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‘बनारस में सब गुरु, केहू नाही चेला’
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वाराणसी। दुनिया के सबसे पुराने शहरों में से एक काशी जो वक्त के साथ गतिमान होकर भी पुरातन संस्कृति व धरोहरों को संजोए हुए है। आध्यात्मिक शहर है यह, जहां जीवन और मृत्यु साथ-साथ चलते हैं। यह कहना है भोजपुरी गायिका ममता उपाध्याय का। जो देश की सांस्कृतिक राजधानी से मायानगरी पहुंचकर अपनी आवाज का जादू बिखेर रही हैं।
ममता कहती है, ‘बनारस में सब गुरु, केहू नाहीं चेला’। यह एक ऐसा शहर है जहां चाय की चुस्कियों के बीच ज्ञान की गंगा बहती रहती हैं। बनारस और बनारसी किसी भी परिभाषा से परे है। बनारस की असली खूबसूरती घाटों और संकरी गलियों वाले पक्के महाल में है। सड़क किनारे चाय की बैठकी हो या साड़ियों और मोतियों का व्यापार बनारसी कला की प्रसिद्धि दूर-दूर तक है। बनारस वह समंदर है जहां मोती वाली सीप खुद डूबने पर ही मिलेगी। मुबंई में रहने वाली ममता का दिल यहीं बनारस की गलियों में रमता है। वो कहती है बनारस के कण-कण में संगीत बसा है, गंगा की अविरल धारा हो या गारी सभी में संगीत की बसा है।
काशी में सावन की मस्ती, उमंग, झूला झूलने की यादें आज भी मेरे दिल के करीब है। लहरतारा निवासी ममता मुंबई में अब तक कई हिंदी व भोजपुरी फिल्मों में अपनी आवाज दे चुकीं हैं। ममता ने अपनी संगीत की प्रारंभिक शिक्षा पिता रजनीकांत उपाध्याय से ली है। सपनों के इस शहर की भागती दौड़ती जीवनशैली में बनारस आने का मौका बहुत कम ही मिलता है। काशी जैसा मस्तमौला और अपनापन का शहर कहीं नहीं। आज काशी विकास के पथ पर अग्रसर है, लेकिन यहां कि जिंदादिली काशीवासियों के दिल में उसी तरह रची-बसी है। इसकी पहचान सिर्फ यहां के मंदिरों और घाटों से ही नहीं बल्कि इसके कण-कण में बनारसीपन और अल्हड़पन से है।
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ममता कहती है, ‘बनारस में सब गुरु, केहू नाहीं चेला’। यह एक ऐसा शहर है जहां चाय की चुस्कियों के बीच ज्ञान की गंगा बहती रहती हैं। बनारस और बनारसी किसी भी परिभाषा से परे है। बनारस की असली खूबसूरती घाटों और संकरी गलियों वाले पक्के महाल में है। सड़क किनारे चाय की बैठकी हो या साड़ियों और मोतियों का व्यापार बनारसी कला की प्रसिद्धि दूर-दूर तक है। बनारस वह समंदर है जहां मोती वाली सीप खुद डूबने पर ही मिलेगी। मुबंई में रहने वाली ममता का दिल यहीं बनारस की गलियों में रमता है। वो कहती है बनारस के कण-कण में संगीत बसा है, गंगा की अविरल धारा हो या गारी सभी में संगीत की बसा है।
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काशी में सावन की मस्ती, उमंग, झूला झूलने की यादें आज भी मेरे दिल के करीब है। लहरतारा निवासी ममता मुंबई में अब तक कई हिंदी व भोजपुरी फिल्मों में अपनी आवाज दे चुकीं हैं। ममता ने अपनी संगीत की प्रारंभिक शिक्षा पिता रजनीकांत उपाध्याय से ली है। सपनों के इस शहर की भागती दौड़ती जीवनशैली में बनारस आने का मौका बहुत कम ही मिलता है। काशी जैसा मस्तमौला और अपनापन का शहर कहीं नहीं। आज काशी विकास के पथ पर अग्रसर है, लेकिन यहां कि जिंदादिली काशीवासियों के दिल में उसी तरह रची-बसी है। इसकी पहचान सिर्फ यहां के मंदिरों और घाटों से ही नहीं बल्कि इसके कण-कण में बनारसीपन और अल्हड़पन से है।
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