बनारस की जुड़ी पौराणिक नदी वरुणा में अब लगा सकेंगे डुबकी, एनजीटी की सख्ती से हुआ काम
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काशी की पहचान से जुड़ी पौराणिक नदी वरुणा के दिन अब बहुरने वाले हैं। एनजीटी की सख्ती के बाद वरुणा के पानी की गुणवत्ता में अब सुधार हो रहा है। प्रदूषण विभाग के अधिकारियों का कहना है कि आने वाले कुछ महीनों में वरुणा का पानी काशीवासियों के लिए नहाने लायक हो जाएगा। वरुणा में गिरने वाले नालों को बंद करने के बाद सप्ताह भर के आंकड़ों के अनुसार वरुणा के पानी की गुणवत्ता में अब तेजी से सुधार हो रहा है।
शहर के बीचोंबीच बहने वाली वरुणा नदी में गिरने वाले 11 नालों को जनवरी के प्रथम सप्ताह में बद करा दिया गया है। हालांकि पानी का स्तर कम होने से जगह-जगह गंदगी नजर आ रही है। क्षेत्रीय प्रदूषण नियंत्रण विभाग की ओर से सप्ताह भर के लाइव वाटर मॉनिटरिंग के आंकड़ों के अनुसार वरुणा में घुलनशील आक्सीजन की मात्रा दुगुनी होने के साथ ही फीकल कॉलीफार्म की मात्रा भी लगभग आधी हो गई है। वरुणा में प्रवाह के साथ ही पानी की गुणवत्ता में भी सुधार हो रहा। प्रदूषण नियंत्रण विभाग की रिपोर्ट के अनुसार वरुणा के पानी में सप्ताह भर से बदलाव नजर आ रहा है।
वरुणा में गिरने वाले 11 नालों को बंद कर दिया गया है और बाकी बचे नाले भी बंद कर दिए जाएंगे। वहीं वरुणा में भी घुलनशील आक्सीजन की मात्रा बढ़ी है। जल्द ही वरुणा का पानी नहाने लायक भी हो जाएगा। - कालिका सिंह, क्षेत्रीय प्रदूषण नियंत्रण अधिकारी
गिर रहे थे 14 नाले, पास से गुजरना है मुश्किल
शहर के अंदर वरुणा में गिरने वाले 11 नालों को अब बंद कर दिया गया हैै। बाकी बचे नालों को भी जल्द ही बंद करने की कवायद चल रही है। बता दें कि 14 गंदे नाले वरुणा में गिर रहे थे। वरुणा में गंदगी का आलम यह है कि उसके पास से गुजरने वाले नाक पर कपड़ा लगा लेते थे। आदमी तो दूर पशु-पक्षी भी इसके पानी को पी नहीं सकते है। इसके चलते गंगा वरुणा के संगम आदिकेशव घाट पर तो बैठना मुश्किल हो गया था। आसपास के गांव की खेती भी बरबाद हो चुकी थी। गंगा वरुणा संगम पर फीकल कॉलीफार्म की मात्रा एक से डेढ़ लाख के बीच हुआ करती थी, जो अब धीरे-धीरे 10 जनवरी से सुधर रही है।
162 किलोमीटर की यात्रा करके वाराणसी पहुंचती है वरुणा
इलाहाबाद जिले की फू लपुर तहसील के मैलहन तालाब से निकलकर भदोही और जौनपुर होते हुए 162 किलोमीटर की यात्रा करके वरुणा वाराणसी पहुंचती है और बीच वाराणसी में गंगा में मिल जाती है। वरुणा नदी का अस्तित्व संकट में पड़ने का मुख्य कारण शहर के सीवरों का इसमें गिरना है। इसके अलावा वरुणा के दोनों तटों पर अतिक्रमण करके बहुमंजिली इमारतें बना ली गई हैं। भदोही एवं आसपास के क्षेत्रों का कालीन का कचरा भी सीधे वरुणा में गिराया जा रहा था।
बढ़ रहा है नदी का पेटा
वरुणा के उद्गम स्थल से लेकर गंगा संगम यानी आदिकेशव तक ड्रेजिंग के प्रस्ताव पर शासन की पहले ही सहमति मिल चुकी है। वर्ष 2016 में इस पर शहरी क्षेत्र के भीम नगर से आदिकेशव तक 10.03 किलोमीटर में 201.65 करोड़ की लागत से कॉरिडोर का काम भी लगभग पूरा हो चुका है। वरुणा को सिर्फ शहरी इलाके के बजाय हेड-टू-टेल गहरा करते हुए वर्ष भर जलाजल रखने का इंतजाम कर लिया गया तो यह किसानों के लिए संजीवनी के समान होगी। इसके अलावा गंगा के बाद वरुणा में भी जल परिवहन को विस्तार दिया जा सकेगा।
असि नदी का भी उद्धार
वाराणसी की पहचान के लिहाज से वरुणा व असि बेहद महत्वपूर्ण हैं। वरुणा के साथ ही असि को पुनर्जीवित करने के लिए सीवेज पाइप डालने का खाका खींचा गया है। इसे रमना एसटीपी से सीधे जोड़ कर असि को अस्तित्व दिया जाएगा। इसके लिए पूरे नदी क्षेत्र का सर्वे करा कर अतिक्रमण भी हटाए जाएंगे।
गंगा में मिलने से पहले वरुणा की स्थिति
तारीख पीएच घुलनशील आक्सीजन बीओडी फीकल कॉलीफार्म
नौ जनवरी 7.73 3.7 9.2 63000
10 जनवरी 7.71 3.5 10.8 63000
11 जनवरी 7.65 3.2 12 70000
12 जनवरी 7.66 3.5 11.2 70000
13 जनवरी 7.63 3.3 12.4 70000
14 जनवरी 7.61 3.1 13.2 70000
15 जनवरी 7.64 3.2 12.8 63000
16 जनवरी 7.75 4.3 9.2 49000
17 जनवरी 7.81 6 7.2 46000
18 जनवरी 7.72 6 7.6 46000
19 जनवरी 7.75 6.2
20 जनवरी 7.73 6
21 जनवरी 7.77 6.3
फीकल कॉलीफार्म की मात्रा के मानक
भारत सरकार के तय मानकों के अनुसार पीने के पानी मे कालीफ ार्म की संख्या 50 एमपीएन प्रति 100 मिली से ज्यादा नहीं होनी चाहिए। इसके अलावा नहाने के लिए अधिकतम कॉलीफ ार्म 500 एमपीएन प्रति 100 मिली निर्धारित है। पीने के पानी में अधिकतम कालीफ ार्म 5000 एमपीएन प्रति 100 मिली हो तो शुद्धिकरण करने के पश्चात पानी को पीया जा सकता है।
गंगा से भी प्राचीन है वरुणा
काशी विश्वनाथ मंदिर के पूर्व महंत डॉ. कुलपति तिवारी ने बताया कि मान्यता है कि वरुणा नदी गंगा से भी प्राचीन है। मैलहन झील के दक्षिण पूर्व में भगवान इंद्र, वरुण, यम त्रिदेवों ने त्रिदेवेश्वर शिवलिंग स्थापित कर यज्ञ किया। देवता व ऋ षियों के प्रसाद ग्रहण के उपरांत हस्त प्रक्षालन से मैलहन झील भर गई। त्रिदेवों के निर्देश पर मैलहन झील से नदी खुदवाकर अस्सी नदी में जोड़ दिया गया। इसका विस्तार से वर्णन पुराणों में मिलता है।