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कहीं वोटों का बिखराव तो कहीं ध्रुवीकरण

Sat, 19 Apr 2014 05:32 AM IST
Amroha
Amroha Updated Sat, 19 Apr 2014 05:32 AM IST
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अमरोहा। मतदाताओं ने सियासी दलोें के तमाम आंकड़ों को फेल कर दिया। वोटोें के बिखराव और धुव्रीकरण ने सारे समीकरणों को औंधे मुंह गिराकर राजनीति के चाणक्यों काखेल बिगाड़ दिया। बसपा का वोट बैंक माने जाने वाले जाटवों का रुझान दोपहर बाद जहां भाजपा की तरफ हो गया तो उधर जाट वोट तीन टुकड़ों में बंट गया। खागी और सैनी वोट भी इस सियासी कहानी का हिस्सा बनने से अछूता नहीं रहा। राजनीति के माहिर भी लोकसभा सीट पर हुए वोटों के तमाशें से हैरत में है। इसमें कोई दो राय नहीं कि अमरोहा में भाजपा और सपा के दरमियान ही सीधी टक्कर है। जिसमें कोई भी बाजी मार सकता है।
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लोकसभा चुनाव की सुगबुगाहट शुरू होते ही सियासी पार्टियों ने अमरोहा में जातिगत वोटों के आधार पर उम्मीदवारों की तलाश तेज की थी। बसपा ने पूर्व विधायक हाजी शब्बन को मैदान में उतारा था। जिसके पीछे मंशा भी साफ थी कि उन्हें बीते विधानसभा चुनाव में हारने पर गढ़मुक्तेश्वर से 50 हजार के पार वोट मिले थे। और चौधरी बिरादरी के वोट बैंक के साथ-साथ मुस्लिम-दलित वोट पर निशाना साधा था। लेकिन, बसपा की इस सियासी बिसात को सपा ने बिगाड़ दिया और चुनाव में चौधरी बिरादरी से ही ताल्लुक रखने वाले राज्यमंत्री कमाल अख्तर की पत्नी हुमैरा अख्तर का टिकट फाइनल कर दिया। उधर, रालोद ने जाट आरक्षण का मौका भुनाने के लिए जाट वोट बैंक पर निगाहें गड़ाई और किसानों को अपने साथ जोड़ने के लिए भाकियू के राष्ट्रीय प्रवक्ता राकेश टिकैत को चुनाव लड़ने के लिए अमरोहा भेज दिया। आखिर में सियासी उठक पठक और कशमकश के बीच भाजपा ने गुर्जर जाति के चौधरी कंवर सिंह तंवर पर बाजी खेल दी।
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लेकिन, अमरोहा के मतदाताओं ने इन सूरमाओं की जातिगत राजनीति के तमाम समीकरणों को धवस्त कर दिया। कड़वा सच यह है कि अमरोहा सीट पर वोटों का बिखराव और ध्रुवीकरण ऐसा हुआ कि बसपा के वोट बैंक ने दोपहर में हाथी से उतरकर कमल खिलाया तो उधर रालोद के जाट सपा और भाजपा के बीच बंट गए। सैनी और खागी जाति से इस चुनाव में कोई प्रत्याशी मैदान में नहीं था। लिहाजा, इस वोट बैंक ने भी चुनाव में कम ही दिलचस्पी दिखाई और सियासी फायदा देखते हुए सैनी और खागी अलग-अलग पार्टियों में बंट गए। बहरहाल, इन हालात से इतना जरूर है कि हार-जीत का अंतर ज्यादा नहीं होगा।
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