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गुरदीप गुल की गजल संग्रह अश्क निशां नहीं छोड़ते का विमोचन
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चंडीगढ़। पंजाबी लेखक सभा चंडीगढ़ की ओर से रविवार को पंजाब कला भवन में साहित्य समागम का आयोजन हुआ। इस मौके पर प्रसिद्ध लेखिका गुरदीप गुल का गजल संग्रह ‘अश्क निशां नहीं छोड़ते’ का विमोचन हुआ। साहित्यिक समागम में शायर बीडी कालिया हमदम मुख्य अतिथि और शायर शम्स तबरेजी विशेष अतिथि के रूप में उपस्थित हुए। कार्यक्रम की शुरुआत सुरजीत धीर ने बसंत राग के शब्द गायन से की। पंजाब लेखक सभा के प्रधान बलकार सिद्धू ने आए अतिथियों का स्वागत किया। साथ ही उन्होंने गजल संग्रह और उर्दू भाषा के जन्म पर चर्चा की। मंच संचालन सभा के महासचिव दीपक शर्मा चनारथल ने किया। बीडी कालिया हमदम और उर्दू के शायर शम्स तबरेजी ने गुरदीप गुल को गजल संग्रह के लिए बधाई दी।
इस अवसर पर दीपक शर्मा चनारथल ने कहा कि यह भाषाओं की सांझ की ही महानता है कि गुरदीप गुल की उर्दू की शायरी देवनागरी लिपि हिंदी में छप कर किताब का रूप ले रही है। इसका लोकार्पण पंजाबी लेखक सभा कर रही है। इस मौके डॉ. शशि प्रभा, मनदीप कौर, निर्मल जसवाल और गुरनाम कंवर ने भी विचार रखे। इस समागम में किताबकी लेखिका गुरदीप गुल ने कहा कि नज्म को किताब का रूप देने का श्रेय बीडी कालिया हमदम और शम्स तबरेजी को जाता है। इस दौरान डॉ. लाभ सिंह खीवा, मंजीत कौर मीत, हरमिंदर कालरा, अजीत कंवल हमदर्द, डॉ. राजवंशी मान, गणेश दत्त, जगदीप नुरानी, सिमरजीत ग्रेवाल, भूपिंदर मलिक, ऊषा कंवर, विजय कपूर, रजिंदर कौर, प्रज्ञा शारदा, गुरदर्शन मावी, तेजा सिंह बूरा, परमजीत परम सहित अन्य लोग उपस्थित रहे।
नई पीढ़ी को मां बोली भाषा से जोड़ने में साहित्य निभा सकता है विशेष भूमिका
शम्स तबरेजी ने उर्दू पंजाबी भाषा पर विशेष गौर करते हुए कहा कि भाषाओं को लेकर चिंता जरूरी है, पर भाषाएं नहीं मरतीं। उन्होंने कहा कि नई पीढ़ी को अपनी मां बोली भाषा के साथ जोड़ने के लिए साहित्यिक संस्थाएं विशेष भूमिका निभा सकती हैं। उन्होंने पंजाबी लेखकों को कार्यशाला आयोजित करने की सलाह दी।
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इस अवसर पर दीपक शर्मा चनारथल ने कहा कि यह भाषाओं की सांझ की ही महानता है कि गुरदीप गुल की उर्दू की शायरी देवनागरी लिपि हिंदी में छप कर किताब का रूप ले रही है। इसका लोकार्पण पंजाबी लेखक सभा कर रही है। इस मौके डॉ. शशि प्रभा, मनदीप कौर, निर्मल जसवाल और गुरनाम कंवर ने भी विचार रखे। इस समागम में किताबकी लेखिका गुरदीप गुल ने कहा कि नज्म को किताब का रूप देने का श्रेय बीडी कालिया हमदम और शम्स तबरेजी को जाता है। इस दौरान डॉ. लाभ सिंह खीवा, मंजीत कौर मीत, हरमिंदर कालरा, अजीत कंवल हमदर्द, डॉ. राजवंशी मान, गणेश दत्त, जगदीप नुरानी, सिमरजीत ग्रेवाल, भूपिंदर मलिक, ऊषा कंवर, विजय कपूर, रजिंदर कौर, प्रज्ञा शारदा, गुरदर्शन मावी, तेजा सिंह बूरा, परमजीत परम सहित अन्य लोग उपस्थित रहे।
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नई पीढ़ी को मां बोली भाषा से जोड़ने में साहित्य निभा सकता है विशेष भूमिका
शम्स तबरेजी ने उर्दू पंजाबी भाषा पर विशेष गौर करते हुए कहा कि भाषाओं को लेकर चिंता जरूरी है, पर भाषाएं नहीं मरतीं। उन्होंने कहा कि नई पीढ़ी को अपनी मां बोली भाषा के साथ जोड़ने के लिए साहित्यिक संस्थाएं विशेष भूमिका निभा सकती हैं। उन्होंने पंजाबी लेखकों को कार्यशाला आयोजित करने की सलाह दी।
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