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हरियाणा विस चुनावः हार पर हार के बावजूद कांग्रेसियों की रार बरकरार, पर नहीं लिया कोई सबक
Wed, 09 Oct 2019 12:58 PM IST
खुशबू गोयल
यशपाल शर्मा, अमर उजाला, चंडीगढ़
यशपाल शर्मा, अमर उजाला, चंडीगढ़
Published by: खुशबू गोयल
Updated Wed, 09 Oct 2019 12:58 PM IST
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Selja Kumari, Bhupinder Singh
- फोटो : Social Media
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हरियाणा में कांग्रेस लगातार हार के बाद भी सबक नहीं सीख रही है। 2014 लोकसभा चुनाव से शुरू हुआ पराजय का क्रम बदस्तूर जारी है। पहले लोकसभा चुनाव हारा और उसके ठीक बाद अक्टूबर 2014 में ही विधानसभा चुनाव में हार का मुंह देखना पड़ा। केंद्र के साथ ही प्रदेश में भी कांग्रेस सत्ता से बाहर हो गई। दोनों चुनावों में करारी हार से कांग्रेसी कोई सबक लेंगे, इसकी उम्मीद जताई जा रही थी। लेकिन, हुआ उसके बिल्कुल विपरीत। कांग्रेस एकजुट होने के बजाए धड़ों में बंटती चली गई। जिसका नतीजा यह हुआ कि प्रदेश में कांग्रेस समर्थित उम्मीदवारों की निकाय चुनावों में हार हुई।
हालांकि, कांग्रेस ने पार्टी चिन्ह पर चुनाव नहीं लड़ा था। जिसका भाजपा को सीधा फायदा मिला और सातों निगमों पर पार्टी काबिज होने में सफल रही। इसके बाद कांग्रेस की जींद उपचुनाव में बुरी हार हुई। अंतर्कलह के कारण कांग्रेस उम्मीदवार रणदीप सुरजेवाला तीसरे स्थान पर रहे। बड़ी मुश्किल से उनकी जमानत बची। यह चुनाव भी कांग्रेस ने अधूरे मन से ही लड़ा था। पार्टी के सभी नेता एकमंच पर तो आए पर उनके दिल नहीं मिले, जिससे कांग्रेस उम्मीदवार को नुकसान उठाना। 2019 लोकसभा चुनाव के नतीजे तो कांग्रेस के लिए किसी सदमे से कम नहीं थे।
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2014 में कांग्रेस रोहतक सीट तो जीत गई थी, 2019 में तो पूरी तरह सूपड़ा ही साफ हो गया। कांग्रेस ने रोहतक सीट तो गंवाई ही, सोनीपत में खुद पूर्व सीएम भूपेंद्र सिंह हुड्डा भी हार गए। सिरसा में पूर्व प्रदेशाध्यक्ष अशोक तंवर की करारी पराजय हुई, वर्तमान प्रदेशाध्यक्ष कुमारी सैलजा भी अंबाला में जीत नहीं सकीं। कांग्रेस नेताओं से बुरे सपने जैसी हार के बाद भी कोई सीख नहीं ली और कुर्सी के लिए आपस में भिड़ते रहे। दिग्गज नेताओं के बीच चली आ रही रार अब भी बरकरार है।
तंवर को कांग्रेस से किनारा कर चुके हैं, मगर बाकी बड़े नेता अभी तक भी दिल खोलकर एक-दूसरे के साथ नहीं आ पाए हैं। कांग्रेस विधानसभा चुनाव के दौरान भी हुड्डा, किरण, सैलजा, कैप्टन अजय यादव सरीखे नेताओं के गुटों में बंटी हुई है। जिसके परिणामस्वरूप ही टिकट आवंटन के बाद पार्टी में भगदड़ मची। अब इंतजार 24 अक्टूबर का है, जब चुनाव परिणाम आएगा और पूरी स्थिति स्पष्ट हो जाएगी।
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हालांकि, कांग्रेस ने पार्टी चिन्ह पर चुनाव नहीं लड़ा था। जिसका भाजपा को सीधा फायदा मिला और सातों निगमों पर पार्टी काबिज होने में सफल रही। इसके बाद कांग्रेस की जींद उपचुनाव में बुरी हार हुई। अंतर्कलह के कारण कांग्रेस उम्मीदवार रणदीप सुरजेवाला तीसरे स्थान पर रहे। बड़ी मुश्किल से उनकी जमानत बची। यह चुनाव भी कांग्रेस ने अधूरे मन से ही लड़ा था। पार्टी के सभी नेता एकमंच पर तो आए पर उनके दिल नहीं मिले, जिससे कांग्रेस उम्मीदवार को नुकसान उठाना। 2019 लोकसभा चुनाव के नतीजे तो कांग्रेस के लिए किसी सदमे से कम नहीं थे।
