विश्व संगीत दिवस: 300 साल पहले आकर काशी में बस गए, अब आठवीं पीढ़ी कर रही संगीत साधना; जानें खास
World Music Day: काशी सदियों से संगीत साधना की प्रमुख भूमि रही है। करीब 300 वर्ष पहले देश के विभिन्न हिस्सों से आए संगीत घराने यहां बस गए और अपनी परंपरा को आगे बढ़ाया। आज उनकी आठवीं पीढ़ी भी संगीत की साधना में जुटी है। पूरब, पश्चिम, उत्तर और दक्षिण भारत की संगीत परंपराओं का अनूठा संगम काशी की सांस्कृतिक पहचान बना हुआ है।
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Varanasi News: काशी के कण-कण में शंकर हैं तो घर-घर संगीत भी बसता है। चाहे वो पूरब से पश्चिम और उत्तर से दक्षिण तक के घराने यहां आए। वो श्रीकाशी विश्वनाथ के साथ संगीत की उपासना में विलीन हो गए। उनकी दो सौ से 350 साल यानी पांच से आठ पीढि़यां साधना करती चली आ रही हैं। यूं कहें तो बनारस घराने की संगीत में देशभर के घरानों के संगीत बसता है।
पं. छन्नूलाल मिश्र किराना घराने, पं. ओंकारनाथ ठाकुर, डॉ. राजेश्वर आचार्य ग्वालियर और पं. ऋत्विक सांन्याल डागर घराने के साथ बनारस को जीना शुरू किया। दक्षिण से काशी में रचीं-बसीं डॉ. एन राजम् ने वायलिन को दुनिया में स्थापित किया। भारत रत्न उस्ताद बिस्मिल्लाह खां भी बिहार के डुमराव से आकर शहनाई को इस कदर तराशा कि दुनिया उनकी मुरीद हो गई।
संगीत वेदों से निकला है। देवताओं की आराधना के साथ लोक तक पहुंची। सांस्कृतिक राजधानी के रूप में काशी की पहचान दुनिया में बनी। यहां के खासकर मंदिरों और रईसों के यहां बचती रही। हर किसी में काशी में रचने-बसने की अभिलाषा बढ़ी। संगीत को जीने वाले हर घराने की कला की बारीकियां लेकर काशी आए और वक्त के साथ बनारस का संगीत घराना और समृद्धि होता गया।
बनारस घराने के प्रमुख पुरोधा...
आज यहां संगीत का हर विधा पुष्पित और पल्लवित होकर इस मुकाम पर पहुंच गया है कि बनारस घराना देश-विदेश में हर घराने का प्रतिनिधित्व करता है। पद्मभूषण पं. साजन मिश्र का परिवार भी 300 साल पहले बाहर से काशी आया और बनारस घराने को आत्मसात कर लिया।
उन्होंने बताया कि बाहर के कलाकार काशी में आकर यहां के संगीत को सीखकर अपनी कला को और निखारा। पद्म सम्मान प्राप्त डॉ. एन राजम् ने यहां गायिकी अंग को सीखकर अपनी वायलिन को और विस्तार दिया। पांच दशक से संगीत साधना कर रहे डागर घराने के पद्मश्री ऋत्विक सांन्याल पंश्चिम बंगाल से होकर मुंबई पहुंचे और फिर यहां पर बीएचयू में संगीत शिक्षक के रूप में पहुंचे। अव यहां बनारस घराने के साथ प्राचीन ध्रुपद गायिकी को और समृद्ध कर रहे हैं।
कहा कि हर काल में संगीत में उतार-चढ़ाव आए। हर घराने की पीढि़यां अपनी गुरु परंपरा और कला को बचाए रखने के लिए संघर्ष करती रहीं और आगे बढ़ीं। ग्वालियर घराने के ओंकारनाथ ठाकुर की परंपरा के पं. बलवंत राव भट्ट, डॉ. राजेश्वर आचार्य और प्रो. मंगला कपूर सभी को पद्म सम्मान मिला।
