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कठिन परिश्रम के दम पर बुलंद की कामयाबी
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वाराणसी। महिलाएं हर क्षेत्रों में अपनी कामयाबी का झंडा बुलंद की हुई है। व्यापार, उद्योग, समाजसेवा सहित हर क्षेत्र में अव्वल हैं। कठिन संघर्षों और चुनौतियों का सैलाब सहकर आज सफलता की नई इबारत गढ़ रही हैं। अपराजिता कॉलम में पढ़िए इन महिलाओं के संघर्षों और सफलता की कहानी।
दिव्यांगों की सेवा में रमता है मन
वाराणसी। शौक में शुरू किया गया काम कब मिशन बन जाता है यह डॉ संपदा गंगवार से बेहतर कोई बता नहीं सकता। शादी के बाद स्पेशल चाइल्ड की देखरेख में ऐसा मन रमा कि डॉ संप्रदा ने इसे खुद में उतार दिव्यांग बच्चों की सेवा में जुट गई। एक एनजीओ में ठीक ठाक नौकरी छोड़कर प्राणिक हीलिंग व मेडिटेशन के जरिए दूसरों का दर्द कम कर रही हैं। डॉ संप्रदा पिछले दस साल से स्पेशल चाइल्ड और दिव्यांग महिलाओं की सहायता कर रही हैं। सिकरौल वार्ड की रहने वाली डॉ संप्रदा कहती हैं कि शादी के बाद वाराणसी से पीएचडी और अन्य सामाजिक कार्यों को शुरू किया। 19 वर्ष की आयु में शादी के बाद जुड़वा बेटों में एक स्पेशल चाइल्ड निकला तो फिर मुझे लगा कि ऐसे बच्चों की देखभाल जरूरी है। यह काम शौक के तौर पर शुरू किया और अब मिशन में तब्दील हो गया है।
चुनौतियां -
महिलाओं को सपोर्ट बहुत कम मिलता है -
शुरुआत में दो जुड़वा बच्चे, जिसमें एक स्पेशल चाइल्ड को संभालना मुश्किल भरा रहा
अन्य किसी भी तरह का शुरू में कोई सहयोग नहीं मिला
बनारस में नई आइडिया से दिया हजारों को रोजगार
1999 में आर्ट एंड क्राफ्ट और वेडिंग पार्टी का कांसेप्ट लेकर आने वाली कमच्छा की पूजा सेठ ने कइयों को सफल बनाया। रोजगार दिया तो वहीं कई लोग आत्मनिर्भर होकर अन्य को रोजगार दे रहे हैं। दो दशक से वाराणसी में अपनी काबिलियत और मेहनत से मुकाम हासिल किया। इनके बनाए आर्ट की पूर्वांचल भर में डिमांड रहती है। इन दिनों क्राफ्ट व वेडिंग पार्टी के साथ ही ऑनलाइन वर्कशॉप के जरिए युवाओं को आत्मनिर्भर बनने की कवायद में जुटी हैं। घर बैठे व्यापार करने की दिशा में आगे बढ़ रही हैं। पूजा सेठ बताती हैं कि 1999 में वेडिंग पार्टी, गिफ्ट पैकिंग और आर्ट एंड क्राफ्ट का व्यापार शुरू किया। परिवार का सपोर्ट मिला तो चीजें और आसान होती गई। इन दो दशक में बहुत बदलाव आए और अब ऑनलाइन वर्कशॉप चलाती हूं, जिसमें 220 युवा सीनियर व जूनियर दो ग्रुप में जुड़ते हैं। उन्हें चॉकलेट बनाना, गिफ्ट पैकिंग, आर्ट, वेडिंग सामानों के बारे में जानकारी दी जाती है।
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चुनौतियां
कोई भी काम करने जाइये तो चुनौतियां रहती ही हैं-
नया काम था जल्दी लोगों को समझ में नहीं आया
2008 से 2012 के बीच में काफी संघर्ष करना पड़ा
सरकारी मदद तब उस समय नहीं मिलती थी
सामाजिकता में लगता है इनका मन
घर, व्यापार और सामाजिक कार्यों को एक साथ लेकर चलना हर किसी के बस में नहीं होता है। हालांकि इस कार्य को नि:स्वार्थ भाव से कर रही हैं मलदहिया की रहने वाली ऋतु जैन। डेढ़ दशक से बुटीक, शेयर ट्रेडिंग सहित अन्य कई कार्यों को करते हुए सफलता की सीढ़ी चढ़ती गई। बच्चे सफल हुए और आज समाज में आर्थिक तौर पर मदद करती हैं। बिना किसी शोरबाजी के गुपचुप तरीके गरीबों की मदद कर रही हैं। किसी की बेटी की शादी में मदद करती हैं तो किसी के बुजुर्ग माता-पिता की दवा के लिए सहारा बन जाती हैं। ऋतु जैन कहती है कि यदि हम सक्षम हैं और जरूरतमंद की मदद नहीं कर पाते हैं तो फिर हमारा मानव कहलाना व्यर्थ है। कोई आपसे उम्मीद से गुहार लगाता है। शुरुआत से ही हेल्पिंग नेचर की रही तो वह आदत छूटती नहीं और शायद अंतिम सांस तक रहेगी।
चुनौतियां
