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Haryana Election: तोशाम में त्रिकोणीय मुकाबला... इन सीटों पर सीधी टक्कर, यहां भाजपा का संकट बढ़ा रहे बागी
Tue, 24 Sep 2024 03:06 PM IST
शाहरुख खान
संजय वर्मा/हनी सोनी, अमर उजाला, भिवानी/चरखीदादरी
संजय वर्मा/हनी सोनी, अमर उजाला, भिवानी/चरखीदादरी
Published by: शाहरुख खान
Updated Tue, 24 Sep 2024 03:06 PM IST
सार
हरियाणा के तोशाम में त्रिकोणीय मुकाबला है जबकि कई सीटों पर भाजपा और कांग्रेस के बीच सीधी टक्कर हैं। कई सीटों पर बागी भाजपा का संकट बढ़ा रहे हैं। किसान संगठन व खाप पंचायतें चुनावों में निर्णायक भूमिका निभाएंगी।
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Haryana Election
- फोटो : अमर उजाला
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विस्तार
खाप पंचायतों व किसान संगठनों के प्रभाव वाला चरखी दादरी व भिवानी जिले से ही सत्ता की राह निकलेगी। यहां की कुल छह सीटों में से चार पर कांग्रेस व भाजपा में सीधी टक्कर है जबकि पूर्व मुख्यमंत्री चौ. बंसीलाल का गढ़ रहे तोशाम में मुकाबला त्रिकोणीय बन रहा है।
पूरे प्रदेश में एकमात्र सीट ऐसी हैं जहां भाजपा का मुकाबला कांग्रेस से न होकर मार्क्सवादी पार्टी से है। माकपा के प्रत्याशी कामरेड ओमप्रकाश को गठबंधन नियम के तहत कांग्रेस का साथ तो मिल रहा है लेकिन चार बार के विधायक भाजपा के घनश्याम सर्राफ के सामने उनको पसीना बहाना पड़ा रहा है।
हालांकि मतदाता विकास में पीछे रहने के चलते लोगों में विधायक के प्रति काफी नाराजगी हैं, पर नए चेहरे मैदान में आने से वे असमंजस में हैं। फिलहाल यहां से कोई मजबूत दावेदार नहीं होने से भाजपा इसे सेफ सीट मान रही है।
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दूसरी ओर, कांग्रेस की सबसे सेफ सीट मानी जाती और अब भाजपा खासकर किरण चौधरी के परिवार की नाक का सवाल बन चुकी तोशाम सीट में मुकाबला त्रिकोणीय है। यहां भाजपा के बागी पूर्व विधायक शशिरंजन परमार ने निर्दलीय प्रत्याशी के रूप में ताल ठोक रखी है।
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पूरे प्रदेश में एकमात्र सीट ऐसी हैं जहां भाजपा का मुकाबला कांग्रेस से न होकर मार्क्सवादी पार्टी से है। माकपा के प्रत्याशी कामरेड ओमप्रकाश को गठबंधन नियम के तहत कांग्रेस का साथ तो मिल रहा है लेकिन चार बार के विधायक भाजपा के घनश्याम सर्राफ के सामने उनको पसीना बहाना पड़ा रहा है।
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हालांकि मतदाता विकास में पीछे रहने के चलते लोगों में विधायक के प्रति काफी नाराजगी हैं, पर नए चेहरे मैदान में आने से वे असमंजस में हैं। फिलहाल यहां से कोई मजबूत दावेदार नहीं होने से भाजपा इसे सेफ सीट मान रही है।
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दूसरी ओर, कांग्रेस की सबसे सेफ सीट मानी जाती और अब भाजपा खासकर किरण चौधरी के परिवार की नाक का सवाल बन चुकी तोशाम सीट में मुकाबला त्रिकोणीय है। यहां भाजपा के बागी पूर्व विधायक शशिरंजन परमार ने निर्दलीय प्रत्याशी के रूप में ताल ठोक रखी है।
वे पूर्व मुख्यमंत्री चौ. बंसीलाल परिवार की तीसरी पीढ़ी से उनकी पोती भाजपा से श्रुति और कांग्रेस से उनके पोते अनिरुद्ध चौधरी के सामने मजबूत चुनौती पेश कर रहे हैं। इन दोनों जिलों की कुल छह सीटों में सबसे कड़ा मुकाबला भी यहीं है, जहां पूरे प्रदेश के मतदाताओं की नजर है। परमार यहां श्रुति चौधरी को नुकसान पहुंचा सकते है।
वहीं, अनिरुद्ध को यहां से कांग्रेस के परंपरागत वोट के अलावा किसान आंदोलन से उपजी सहानुभूति का वोट भी मिल सकता है। श्रुति के सामने किरण की परंपरागत सीट को बचाने व अनिरुद्ध के सामने खुद को साबित करने की चुनौती है। शशिरंजन पिछली बार भी भाजपा में रहते किरण को कड़ी टक्कर दे चुके हैं।