डॉ. राजेश्वर आचार्य ने बताया कि यहां संगीत की हर विधा के सिद्धस्त कलाकार हैं। यही वजह है कि तमाम घरानों के कलाकारों की यह कर्मभूमि बन गई। बंग्लादेश से आए सितार व सूरबहार के साधक पं. रवींद्र गोस्वामी की काशी में पांचवीं पीढ़ी है। वे संकटमोचन मंदिर के महंत प्रो. विश्वंभरनाथ मिश्र के दादा पखावज वादक पं. अमरनाथ मिश्र की शिष्य पंरपरा के हैं। कर्नाटक संगीत के भी कलाकार आए।
डॉ. कमला शंकर के दादा रंगा स्वामी 1920 में चैन्नई से काशी आए। डॉ. कमला बीएचयू से संगीत की पढ़ाई की और गिटार के साथ गायिकी अंग की शिक्षा पं. छन्नूलाल मिश्र, पं. अमरनाथ मिश्र, मंजू सुंदरम से लेकर आज काशी की प्रतिनिधि कलाकार के रूप में स्थापित हैं।
चेन्नई के वायलिन वादक वी बाला जी की पांचवीं पीढ़ी काशी में संगीत को बढ़ा रही है। कहा कि यहां आकर वायलिन के जरिए संगीत का गुलस्ता तैयार किया। महाराष्ट्र की डॉ. अर्चना आदित्य म्हसकर ने बताया कि पिता के बांसुरी बजाते देख मेरे मन में भी संगीत के प्रति रुझान बढ़ा। बीएचयू से संगीत की पढ़ाई करने के बाद पं. राजन-साजन मिश्र से सीखकर तमाम मंचों से घराने की संगीत को बढ़ा रही हैं।
शिवाला मोहल्ले में रहे प्रख्यात कलाकार उस्ताद मुश्ताक अली खान ने सेनीया घराने को विस्तार दिया, जिनके शिष्य पद्मभूषण पं. देबू चौधरी और उनके पुत्र प्रतीक चौधरी ने परंपरा को आगे बढ़ाए। मैहर घरने के पं. अमित भंट्टाचार्य सहित अन्य घराने के भी कलाकार यहां आकर अपनी कलाकार को और विस्तार दिया। भट्ट परंपरा के प्रतिनिधि के रूप में पं. रामाश्रय काशी में रहे।
अब सरकार करे संगीत का संरक्षण
पं. ऋत्विक सांन्याल ने बताया कि हर स्टेट के राजा संगीत को दरबार प्रश्रय दिया और इनका संरक्षण भी किया। तभी अनादिकाल से चली आ रही है। मगर, भारत की आजादी के बाद पहले की व्यवस्था खत्म होने के बाद संगीत को दिक्कत हुई है। संगीत के संरक्षण के लिए सरकार को आगे आना चाहिए।
बनारस की सुर, लय व ताल से सजीं फिल्में
बनारस घराने का संगीत सिर्फ मंचों तक ही नहीं बंधा रहा। तमाम कलाकारों ने फिल्मों को सुर, लय व ताल से सजाया। डॉ. राजेश्वर आचार्य ने बताया कि बनारस की प्रख्यात नृत्यांगना सितारा देवी, गोपी कृष्ण, पदमा खन्ना ने फिल्मों में नृत्य दिया। अंजान और इनके बेटे समीर ने फिल्मों तमाम चर्चित गीत दिए।
संगीतकार और गायक रहे हेमंत कुमार भी यहां से शिक्षा ग्रहण किए। उस्ताद बिस्मिल्लाह खां ने शहनाई, पं. सामता प्रसाद मिश्र उर्फ गुदई महाराज ने तबला, पं. राजन-साजन मिश्र ने स्वर दिया। शोले फिल्म में मौसी का किरदार बहुत चर्चित रहा। भोजपुरी फिल्मों के दिलीप कुमार कहे जाने वाले शमशेर बहादुर सिंह उर्फ सुजीत कुमार भी अभिनय दमदार रही। और कलाकारों संगीत के साथ अभिनय फिल्मों में अपनी पहचान बनाई।
विदेशी सीखे और विदेशों में पहुंचाए बनारस घराने की संगीत
विदेशों से संगीत की तलाश में काशी आए तमाम कलाकार सिद्धहस्त होकर आज अपने देशों के अलावा अन्य देशों में गायन, वादन और नृत्य में बनारस घराने का नेतृत्व कर रहे हैं। पं. रवींद्र गोस्वामी से संगीत शिक्षा लेने वालों में इटली के जॉनी, ग्रीस के नेक तरीओस, स्वीडन के केजी ओएस्ट आदि हैं। पं. अमरनाथ मिश्र की पखावज परंपरा को सीखकर जापान के टेस्टा कंहाइको आदि हैं।
