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अंतरराष्ट्रीय मजदूर दिवस: जैसा कल था वैसा ही है आज, नहीं बदले हालात
ब्यूरो,अमर उजाला,वाराणसी
Updated Mon, 01 May 2017 03:21 PM IST
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सरकार के प्रयासों के बाद भी बाल श्रम पर नहीं लगा रोक
- फोटो : अमर उजाला
मल्टी स्टोरी बिल्डिंग हों, पुल या अन्य निर्माण कार्य, इन्हें मूर्त रूप देकर विकास का ढांचा खड़ा करने वाले मजदूरों को राहत देने के लिए भले ही सरकारी स्तर पर तमाम योजनाएं चलाई जा रही हों लेकिन आज भी ऐसे असंगठित मजदूरों की बड़ी तादाद है जो हर रोज बाजार में खुद को बिकने के लिए तैयार नजर आते हैं।
दो वक्त की रोटी के लिए मजदूर आज भी भटक रहे हैं। इसमें सबसे अधिक परेशानी में असंगठित क्षेत्र के मजदूर हैं। योजनाएं भी कई संचालित की जा रही हैं मगर उन तक पहुंच नहीं पाती हैं। श्रमिकों का कहना है कि केंद्र और प्रदेश सरकार योजनाएं तो अच्छी बनाती हैं लेकिन बिचौलिए हम तक विकास की किरण पहुंचने नहीं देते।
सुंदरपुर के सुभाष दिनभर मजदूरी कर जीविकोपार्जन करते हैं। उनका कहना है कि जैसे पहले जीवन यापन कर रहे थे वैसे आज भी कर रहे हैं। दिनभर काम करने के बाद जो मजदूरी मिल जाती है उसी से संतोष करना पड़ता है।
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सरायनंदन के महेश और नेवादा केरामचंद्र कहते हैं कि मजदूरी न करें तो सुबह और शाम परिवार को भोजन मुहैया कराना मुश्किल होता है। बीमार होने पर जो सुविधाएं और लाभ मिलना चाहिए वह भी कभी नहीं मिलता।
संयुक्त ट्रेड यूनियन आयोजन समिति के संयोजक अजय मुखर्जी का कहना है कि संगठित क्षेत्र के कर्मचारी तो संघर्ष कर अपनी मांगें कुछ हद तक पूरा करा लेते हैं। सबसे खराब हालत असंगठित क्षेत्र के मजदूरों की है।
न्यूनतम वेतन का पालन अब तक नहीं हो पा रहा है। आठ घंटे की जगह 12 से 14 घंटे तक काम कराया जा रहा है। सरकारें गंभीर नहीं होंगी तब तक श्रमिकों को उनका हक नहीं मिलेगा।
उधर, मई दिवस की पूर्व संध्या पर युवा शक्ति के अध्यक्ष रमाकांत जायसवाल की ओर से रविवार को पीलीकोठी पर गोष्ठी का आयोजन किया गया।
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दो वक्त की रोटी के लिए मजदूर आज भी भटक रहे हैं। इसमें सबसे अधिक परेशानी में असंगठित क्षेत्र के मजदूर हैं। योजनाएं भी कई संचालित की जा रही हैं मगर उन तक पहुंच नहीं पाती हैं। श्रमिकों का कहना है कि केंद्र और प्रदेश सरकार योजनाएं तो अच्छी बनाती हैं लेकिन बिचौलिए हम तक विकास की किरण पहुंचने नहीं देते।
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सुंदरपुर के सुभाष दिनभर मजदूरी कर जीविकोपार्जन करते हैं। उनका कहना है कि जैसे पहले जीवन यापन कर रहे थे वैसे आज भी कर रहे हैं। दिनभर काम करने के बाद जो मजदूरी मिल जाती है उसी से संतोष करना पड़ता है।
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सरायनंदन के महेश और नेवादा केरामचंद्र कहते हैं कि मजदूरी न करें तो सुबह और शाम परिवार को भोजन मुहैया कराना मुश्किल होता है। बीमार होने पर जो सुविधाएं और लाभ मिलना चाहिए वह भी कभी नहीं मिलता।
संयुक्त ट्रेड यूनियन आयोजन समिति के संयोजक अजय मुखर्जी का कहना है कि संगठित क्षेत्र के कर्मचारी तो संघर्ष कर अपनी मांगें कुछ हद तक पूरा करा लेते हैं। सबसे खराब हालत असंगठित क्षेत्र के मजदूरों की है।
न्यूनतम वेतन का पालन अब तक नहीं हो पा रहा है। आठ घंटे की जगह 12 से 14 घंटे तक काम कराया जा रहा है। सरकारें गंभीर नहीं होंगी तब तक श्रमिकों को उनका हक नहीं मिलेगा।
उधर, मई दिवस की पूर्व संध्या पर युवा शक्ति के अध्यक्ष रमाकांत जायसवाल की ओर से रविवार को पीलीकोठी पर गोष्ठी का आयोजन किया गया।
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