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2014 में कांग्रेस रोहतक सीट तो जीत गई थी, 2019 में तो पूरी तरह सूपड़ा ही साफ हो गया। कांग्रेस ने रोहतक सीट तो गंवाई ही, सोनीपत में खुद पूर्व सीएम भूपेंद्र सिंह हुड्डा भी हार गए। सिरसा में पूर्व प्रदेशाध्यक्ष अशोक तंवर की करारी पराजय हुई, वर्तमान प्रदेशाध्यक्ष कुमारी सैलजा भी अंबाला में जीत नहीं सकीं। कांग्रेस नेताओं से बुरे सपने जैसी हार के बाद भी कोई सीख नहीं ली और कुर्सी के लिए आपस में भिड़ते रहे। दिग्गज नेताओं के बीच चली आ रही रार अब भी बरकरार है।
तंवर को कांग्रेस से किनारा कर चुके हैं, मगर बाकी बड़े नेता अभी तक भी दिल खोलकर एक-दूसरे के साथ नहीं आ पाए हैं। कांग्रेस विधानसभा चुनाव के दौरान भी हुड्डा, किरण, सैलजा, कैप्टन अजय यादव सरीखे नेताओं के गुटों में बंटी हुई है। जिसके परिणामस्वरूप ही टिकट आवंटन के बाद पार्टी में भगदड़ मची। अब इंतजार 24 अक्टूबर का है, जब चुनाव परिणाम आएगा और पूरी स्थिति स्पष्ट हो जाएगी।
15 से 46 पर पहुंचने को सबका साथ जरूरी
2014 के विधानसभा चुनाव में कांग्रेस ने मात्र 15 सीटें जीती थीं। उसके बाद 2016 में हजकां के दो विधायक भी कांग्रेस में शामिल हो गए। कांग्रेस प्रदेश में सत्ता वापसी का दम भर रही है, लेकिन नेताओं के जुदा-जुदा राहों पर चलने से इसमें दिक्कत आ सकती है। कांग्रेस को 15 से 46 सीटों पर पहुंचने के लिए न केवल आपसी गिले-शिकवे मिटाने होंगे, बल्कि हुड्डा और सैलजा को सबको साथ लेकर भी चलना होगा।
बागियों की वजह से बिगड़ा चुनावी समीकरण
टिकट वितरण के बाद सबसे अधिक बागी कांग्रेस नेता हुए हैं। भाजपा से अधिक कांग्रेस नेताओं ने निर्दलीय ताल ठोकी है व दूसरे दलों से टिकट लेकर भी मैदान में उतरे हैं। इससे भी कांग्रेस का चुनावी समीकरण गड़बड़ा रहा है। अनेक सीटों पर बागी कांग्रेस के लिए चुनौती बन गए हैं। कांग्रेस के शीर्ष नेतृत्व का अब पूरा जोर किसी तरह से पार्टी में भितरघात को रोकना है। अगर चुनाव में भितरघात हुआ तो और नुकसान हो सकता है।
राष्ट्रीय नेतृत्व भी नहीं रोक पाया गुटबाजी
हरियाणा में कांग्रेस को एकजुट करने के लिए कांग्रेस हाईकमान ने बहुत प्रयास किया, लेकिन सफलता नहीं मिली। प्रदेश में शकील अहमद, सुशील शिंदे, कमलनाथ जैसे नेता भी प्रभारी लगाए गए। बावजूद इसके कांग्रेसी नेता मतभेद और मनभेद नहीं भुला पाए। अब प्रभारी गुलाम नबी आजाद हैं और कांग्रेस की गुटबाजी कम होने के बजाए बढ़ी है।
बागियों की वजह से बिगड़ा चुनावी समीकरण
टिकट वितरण के बाद सबसे अधिक बागी कांग्रेस नेता हुए हैं। भाजपा से अधिक कांग्रेस नेताओं ने निर्दलीय ताल ठोकी है व दूसरे दलों से टिकट लेकर भी मैदान में उतरे हैं। इससे भी कांग्रेस का चुनावी समीकरण गड़बड़ा रहा है। अनेक सीटों पर बागी कांग्रेस के लिए चुनौती बन गए हैं। कांग्रेस के शीर्ष नेतृत्व का अब पूरा जोर किसी तरह से पार्टी में भितरघात को रोकना है। अगर चुनाव में भितरघात हुआ तो और नुकसान हो सकता है।
राष्ट्रीय नेतृत्व भी नहीं रोक पाया गुटबाजी
हरियाणा में कांग्रेस को एकजुट करने के लिए कांग्रेस हाईकमान ने बहुत प्रयास किया, लेकिन सफलता नहीं मिली। प्रदेश में शकील अहमद, सुशील शिंदे, कमलनाथ जैसे नेता भी प्रभारी लगाए गए। बावजूद इसके कांग्रेसी नेता मतभेद और मनभेद नहीं भुला पाए। अब प्रभारी गुलाम नबी आजाद हैं और कांग्रेस की गुटबाजी कम होने के बजाए बढ़ी है।