फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
डाउनलोड करें

सब्सक्राइब करें
Hindi News ›   Uttar Pradesh ›   Varanasi News ›   Why is Dev Deepawali celebrated in Kashi what is the importance of lamp donation?

Dev Deepawali: काशी में क्यों मनाई जाती है देव दीपावली, दीपदान का क्या होता है महत्व ?

Wed, 02 Nov 2022 07:24 AM IST
किरन रौतेला न्यूज डेस्क, अमर उजाला, वाराणसी
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, वाराणसी Published by: किरन रौतेला Updated Wed, 02 Nov 2022 07:24 AM IST
सार

काशी विद्वत कर्मकांड परिषद के राष्ट्रीय अध्यक्ष आचार्य अशोक द्विवेदी ने बताया कि कार्तिक पूर्णिमा के दिन भगवान शिव के पुत्र कार्तिकेय ने तारकासुर का वध करके देवराज इंद्र को स्वर्ग का राज्य वापस दिलाया था। तारकासुर के वध के बाद उसके तीनों बेटों ने देवताओं से बदला लेने का फैसला कर लिया। उन्होंने ब्रह्मा जी की तपस्या करके तीन पुर मांगे और कहा की जब यह तीनों पर जब अभिजित नक्षत्र में एक साथ आ जाएं तब असंभव व्रत, असंभव बाण से बिना क्रोध किए हुए ही उनका वध हो सकेगा। 

विज्ञापन
Why is Dev Deepawali celebrated in Kashi what is the importance of lamp donation?
देव दीपावली 2021 - फोटो : अमर उजाला

विस्तार

राज राजेश्वर शिव की नगरी काशी में देव दीपावली पर देव स्वयं धरा पर उतर आते हैं। सात नवंबर को काशी में देव दीपावली मनाई जाएगी। घाट से लेकर गलियों में जन जन का उत्साह अलग स्वरूप में नजर आता है। मान्यता है कि काशीपुराधिपति कार्तिक पूर्णिमा पर स्वयं सभी देवी देवताओं के साथ गंगा तट पर दीपदान करने आते हैं। इसलिए भी इसको देवदीपावली कहा जाता है। काशी के अर्द्ध चंद्राकार घाट जब दीपों का हार पहनकर प्रज्ज्वल होते हैं तो इस स्वर्गिक आभा का दर्शन एक अद्भुत अनुभूति कराता है।
विज्ञापन

 

Why is Dev Deepawali celebrated in Kashi what is the importance of lamp donation?
काशी की देव दीपावली - फोटो : अमर उजाला

काशी विद्वत कर्मकांड परिषद के राष्ट्रीय अध्यक्ष आचार्य अशोक द्विवेदी ने बताया कि कार्तिक पूर्णिमा के दिन भगवान शिव के पुत्र कार्तिकेय ने तारकासुर का वध करके देवराज इंद्र को स्वर्ग का राज्य वापस दिलाया था। तारकासुर के वध के बाद उसके तीनों बेटों ने देवताओं से बदला लेने का फैसला कर लिया। उन्होंने ब्रह्मा जी की तपस्या करके तीन पुर मांगे और कहा की जब यह तीनों पर जब अभिजित नक्षत्र में एक साथ आ जाएं तब असंभव व्रत, असंभव बाण से बिना क्रोध किए हुए ही उनका वध हो सकेगा।  उन्होंने देवताओं को परेशान करना शुरू कर दिया और उन्हें स्वर्ग से बाहर निकाल दिया। सभी देवी देवता त्रिपुरासुर से बचने के लिए भगवान शिव की शरण में पहुंचे। देवताओं का कष्ट दूर करने के लिए भगवान शिव ने त्रिपुरासुर का वध किया। इस खुशी में सभी देवी देवता भगवान शिव की नगर काशी में पधारे और दीप दान किया। माना जाता है तभी से काशी में कार्तिक पूर्णिमा के दिन देव दीपावली मनाने की परंपरा चली आ रही है।


 
विज्ञापन
विज्ञापन

Why is Dev Deepawali celebrated in Kashi what is the importance of lamp donation?
देव दीपावली - फोटो : प्रयागराज
दीपदान से होती है मोक्ष की प्राप्ति
काशी विद्वत परिषद के महामंत्री डॉ. रामनारायण द्विवेदी ने बताया कि माना जाता है कि चतुर्दशी के दिन भगवान शिव और सभी देवी देवता काशी में आकर दीप जलाते हैं। भगवान साक्षात इस दौरान काशी को पावन धरा पर मौजूद रहते हैं तो ऐसे में  यदि इस दिन कोई व्यक्ति सच्चे मन से काशी में जाकर दीप जलाता है और भगवान से प्रार्थना करता है तो उसके जीवन की सभी इच्छाएं पूर्ण होती है और मृत्यु के बाद उसे मोक्ष की प्राप्ति होती है।

ज्योतिषाचार्य विमल जैन ने बताया कि नदी, घाट और सरोवरों पर दीप जलाने की मान्यता मत्स्यावतार से भी जुड़ी है। पौराणिक मान्यता है कि इस दिन देवाधिदेव महादेव ने त्रिपुरासुर राक्षस का वध किया था तथा शिव जी के आशीर्वाद से दुर्गा रुपी पार्वती जी ने महिषासुर का वध करने के लिए सभी देवी देवताओं से शक्ति अर्जित की थी। मान्यता है कि इस दिन सायं काल भगवान श्री विष्णु भी मत्स्य अवतार के रूप में अवतरित हुए थे।

 
विज्ञापन

Why is Dev Deepawali celebrated in Kashi what is the importance of lamp donation?
देव दीपावली पर काशी को सजाया गया। - फोटो : अमर उजाला
ज्योतिषाचार्य दैवज्ञ कृष्ण शास्त्री ने बताया कि ब्रह्म मुहूर्त में उठकर निवृत्त होकर अपने आराध्य देवी देवता की पूजा अर्चना के पश्चात कार्तिक पूर्णिमा के व्रत का संकल्प लेना चाहिए। स्नान करके देव दर्शन करके   आकर्षक दीपमालिका सजाने की परंपरा है। नदियों और सरोवरों में इस दिन दीपदान किया जाता है। आज के दिन पीपल और तुलसी के वृक्षों का दीपक जला कर उनका पूजन किया जाता है। इस दिन प्रतीक के रूप में दान का भी विधान है। फ लाहार ग्रहण करके श्री सत्यनारायण भगवान की पूजा से अभीष्ट की प्राप्ति होती है। धर्म शास्त्रों में कार्तिक पूर्णिमा के दिन किए गए दान  का फल यज्ञ के समान बताया गया है।
विज्ञापन
विज्ञापन

रहें हर खबर से अपडेट, डाउनलोड करें Android Hindi News App, iOS Hindi News App और Amarujala Hindi News APP अपने मोबाइल पे|
Get all India News in Hindi related to live update of politics, sports, entertainment, technology and education etc. Stay updated with us for all breaking news from India News and more news in Hindi.

विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन

एड फ्री अनुभव के लिए अमर उजाला प्रीमियम सब्सक्राइब करें

Next Article

AU ऐप में पढ़ें

Followed