काशी में टूटेगी ढाई सौ साल पुरानी परंपरा, पहली बार दुर्गा पूजा में नहीं होगी मूर्ति की स्थापना
कोरोना संक्रमण के कारण काशी की पहली दुर्गा पूजा में इस बार माता की प्रतिमा नहीं विराजेगी। ढाई सौ साल पहले काशी को दुर्गोत्सव की छटा से परिचित कराने वाले बंगाली ड्योढ़ी में सिर्फ कलश स्थापना होगी।
अंग्रेजों के जमाने से शुरू हुई काशी की पहली दुर्गा पूजा में ढाई सौ सालों के इतिहास में पहली बार माता की प्रतिमा स्थापित नहीं की जा रही है। केंद्रीय पूजा समिति के अध्यक्ष तिलकराज मिश्र ने बताया कि करीब ढाई सौ साल पहले 1773 ईस्वी में बंगाली ड्योढ़ी से ही बनारस में सबसे पहले दुर्गा पूजा की शुरूआत हुई थी।
पूजा समिति के लोग गंगा की मिट्टी से ही माता की प्रतिमा, गणेश, कार्तिकेय और भगवान राम की प्रतिमाओं का निर्माण करते हैं। कोरोना संक्रमण के कारण इस बार प्रतिमा का निर्माण नहीं हो सका है। इसलिए समिति ने कलश स्थापना करके पूजन का निर्णय लिया है।
सबसे पहले बंगाली ड्योढ़ी में हुई थी शुरुआत
वरिष्ठ पत्रकार अमिताभ भट्टाचार्य ने बताया कि वैसे दुर्गा पूजा का मूल गढ़ कोलकाता को कहा जाता है लेकिन काशी को मिनी बंगाल का दर्जा मिला है। कोलकाता के गोविंद राम मित्र के प्रपौत्र आनंद मित्र जब काशी आए तब इन्होंने चौखंभा मोहल्ले में एक भव्य हवेली बंगाली ड्योढ़ी के नाम से बनवाई।
करीब ढाई सौ साल पहले 1773 ई में बंगाली ड्योढ़ी से ही बनारस में सबसे पहले दुर्गा पूजा की शुरूआत हुई। लेकिन भव्य रूप दिया उनके पुत्र राजा राजेंद्र मित्र ने। यहां स्थापित होने वाली देवी प्रतिमा का सिंहासन फ्रांस के कारीगरों द्वारा 18वीं सदी में बनाया गया था।
चांदी का है सिंहासन
यहां पूरा चांदी का सिंहासन है। उस समय इसमें स्थापित होने वाली मूर्ति पर सोने का पत्तर चढ़ाया जाता था। आज भी हर दुर्गोत्सव के पहले इस प्रतिमा को सुनहरे और रूपहले रंगों का टच दिया जाता है। रजत सिंहासन पर लक्ष्मी, दुर्गा, शिव, राम, गणेश, काली जी की प्रतिमाएं स्थापित की जाती हैं। बंगाली ड्योढ़ी में मां की विदाई महापाया पालकी में होती है। यह परंपरा सालों साल से चली आ रही है। जो आज भी कायम है। काफी साल तक सबसे पहले बंगाली ड्योढ़ी की प्रतिमा विसर्जित होती थी और उसके बाद ही शहर की दूसरी प्रतिमाओं का विसर्जन होता था।