कोरोना वायरस: दावा- 91 फीसदी रिकवरी रेट के साथ पंजाब सबसे आगे, मुत्यु दर भी 1.3 प्रतिशत पर रोका
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देशभर में सबसे ज्यादा पंजाब में कोरोना मरीजों की 91 फीसदी रिकवरी दर है। वहीं राज्य मृत्य दर को भी सबसे कम 1.3 फीसदी तक रोकने में कामयाब रहा है। इनमें ज्यादातर मौतें किसी अन्य रोग के कारण हुई हैं। यह जानकारी स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण के प्रमुख सचिव अनुराग अग्रवाल ने दी है।
उन्होंने बताया कि सूबे में अब तक 41 मरीजों की मौत हुई है, जिनकी उम्र 50 साल से अधिक थी। इनमें से 31 व्यक्ति (77 प्रतिशत) अंतिम चरण में गुर्दे, कैंसर और एचआईवी जैसी गंभीर बीमारियों के अलावा मधुमेह और हाई ब्ल्ड प्रेशर से जूझ रहे थे। उन्होंने आगे बताया कि बाकी 23 प्रतिशत मामलों में मरीज मुख्य तौर पर दिल की बीमारी, हाईपरटेंशन, मधुमेह और मोटापा जैसी पुरानी बीमारियों से संबंधित थे और ऐसे मामले बहुत कम थे, जिनको कोई बीमारी नहीं थी।
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उन्होंने कहा कि ज्यादातर मामलों में उन मरीजों की मौत हुई है, जो पहले ही गंभीर बीमारी से जूझ रहे थे, जिस कारण उनकी मौत कुदरती तौर पर भी हो सकती थी। अब तक कुल 2106 पॉजिटिव मामलों में से 1918 मरीज पहले ही पूरी तरह ठीक हो चुके हैं। अग्रवाल ने बताया कि कुछ दिनों से मामले के दोगुने होने की दर लगभग 100 दिन रह गई है, जो काफी बेहतर है।
अग्रवाल ने बताया कि आईसीएमआर के दिशा-निर्देशों के अनुसार, यदि मरीजों को कोई पुरानी बीमारी के बिना कोविड से प्रभावित पाया जाता है, तभी उसकी मौत को कोविड से मौत माना जाता है। राज्य की मृत्यु दर, राष्ट्रीय औसत मृत्यु दर (3 प्रतिशत) की अपेक्षा बहुत कम है। अग्रवाल ने आगे कहा कि इसके अलावा बहुत से मामलों में शव के नमूने लिए गए हैं, जिनमें से कुछ पॉजिटिव पाए गए लेकिन यह सभी मौतें कोविड-19 मौत के तौर पर ली गई, जबकि यह नमूने सिर्फ संभावित पॉजिटिव मामलों के संपर्क का पता लगाने के उद्देश्य से लिए गए थे।
कोविड से हुई मौतों का विश्लेषण करने को कमेटी गठित
राज्य में हुई मौतों का विश्लेषण और समीक्षा करने के लिए डॉ. तलवार के नेतृत्व में विशेषज्ञ कमेटी का गठन किया गया है। स्वास्थ्य सेवाओं की निदेशक डॉ. अवनीत कौर ने बताया कि आठ मरीज अंतिम चरण पर गुर्दे की बीमारी से जूझ रहे थे और वह डायलिसिस पर थे, इसलिए उनकी जान पहले ही खतरे में थी। इसके अलावा 9 मरीज मधुमेह की गंभीर बीमारी से ग्रस्त थे। उन्होंने आगे बताया कि कुछ मामलों में मरीजों की रोग प्रतिरोधक क्षमता बहुत कमजोर थी, क्योंकि वह एचआईवी पॉजिटिव थे।