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बुनकरों ने 450 वर्ष पुरानी परंपरा को निभाया : अगहनी जुमे की नमाज से समृद्धि की कामना, रोचक है इसका इतिहास

Fri, 29 Nov 2024 03:24 PM IST
अमन विश्वकर्मा अमर उजाला नेटवर्क, वाराणसी।
अमर उजाला नेटवर्क, वाराणसी। Published by: अमन विश्वकर्मा Updated Fri, 29 Nov 2024 03:24 PM IST
सार

Varanasi News : नमाज के दाैरान सभी अकीदतमंदों ने मुल्क की तरक्की और हिफाजत के लिए दुआख्वानी की। सभी तंजीमों के सरदार और सदस्यों ने मिलकर बनारस के बुनकारी के कारोबार से जुड़े लोगों के साथ बैठक की। इस दाैरान तमाम मुसीबतों और अन्य मसलों पर चर्चा हुई।

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Weavers followed 450 year old tradition Wishing prosperity Aghani Jumme ki Namaaz history is interesting
पुराना पुल स्थित बड़ा ईदगाह पर नमाज अदा करते नमाजी। - फोटो : अमर उजाला

विस्तार

चार साै 50 साल पहले, जब देश में सूखे ने सभी क्षेत्रों को प्रभावित किया, तब काशी के बुनकरों ने एक अद्वितीय प्रयास किया। उन्होंने पुरानेपुल पुलकोहना ईदगाह में अगहन महीने के जुमे में नमाज अदा की। इस नमाज की अदायगी के साथ ही, चमकीली बूंदें गिरीं और समृद्धि की किरणें फैलीं।

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आज भी यह परंपरा जारी है, जब हर साल अगहन माह के दूसरे जुमे को इस ईदगाह में मुल्क की तरक्की और खुशहाली के लिए नमाज पढ़ी जाती है। इस नमाज में हजारों बुनकर एकत्रित होते हैं और आज के दिन मुर्री (कारोबार) भी बंद रहती है। यह परंपरा काशी के बुनकरों की एकता और समृद्धि की कामना का प्रतीक है।
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बुनकर तंजीम बाईसी के सरदार ने बताया कि अगहनी जुमे की नमाज अदा करने की परंपरा 450 साल से अधिक पुरानी है। यह परंपरा उस समय शुरू हुई जब देश में अकाल पड़ा और कारोबार ठप हो गए थे। लोग दाने-दाने को मोहताज हुए तो उस समय के लोगों ने इस ईदगाह में अगहनी जुमे की नमाज अदा की।
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उन्होंने बताया कि अल्लाह की बारगाह में बारिश और मुल्क की तरक्की के लिए हाथ बलंद किया तो उसने भी मायूस नहीं किया और जमकर बारिश हुई। तभी से यह परंपरा शुरू हुई और आज हम उसे निभाते आ रहे हैं। इस नमाज में बुनकर समाज के लोग बड़ी संख्या में शामिल हुए और तरक्की और समृद्धि की कामना की।

अगहनी जुमे के दिन मुस्लिम समुदाय के लोगों ने अपने कारोबार बंद रखे और नमाज अदा की। इसके बाद, सभी तंजीमों के सरदार और सदस्यों ने मिलकर बनारस के बुनकारी के कारोबार से जुड़े लोगों के साथ बैठक की। इस बैठक में कारोबार में हो रही दिक्कतों के बारे में चर्चा की गई और उनके समाधान के लिए रणनीति बनाई गई। इस बैठक की खास बात यह रही कि इसमें मुल्क की तरक्की और खुशहाली के लिए दुआख्वानी के साथ ही साथ आगे की रणनीति भी बनाई गई। इस बैठक में जो फैसला हुआ उसे सर्वसम्मति से माना गया।

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मुल्क की तरक्की के लिए दुआख्वानी। - फोटो : अमर उजाला

हिन्दू-मुस्लिम मिलकर मनाते हैं त्योहार
बनारस में एक अनोखी परंपरा है, जहां हिन्दू और मुस्लिम मिलकर सभी त्योहार मनाते हैं। चाहे ईद हो, दिवाली हो या होली, सभी त्योहार एकता और सौहार्द के साथ मनाए जाते हैं। आज का दिन भी इसी एकता का प्रतीक है, जहां हजारों की संख्या में लोग नमाज अदा करते हैं और इसके साथ ही गन्ने की बिक्री भी होती है। ईदगाह पुलकोहना के आसपास मेले जैसा माहौल है, जो इस एकता का प्रतीक है। यह परंपरा बुजुर्गों की देन है, जिन्होंने इसे शुरू किया और आगे बढ़ाया।

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