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जब 'अंग्रेजों भारत छोड़ो' की आंच पहुंची काशी, बीएचयू गेट से लौटना पड़ा था अंग्रेजों को

Sat, 08 Aug 2020 11:07 PM IST
गीतार्जुन गौतम न्यूज डेस्क, अमर उजाला, वाराणसी
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, वाराणसी Published by: गीतार्जुन गौतम Updated Sat, 08 Aug 2020 11:07 PM IST
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When angrejo bharat chhodo moment reached in varanasi British had to return from BHU Gate
काशी हिंदू विश्वविद्यालय। - फोटो : kashi hindu vishwavidyalay bhu

भारत छोड़ो आंदोलन 1942 की आंच ने उत्तर से दक्षिण भारत तक आजादी की एक नई उमंग जगा दी थी। बापू ने जब 'अंग्रेजों भारत छोड़ो' का नारा दिया तो युवा मन एक नए उल्लास से आंदोलन को धार देने में जुट गया। आंदोलन की आंच मुंबई से होते हुए काशी भी पहुंची थी। आंच को आग में तब्दील करने के लिए छात्रों ने देशभक्ति की अनूठी मिसाल पेश की। छात्रों के जुड़ते ही आंदोलन की आग तेज हो उठी।

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काशी विद्यापीठ के इतिहास विभाग के प्रो दिवाकर का कहना है कि 1942 में आठ अगस्त के करीब एक पखवारे बाद छात्रों को गिरफ्तार करने के लिए पुलिस फोर्स बीएचयू की तरफ बढ़ी थी। उस समय डॉ सर्वपल्ली राधाकृष्णन बीएचयू के कुलपति थे।
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बीएचयू परिसर के अंदर दाखिल होने के लिए अफसरों ने कुलपति से अनुमति मांगी। करीब चार घंटे तक फोर्स बीएचयू गेट पर खड़ी रही लेकिन डॉ राधाकृष्णन ने पुलिस को परिसर में घुसने की अनुमति नहीं दी। कुलपति के इस निर्णय ने छात्रों में उत्साह का नया संचार कर दिया। हालांकि बाद में राजनारायण और प्रभुनारायण समेत कई छात्रनेता गिरफ्तार कर लिए गए थे।

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डॉ संपूर्णानंद, त्रिभुवन सिंह, रघुनाथ सिंह और पं कमलापति त्रिपाठी जैसे बड़े नेता भूमिगत होकर आंदोलन की रणनीति बनाने में जुट गए। करीब सप्ताह भर तक इन नेताओं ने पुलिस को छकाया। तब तक भारत छोड़ो आंदोलन की मुहिम वाराणसी समेत पूरे पूर्वांचल में पहुंच चुकी थी।

कुलपति ने की घोषणा तो निकला जुलूस
राजीव गांधी स्टडी सर्किल के प्रो सतीश राय का कहना है कि बीएचयू में कुलपति डॉ राधाकृष्णन का भाषण चल रहा था। उन्हें किसी ने पर्ची पकड़ाई तो कुलपति ने घोषणा करते हुए कहा कि महात्मा गांधी गिरफ्तार हो गए हैं।

इसके बाद 10 अगस्त 1942 को बीएचयू से दशाश्वमेध तक जुलूस निकाला गया। जुलूस बढ़ता गया और कारवां जुड़ता गया। 11 अगस्त को ऐसा ही जुलूस कचहरी तक गया। अंग्रेजों की घुड़सवार पुलिस को देख महिलाओं को आगे कर दिया गया। यहां एक 11 साल के एक लड़के ने हौसला दिखाया और डीएम कार्यालय पर लगे अंग्रेजों के झंडे को उतार कर तिरंगा फहरा दिया।

12 अगस्त को काशी विद्यापीठ को डकैतों का अड्डा बताकर ताला चढ़ा दिया गया। 13 को बीएचयू बंद हुआ। 14 और 15 को पूरे पूर्वांचल में जगह-जगह जुलूस निकाले गए। रेल की पटरियां उखाड़ दी गई। इस लड़ाई में राजनारायण, राम मनोहर लोहिया, रुस्तम सैटिन, विरेश्वर मुखर्जी आदि शामिल रहे।

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