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Chandigarh News: मां की उम्र 35 साल से ज्यादा होने पर बढ़ जाता है डाउन सिंड्रोम, बच्चे को भी दिल की बीमारी का खतरा

Fri, 14 Feb 2025 02:03 AM IST
Chandigarh Bureau चंडीगढ़ ब्यूरो
Updated Fri, 14 Feb 2025 02:03 AM IST
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Down syndrome increases if the mother's age is more than 35 years, the child also has the risk of heart disease
चंडीगढ़। विश्व आकस्मिक हृदय दोष जागरूकता दिवस हर साल 14 फरवरी को मनाया जाता है। हालांकि अभी इसके प्रति और जागरूकता बढ़ाने की जरूरत है। पीजीआई के कार्डियोलॉजी यूनिट-2 के हेड डॉ. मनोज कुमार रोहित ने बताया कि धीरे-धीरे इसके प्रति जागरूकता बढ़ रही है।
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उन्होंने बताया कि पिकअप रेट बढ़ गया है। हालांकि एक हजार में से केवल आठ बच्चों को यह बीमारी होती है। इसके कई कारण हो सकते हैं। यदि माता-पिता को पैदायशी दिल की समस्या है तो बच्चे को भी इसके होने का खतरा रहता है। आजकल महिलाएं देरी से शादी कर रही हैं। यदि मां की उम्र 35 साल से ज्यादा है तो डाउन सिंड्रोम बढ़ जाता है। इससे बच्चे में 50 प्रतिशत डाउन सिंड्रोम का खतरा बढ़ जाता है।
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यदि मां मिर्गी की दवा खाती है या फिर धूम्रपान या शराब का सेवन करती है, तब भी बच्चे में दिल की बीमारी का खतरा रहता है। गर्भावस्था के दौरान यदि मां को इंफेक्शन हो जाए तब भी बच्चे के दिल पर प्रभाव पड़ सकता है। 4-5 साल में सरकार की स्कीमें भी बढ़ी हैं। इसमें यह बीमारी कवर हो जाती है। फीटल इको की सहायता से इसकी पहचान करना भी आसान हो गया है। लेवल-2 टेस्ट में इसे डिटेक्ट किया जा सकता है।
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दो प्रकार की होती है दिल की बीमारी
डॉ. मनोज ने कहा कि यह बीमारी क्रिटिकल हार्ट डिसीज और स्टेबल हार्ट डिसीज दो प्रकार की होती है। स्टेबल हार्ट डिसीज में बच्चे को इलाज का समय मिल जाता है। वहीं क्रिटिकल हार्ट डिसीज में बच्चा नीला पड़ने लगता है। ऐसी स्थिति में तुरंत बच्चे की सर्जरी करनी पड़ती है। माता-पिता को चाहिए कि वह अच्छे अस्पताल में डिलीवरी कराएं ताकि जरूरत पड़ने पर तुरंत बच्चे को इलाज मिल सके।


इस बीमारी का मामला पहुंचा है हाईकोर्ट
अमृतसर में एक महिला 8 महीने तक एक निजी अस्पताल में अल्ट्रासाउंड करवाती रही। जब बच्चा हुआ तो उसका रंग नीला पड़ने लग गया, लेकिन अस्पताल ने बच्चों को हेल्दी बताकर मां को अस्पताल से छुट्टी दे दी। कहीं ओर चेक कराने पर पता चला था कि बच्चे के दिल में कई छेद हैं। अमृतसर से दिल्ली तक सात अस्पतालों में लाखों खर्च करने के बाद नवजात ने दम तोड़ दिया था। इसके बाद माता-पिता की एफआईआर भी दर्ज नहीं की गई, जिसके बाद मामला हाईकोर्ट पहुंचा।
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