चुनौतियों की बात करें तो श्रुति की तरह ही लोहारू में वित्तमंत्री जेपी दलाल की राह भी कांटों भरी है। कांग्रेस ने यहां समाजसेवी राजबीर फरटिया को उतारा है। यहां श्योराण खाप भी बड़ी खाप है, जिसका कोई उम्मीदवार नहीं है। ऐसे में जाट मतदाता बड़ा उलटफेर कर सकते हैं। दलाल ने इलाके में काफी काम कराए हैं, लेकिन कांग्रेस के उम्मीदवार सामाजिक कार्यों में दम पर मजबूती से डटे हैं।
इनके अलावा तीन सीटों बवानीखेड़ा, दादरी और बाढ़ड़ा में भाजपा और कांग्रेस दोनों के बागी पार्टियों का संकट बढ़ा रहे हैं। बवानीखेड़ा में कांग्रेस ने प्रदीप नरवाल को बागी मास्टर सतबीर रतेरा व भाजपा के कपूर सिंह वाल्मीकि को सुखविंद्र मांढ़ी से खतरा है।
भाजपा व कांग्रेस दोनों के प्रत्याशी नए हैं जबकि दोनों ही पार्टियों में यहां टिकट लेने वालों की कतार लंबी थी और टिकट नहीं मिलने पर अधिकतर प्रत्याशी नाराज हैं। तोशाम और लोहारू जाट बहुल इलाका है और बाकी सीटों पर भी विभिन्न खापों का प्रभाव है, ऐसे में उनकी भूमिका भी अहम रहेगी।
दादरी में दो सांगवान आमने-सामने, दोनों नए
दादरी में भाजपा ने छह चुनाव लड़ने वाले पूर्व मंत्री सतपाल सांगवान के बेटे सुनील सांगवान पर दांव खेला है। जेल विभाग से वीआरएस लेकर सुनील मैदान में उतरे हैं। उन पर परिवार की सत्ता में वापसी करवाने के साथ दादरी में पहली बार कमल खिलाने की चुनौती है।
दादरी में भाजपा ने छह चुनाव लड़ने वाले पूर्व मंत्री सतपाल सांगवान के बेटे सुनील सांगवान पर दांव खेला है। जेल विभाग से वीआरएस लेकर सुनील मैदान में उतरे हैं। उन पर परिवार की सत्ता में वापसी करवाने के साथ दादरी में पहली बार कमल खिलाने की चुनौती है।
वहीं, कांग्रेस ने नए चेहरे के रूप में पूर्व सहायक प्रोफेसर मनीषा सांगवान पर दांव खेला है और उनका यह पहला चुनाव है। जजपा ने पूर्व विधायक राजदीप फोगाट को मैदान में उतार रखा है। बागी नेताओं की स्थिति देखें तो 23 साल कांग्रेस में विभिन्न पदों पर रहने वाले अजीत फोगाट निर्दलीय चुनाव लड़ रहे हैं। भाजपा में भी नगर परिषद के पूर्व चेयरमैन संजय छपारिया निर्दलीय ताल ठोक रहे हैं। ये दोनों ही वोट बैंक को नुकसान पहुंचा सकते हैं।
दूसरी ओर बाढड़ा में भी कांग्रेस ने बंसीलाल के परिवार पर दांव पर ही खेला है। पिछले तीन चुनाव में कांग्रेस ने स्वर्गीय बंसीलाल के बड़े बेटे एवं बीसीसीआई के पूर्व चेयरमैन रणबीर महेंद्रा को उतारा था। वे तीनों चुनाव हार गए, लेकिन इस बार बंसीलाल के दामाद सोमवीर श्योराण सामने है।
वहीं, भाजपा ने एक बार निर्दलीय चुनाव लड़ चुके उमेद पातुवास को उतारा है। यहां टिकट वितरण से खफा होकर पूर्व विधायक एवं भाजपा किसान मोर्चा के सुखविंद्र मांढ़ी कांग्रेस का दामन थाम चुके हैं। वहीं, टिकट न मिलने पर कांग्रेस नेता सोमवीर घसोला ने निर्दलीय ताल ठोकी है। दोनों ही वोट बैंक प्रभावित करेंगे।
भिवानी जिले में कांग्रेस को उम्मीद, इस बार ज्यादा सीटें आएंगी...चरखी दादरी में खेल रहे बागी
पिछले विधानसभा चुनाव में भिवानी में भाजपा तीन व कांग्रेस एक सीट पर काबिज थी। कांग्रेस ने एकमात्र सीट तोशाम जीती थी लेकिन तोशाम की विधायक रही किरण चौधरी अब भाजपा में हैं। अभी तक के समीकरणों के अनुसार, कांग्रेस को उम्मीद है कि किरण चौधरी के जाने का उनको नुकसान नहीं हुआ।
पिछले विधानसभा चुनाव में भिवानी में भाजपा तीन व कांग्रेस एक सीट पर काबिज थी। कांग्रेस ने एकमात्र सीट तोशाम जीती थी लेकिन तोशाम की विधायक रही किरण चौधरी अब भाजपा में हैं। अभी तक के समीकरणों के अनुसार, कांग्रेस को उम्मीद है कि किरण चौधरी के जाने का उनको नुकसान नहीं हुआ।
वे इस बार न केवल खाता खोलेगी, बल्कि पिछली बार से ज्यादा सीटें जीतेगी। चरखी दादरी जिले की दोनों सीटों दादरी व बाढड़ा में मतदाताओं से लेकर प्रत्याशी व पार्टियां सब असमंजस में हैं। यहां बागियों का ही खेल चल रहा है। वे जिस प्रत्याशी की जितनी वोट लेते जाएंगे, उसकी हार उतनी ही सुनिश्चित होती जाएगी, इसलिए मान-मन्नोवल का दौर यहां अभी भी जारी है।