विश्व के संगीत का केंद्र बना काशी
बनारस संगीत घरान आज दुनिया का केंद्र बना हुआ है। यहां के कलाकार विभिन्न प्रांतों के अलावा विदेशों में घराने की संगीत को विस्तार दे रहे हैं। सितार वादक पं. देवब्रत मिश्र और सरोद वादक अंशुमान महाराज ने बताया कि यहां के कलाकारों को विदेशों में लोग पसंद करते हैं। यहां सीखने के लिए भी विभिन्न देशों के कलाकार यहां आकर संगीत सीख रहे हैं। तमाम घरों में गुरुकुल पद्धति से संगीत की शिक्षा दी जाती है। यहां तमाम संगीतज्ञों ने संगीत की पुस्तकें भी लिखी है।
जानें घराने की पहचान
बनारस घराना संगीत के हर विधा में सिद्धहस्त है। सितार के लिए सैनिया (तानसेन), मेहर, इटावा (इंदादखानी), गायन किराना, डागर, ग्वालियर, पटियाला, आगरा, जयपुर अतरौली, रामपुर सहस्वान, दरभंगा, तबला व कथक में दिल्ली, लखनऊ, अजराणा (मेरठ), फरुर्खाबाद, जयपुर आदि है। मथुरा में ध्रुपद शैली में पुष्टिमार्गीय लोग गायन करते हैं।
पं. रविशंकर व पं. हरि प्रसाद काशी से हुए लिए गुरु दीक्षा
पं. रविशंकर बनारस घराने से निकलकर मैहर घराने में गए। वह मैहर जाकर बाबा अलाउद्दीन खान साहब से सितार वादन की शिक्षा ली। उन्होंने सितार को दुनिया में मुकम्मल स्थान दिलाया। बांसुरी वादन के प्रख्यात कलाकार पं. हरि प्रसाद चौरसिया भी मेहर घराने के रहे। मगर, उनके प्रारंभिक गुरु काशी के पं. भोलानाथ मिश्र रहे। ऐसे कुछ कलाकारों ने बनारस घराने से निकलकर दूसरे घराने के साथ अपनी कला को और विस्तार दिए।
प्रसन्ना परिवार ने बांसुरी को तराशा
काशी में बांसुरी वादन को समृद्ध करने वाले प्रसन्ना परिवार को अहम् योगदान है। इस परिवार के रघुनाथ प्रसन्ना, भोलानाथ, राजेंद्र, अजय प्रसन्ना आदि हैं। इस परिवार के कलाकार देश-विदेश में बांसुरी के जादू बिखेर रहे हैं। जबकि रोनू मजूमदार भी काशी में ही सीखे। नए कलाकार भी सीख रहे हैं।
बनारस घराने के ये हैं पुरोधा
पं. कंठे महाराज, गुदई महाराज, पं. किशन महाराज, पं. महादेव प्रसाद मिश्र, पं. लच्छू महराज, गिरिजा देवी, सिद्धेश्वरी देवी, रसीूलन बाई और बड़ी मोती बाई, सितारा देवी, पं. अनोखे लाल मिश्र, पंडित विकास महाराज, पं. रामसहाय, पं. शारदा सहाय, पं. रविशंकर मिश्र, ज्योतिन भट्टाचार्या, पं. उदयशंकर मिश्र, पं. राजन-साजन मिश्र, पं. शिवनाथ मिश्र, डॉ. राजेश्वर आचार्य, लालमणि मिश्र, पं. देवब्रत मिश्र, विशाल कृष्ण, पं. अनूप मिश्रा आदि कलाकार हैं।
पं. ओंकारनाथ ठाकुर ने 15 अगस्त को सुनाए थे वंदे मातरम्
ग्वालियर घराने के संगीत मार्तंड गायक रचनाकार पं. ओंकारनाथ ठाकुर 'प्रणवरण' महामना मालवीय जी की इच्छा के बीएचयू में संगीत को बढ़ाया। वह 15 अगस्त 1947 को आकाशवाणी दिल्ली से वंदे मातरम का गायन किया था, जिसका जीवंत प्रसारण देशभर में हुआ था।
उनके शिष्य पदमश्री पं. बलवंत राय भट्ट गुजरात से आकर बीएचयू में संगीत की सेवा की। इनके शिष्यों में पद्मश्री डॉ. राजेश्वर आचार्य 1972 में अनवरत 12 घंटे तक के जलतरंग वादन तथा 13 घंटे तक श्रीरामचरित मानस का शास्त्रीय गायन कर दो विश्व कीर्तिमान स्थापना किए।