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Punjab Loksabha Election: सीमावर्ती गांवों के किसान गुस्से में, किया एलान- पहले मुआवजा दो, तभी देंगे वोट

Sat, 11 May 2024 01:42 PM IST
निवेदिता वर्मा अनिल कुमार, संवाद, फिरोजपुर (पंजाब)
अनिल कुमार, संवाद, फिरोजपुर (पंजाब) Published by: निवेदिता वर्मा Updated Sat, 11 May 2024 01:42 PM IST
सार

इस बार आई बाढ़ से सरहदी हलके के ग्रामीणों व किसानों का बहुत ज्यादा नुकसान हुआ है। ज्यादातर ग्रामीणों व किसानों को न तो बाढ़ का मुआवजा मिला और न ही खेतों में से रेत हटाने के लिए मदद मिली। कर्ज लेकर इन्होंने दोबारा से जीवन की शुरुआत की है।

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Farmers of border villages of Firozpur demand compensation first in loksabha election
फिरोजपुर के सीमांत गांव में नाव पर कंबाइन लेकर जाते हुए किसान - फोटो : संवाद

विस्तार

पंजाब में लोकसभा चुनाव प्रचार करने के लिए विभिन्न राजनीतिक पार्टियों के प्रत्याशी अपने काफिले लेकर सीमांत गांवों में निकल चुके हैं। इन्हें सरहद से सटे गांवों के छोटे-बड़े किसानों के गुस्से का सामना करना पड़ रहा है। किसानों ने साफ एलान कर दिया है कि पहले मुआवजा दो, तभी वोट देंगे। 
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इस बार आई बाढ़ से सरहदी हलके के ग्रामीणों व किसानों का बहुत ज्यादा नुकसान हुआ है। ज्यादातर ग्रामीणों व किसानों को न तो बाढ़ का मुआवजा मिला और न ही खेतों में से रेत हटाने के लिए मदद मिली। कर्ज लेकर इन्होंने दोबारा से जीवन की शुरुआत की है। यही नहीं जिस जमीन पर खेती करते थे, उसकी गिरदावरी भी रद्द कर दी गई। प्रत्येक सियासी पार्टी से ये लोग अपने मुद्दे पर बात करते हैं, जिनका उनके पास कोई जवाब नहीं है।
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किसान और ग्रामीण अपने कामकाज में जुटे हैं। किसान जसवंत सिंह, बोहड़ सिंह, बलविंदर सिंह व काका सिंह वासी ममदोट कहते हैं कि उनके गांव गजनी वाला, मत्तड़ हिठाड़, गट्टी मत्तड़ हिठाड़, चक राऊके, राजा राय, बहादुरके व चक शिगार में लगभग पांच हजार एकड़ जमीन खेती योग्य थी। इस बार बाढ़ से उक्त जमीन में तीन से चार फीट रेत के ढेर लग गए। सरकार ने ज्यादातर ग्रामीणों व किसानों को न तो मुआवजा दिया और ना ही रेत हटाने में कोई मदद की। किसानों ने डीजल फूंक कर खेतों से बड़ी मशक्कत से रेत निकाली है। फिर भी जमीन खेती योग्य तैयार नहीं हो पाई है। किसी ने उनकी मुश्किलों की तरफ ध्यान नहीं दिया है। 
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हुसैनीवाला बॉर्डर की तरफ गांव भाने वाला, कालू वाला, टेंडी वाला, चांदी वाला, जल्लोके, गंदू किलचा, निहाला किलचा के खेतों में भी रेत के ढेर लगे हैं। किसी भी सियासी पार्टी ने खेतों से रेत निकालने के लिए कोई सहायता नहीं की है। जिन ग्रामीणों व किसानों की गिरदावरी की गई थी, उनका बाढ़ में हुए नुकसान का मुआवजा तक नहीं दिया है। इसीलिए ये लोग खेतों में अपने कामकाज में जुटे हैं। 


ग्रामीणों का कहना है कि सीमांत इलाके में सतलुज दरिया बह रहा है, कई जगहों पर पुल की जरूरत है, वहां पर पुल तक नहीं बनवाकर दिया है, देश को आजाद हुए कई दशक हो चुके हैं। आज भी ट्रैक्टर-ट्रॉली व कंबाइन बड़ी नाव पर लेकर जानी पड़ती है। इन्हें किसी राजनीतिक प्रत्याशी से कुछ नहीं लेना है। ग्रामीणों का कहना है कि गांवों में प्रत्याशी कम उनके कार्यकर्ता ही नजर आ रहे हैं। 
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