक्त कर संविधान का उल्लंघन किया है।
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एडवोकेट जगमोहन सिंह भट्टी ने याचिका के जरिये बड़खल की विधायक सीमा त्रिखा, रादौर के विधायक श्याम सिंह राणा, हिसार के विधायक डॉक्टर कमल गुप्ता और असंध के विधायक बख्शीश सिंह विरक को सीपीएस नियुक्त करने को चुनौती दी है। इन सीपीएस के अलावा केंद्रीय गृह सचिव, चुनाव आयोग, हरियाणा सरकार, सीएम खट्टर को भी प्रतिवादी बनाया था।
भट्टी की दलील है कि संसद ने संविधान में संशोधन कर केंद्र और राज्य सरकारों में मंत्रियों की संख्या का प्रतिशत तय किया था। इस लिहाज से 90 विधायकों वाली हरियाणा विधानसभा में 13 मंत्री बनाए जा सकते हैं। संशोधन में मंत्रियों की संज्ञा तय हुई थी।
इस संज्ञा में मंत्री, उप मंत्री व मुख्य संसदीय सचिव और संसदीय सचिव शामिल हैं। तय संख्या के मुताबिक हरियाणा में सीपीएस नहीं बन सकते। बावजूद इसके मुख्य संसदीय सचिव नियुक्त कर हरियाणा ने संविधान का उल्लंघन किया है। यह भी कहा कि हिमाचल हाईकोर्ट ने वहां के मुख्य संसदीय सचिवों की नियुक्ति रद्द कर दी थी।
इस फैसले को चुनौती देती एसएलपी सुप्रीम कोर्ट से वापस ले ली गई थी। ऐसे में तय संख्या से अधिक मंत्री अथवा सीपीएस नहीं बनाए जा सकते। आरोप है कि सीपीएस को मंत्री के बराबर सुविधाएं दी जाती हैं। वहीं उप मंत्री के समान वेतन। जब सीपीएस बनाए ही नहीं जा सकते तो ऐसी सुविधाएं मुहैया करवाकर सरकार पर वित्तीय बोझ डालना गलत है। मांग है कि सीपीएस की नियुक्ति खारिज की जानी चाहिए।
पंजाब के मामले में फैसला सुरक्षित
एडवोकेट एचसी अरोड़ा ने याचिका दायर कर साल 2012 में पंजाब में मंत्रियों की पर्याप्त संख्या होने के बावजूद बनाए गए 21 सीपीएस की नियुक्ति को चुनौती दी थी। याचिका में कहा गया था कि पंजाब में सीपीएस का काम फाइलें प्रशासकीय सचिवों से मंत्रियों तक पहुंचाने का है। सरकार के काम में सीपीएस का दखल सही नहीं है, क्योंकि सरकारी फाइलें गोपनीय होती हैं।
सीपीएस का इन फाइलों से जब कोई लेन-देन ही नहीं, तो उन्हें यह काम सौंपना गोपनीयता भंग करने के समान है। अरोड़ा ने सीपीएस से यह शक्तियां वापस लेने की मांग की थी। उल्लेखनीय है कि यदि यह शक्तियां वापस होती हैं तो सीपीएस का औचित्य नहीं रह जाता। अपनी दलील मुकम्मल करते हुए मंगलवार को अरोड़ा ने सीपीएस नियुक्ति की नोटिंग भी पेश की।
हवाला दिया कि बार-बार नोटिंग आई कि सीपीएस की जरूरत नहीं है, क्योंकि यह नियुक्ति राजनीति से प्रेरित हैं। मामले में हालांकि पंजाब सरकार ने सीपीएस की नियुक्ति को सही ठहराया था। सभी पक्षों की बहस सुनने के बाद मंगलवार को जस्टिस एसएस सारों की डिवीजन बेंच ने फैसला सुरक्षित रख लिया है।