शुरू में बुटीक का व्यवसाय किया, जिसमें संघर्ष ही संघर्ष रहा
शेयर ट्रेडिंग में भी कार्य रहा
घर, परिवार के साथ व्यापार भी देखना पड़ता था
अब सामाजिक कार्यों में ही मन रमता है
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दिव्यांगों की सेवा में रमता है मन
वाराणसी। शौक में शुरू किया गया काम कब मिशन बन जाता है यह डॉ संपदा गंगवार से बेहतर कोई बता नहीं सकता। शादी के बाद स्पेशल चाइल्ड की देखरेख में ऐसा मन रमा कि डॉ संप्रदा ने इसे खुद में उतार दिव्यांग बच्चों की सेवा में जुट गई। एक एनजीओ में ठीक ठाक नौकरी छोड़कर प्राणिक हीलिंग व मेडिटेशन के जरिए दूसरों का दर्द कम कर रही हैं। डॉ संप्रदा पिछले दस साल से स्पेशल चाइल्ड और दिव्यांग महिलाओं की सहायता कर रही हैं। सिकरौल वार्ड की रहने वाली डॉ संप्रदा कहती हैं कि शादी के बाद वाराणसी से पीएचडी और अन्य सामाजिक कार्यों को शुरू किया। 19 वर्ष की आयु में शादी के बाद जुड़वा बेटों में एक स्पेशल चाइल्ड निकला तो फिर मुझे लगा कि ऐसे बच्चों की देखभाल जरूरी है। यह काम शौक के तौर पर शुरू किया और अब मिशन में तब्दील हो गया है।
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चुनौतियां -
महिलाओं को सपोर्ट बहुत कम मिलता है -
शुरुआत में दो जुड़वा बच्चे, जिसमें एक स्पेशल चाइल्ड को संभालना मुश्किल भरा रहा
अन्य किसी भी तरह का शुरू में कोई सहयोग नहीं मिला
बनारस में नई आइडिया से दिया हजारों को रोजगार
1999 में आर्ट एंड क्राफ्ट और वेडिंग पार्टी का कांसेप्ट लेकर आने वाली कमच्छा की पूजा सेठ ने कइयों को सफल बनाया। रोजगार दिया तो वहीं कई लोग आत्मनिर्भर होकर अन्य को रोजगार दे रहे हैं। दो दशक से वाराणसी में अपनी काबिलियत और मेहनत से मुकाम हासिल किया। इनके बनाए आर्ट की पूर्वांचल भर में डिमांड रहती है। इन दिनों क्राफ्ट व वेडिंग पार्टी के साथ ही ऑनलाइन वर्कशॉप के जरिए युवाओं को आत्मनिर्भर बनने की कवायद में जुटी हैं। घर बैठे व्यापार करने की दिशा में आगे बढ़ रही हैं। पूजा सेठ बताती हैं कि 1999 में वेडिंग पार्टी, गिफ्ट पैकिंग और आर्ट एंड क्राफ्ट का व्यापार शुरू किया। परिवार का सपोर्ट मिला तो चीजें और आसान होती गई। इन दो दशक में बहुत बदलाव आए और अब ऑनलाइन वर्कशॉप चलाती हूं, जिसमें 220 युवा सीनियर व जूनियर दो ग्रुप में जुड़ते हैं। उन्हें चॉकलेट बनाना, गिफ्ट पैकिंग, आर्ट, वेडिंग सामानों के बारे में जानकारी दी जाती है।
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चुनौतियां
कोई भी काम करने जाइये तो चुनौतियां रहती ही हैं-
नया काम था जल्दी लोगों को समझ में नहीं आया
2008 से 2012 के बीच में काफी संघर्ष करना पड़ा
सरकारी मदद तब उस समय नहीं मिलती थी
सामाजिकता में लगता है इनका मन
घर, व्यापार और सामाजिक कार्यों को एक साथ लेकर चलना हर किसी के बस में नहीं होता है। हालांकि इस कार्य को नि:स्वार्थ भाव से कर रही हैं मलदहिया की रहने वाली ऋतु जैन। डेढ़ दशक से बुटीक, शेयर ट्रेडिंग सहित अन्य कई कार्यों को करते हुए सफलता की सीढ़ी चढ़ती गई। बच्चे सफल हुए और आज समाज में आर्थिक तौर पर मदद करती हैं। बिना किसी शोरबाजी के गुपचुप तरीके गरीबों की मदद कर रही हैं। किसी की बेटी की शादी में मदद करती हैं तो किसी के बुजुर्ग माता-पिता की दवा के लिए सहारा बन जाती हैं। ऋतु जैन कहती है कि यदि हम सक्षम हैं और जरूरतमंद की मदद नहीं कर पाते हैं तो फिर हमारा मानव कहलाना व्यर्थ है। कोई आपसे उम्मीद से गुहार लगाता है। शुरुआत से ही हेल्पिंग नेचर की रही तो वह आदत छूटती नहीं और शायद अंतिम सांस तक रहेगी।
चुनौतियां
शुरू में बुटीक का व्यवसाय किया, जिसमें संघर्ष ही संघर्ष रहा
शेयर ट्रेडिंग में भी कार्य रहा
घर, परिवार के साथ व्यापार भी देखना पड़ता था
अब सामाजिक कार्यों में ही मन रमता है