मथुरा-वृंदावन की पहचान सिर्फ मंदिरों और भक्ति से नहीं, बल्कि यहां की अनूठी कला परंपराओं से भी है। इन्हीं में शामिल है सदियों पुरानी साझी कला, जिसे छत्ता बाजार निवासी मोहन वर्मा का परिवार पीढ़ी दर पीढ़ी संजोकर देश-विदेश तक पहुंचा रहा है। खास बात यह है कि इस परिवार की चौथी और पांचवीं पीढ़ी आज भी इस कला को आगे बढ़ा रही है। मथुरा के छत्ता बाजार निवासी मोहन वर्मा की पहचान सीजर आर्टिस्ट के रूप में है। कागज को बेहद बारीकी से काटकर आकृतियां तैयार करना उनकी कला की खासियत है। यह काम उनके लिए सिर्फ पेशा नहीं, बल्कि परिवार की विरासत है। मोहन वर्मा अकेले इस परंपरा को आगे नहीं बढ़ा रहे। उनके बड़े भाई अजय और विजय भी इसी कला से जुड़े हैं। परिवार में पीढ़ियों से चली आ रही इस कला को अब नई पीढ़ी भी सीख रही है। साझी कला में कागज को बेहद महीन और कलात्मक ढंग से काटकर धार्मिक और पौराणिक आकृतियां तैयार की जाती हैं। मोहन वर्मा की कला की खासियत इसकी बारीकी और विशाल आकार की कलाकृतियां हैं। मोहन वर्मा ने कई बड़े कागजों को जोड़कर करीब 50 फुट लंबे कागज पर एक विशाल पेड़ की आकृति तैयार की थी। इस पेड़ की प्रत्येक टहनी पर ठाकुर जी की लीलाओं से जुड़ी अलग-अलग आकृतियां उकेरी गई थीं। यह कलाकृति उनकी अद्भुत कारीगरी और कल्पनाशीलता का उदाहरण बनी। साझी कला को देश-विदेश तक पहचान दिलाने के लिए मोहन वर्मा को कई सम्मान भी मिल चुके हैं। उन्हें वर्ष 2011 में राज्य पुरस्कार, वर्ष 2015 में यूनेस्को से सम्मान और वर्ष 2018-19 में राष्ट्रीय पुरस्कार से सम्मानित किया गया। मथुरा-वृंदावन की इस अनूठी साझी कला को मोहन वर्मा और उनका परिवार सिर्फ बना ही नहीं रहा, बल्कि पीढ़ी दर पीढ़ी इसे जीवित भी रख रहा है। बदलते दौर में जब कई पारंपरिक कलाएं विलुप्त होने की कगार पर हैं, ऐसे कलाकार ब्रज की सांस्कृतिक विरासत को नई पहचान देने का काम कर रहे हैं।