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स्टडी में चौंकाने वाला खुलासा, देखिए कैसे हैं सफाई कर्मचारियों के हाल

Sun, 25 Sep 2016 09:30 AM IST
आशीष वर्मा/अमर उजाला, चंडीगढ़
आशीष वर्मा/अमर उजाला, चंडीगढ़ Updated Sun, 25 Sep 2016 09:30 AM IST
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chandigarh 90 percent of sweeper suffering from many decease
Chandigarh sweeper - फोटो : File Photo
एक ओर स्वच्छता अभियान के लिए करोड़ों रुपये खर्च किए जा रहे हैं, लेकिन जिन कंधों के भरोसे स्वच्छ भारत का ख्वाब देखा जा रहा है, उन्हीं की हालत बद से बदतर है। पीजीआई के स्कूल ऑफ पब्लिक हेल्थ के इन्वायरमेंट विंग ने अपनी एक स्टडी में पाया है कि चंडीगढ़ के 90 प्रतिशत सफाई कर्मचारियों को सफाई करने के दौरान चोटिल हो जाते हैं।
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 इसकी वजह यह है कि अधिकतर कर्मचारी बिना सुरक्षा उपकरण के काम करते हैं। इससे उन्हें चोटें लगती रहती है। प्रशासन की ओर से उन्हें न तो मेडिकल सुविधाएं उपलब्ध कराई जाती हैं और न ही इसके लिए कोई आर्थिक मदद दी जाती है। रिसर्च में चंडीगढ़ के 2830 सफाई कर्मियों को शामिल किया गया है। इनमें स्ट्रीट स्वीपर, वेस्ट कलेक्टर, वेस्ट प्रोसेसर और कूड़ा उठाने वाले शामिल हैं। शोधकर्ताओं ने सभी वर्ग से कुल 226 लोगों से सवाल जवाब किए। शोध में सामने आया है कि अधिकतर कर्मचारी जानते हैं कि जिन परिस्थितियों में वे काम करते हैं, उससे उनके स्वास्थ्य पर क्या-क्या प्रभाव पड़ सकता है।
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कौन कर्मचारी किस तरह की चोट से पीड़ित
स्टडी में देखा गया है कि 44.4 प्रतिशत वेस्ट कलेक्टर, 10.6 प्रतिशत कूड़ा उठाने वाले, 4.9 स्ट्रीट स्वीपर को खरोंच और रगड़ से चोटें लगती हैं। 56.8 प्रतिशत स्ट्रीट स्वीपर, 42.7 प्रतिशत कूड़ा उठाने वाले, 34.6 प्रतिशत वेस्ट कलेक्टर और 16 प्रतिशत वेस्ट प्रोसेसर हाथ-पैरों में मोच व मांसपेशियों के खिंचाव से पीड़ित हैं। करीब 12.3 प्रतिशत स्ट्रीट स्वीपर, 17 प्रतिशत कूड़ा उठाने वाले, 17.3 वेस्ट कलक्टर व 17.6 वेस्ट प्रोसेसर्स कफ और सास की बीमारी से पीड़ित हैं। इसके अलावा 21 प्रतिशत वेस्ट कलेक्टर, 17 प्रतिशत कूड़ा उठाने वाले और 3.7 प्रतिशत स्ट्रीट स्वीपर को उल्टी और शरीर में दर्द की शिकायत रहती है।
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इलाज में खुद का रुपया खर्च करना पड़ता है

chandigarh 90 percent of sweeper suffering from many decease
Chandigarh sweeper - फोटो : File Photo
स्टडी में यह भी सामने आया है कि अधिकतर कर्मचारियों को अपने इलाज के लिए खुद ही रुपये खर्च करने पड़ते हैं। उन्हें कोई भी आर्थिक मदद नहीं मिलती। इस वजह से कईं तो चोट लगने के बाद डॉक्टर के पास जाते ही नहीं। 70 प्रतिशत कूड़ा उठाने वाले और 54.3 प्रतिशत वेस्ट कलेक्टर मौजूदा वर्किंग कंडीशंस से संतुष्ट न होने के कारण जॉब छोड़ना चाहते हैं। सबसे संतुष्ट वर्ग स्ट्रीट स्वीपर मिला, जो अपनी सैलरी से खुश है। ये वर्ग डायरेक्ट म्युनिसिपल सॉलिड वेस्ट (एमएसडब्ल्यू) के संपर्क में नहीं आता है।

खतरे को टालने के लिए ये कदम जरुरी
कर्मचारियों को पर्सनल प्रोटेक्टिव इक्विपमेंट जैसे कि फिलर मास्क, दस्तानें मिलने चाहिए। संक्रमण की बीमारी से बचने के लिए वैक्सीन लगानी चाहिए। नगर निगम को स्वास्थ्य संस्थानों के साथ समन्वय कर समय-समय पर कर्मचारियों के लिए फ्री मेडिकल कैंप लगाने चाहिए। साथ ही उन्हें सुरक्षा उपकरण के साथ उचित ट्रेनिंग भी देनी चाहिए।

सफाई कर्मचारियों में सुरक्षा उपकरण के साथ काम करने की आदत डालनी चाहिए। हमने कुछ लोगों से बात की थी तो पता चला कि वे सुरक्षा उपकरण के साथ काम नहीं करना चाहते, क्योंकि इससे उनके काम में बाधा आती है। ऐसे में उन्हें आदत डालने के लिए ट्रेनिंग सेशन करवाने होंगे। नगर निगम को सुरक्षा उपकरण देने के साथ मेडिकल सुविधाएं भी उपलब्ध करवानी चाहिए।
रविंद्रा खैवाल, एसोसिएट प्रोफेसर, इन्वायरमेंट हेल्थ, पीजीआई
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