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बुनकरों ने अदा की अगहनी जुमे की नमाज, खरीदा गन्ना
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पुराना पुल स्थित ईदगाह पुलकोहना में अगहनी जुमा की नमाज अदा की गई। इसके बाद गन्ना खरीदा गया। बुनकर बिरादरी ने मुर्री (लूम) बंद कर कारोबार में तरक्की के लिए अल्लाह से दुआ की कि या अल्लाह रहम कर कारोबार में बख्श तरक्की। काशी में अगहनी जुमे पर आस्था का सैलाब पुलकोहना में उमड़ा। जहां मुकद्दस इबादत की चार सौ साल परंपरा निभाई गई।
पुलकोहना के आसपास मेले जैसा माहौल रहा। बुजुर्ग इकरामुद्दीन ने बताया कि अगहनी जुमे की नमाज अकबर के जमाने से हो रही है। पार्षद हाजी वकास के अनुसार अगहन माह की नमाज कब शुरू हुई इसका कोई लिखित इतिहास नहीं मिलता है। मगर सन 1600 से यह नमाज होती आ रही है। बुजुर्गों के अनुसार बनारस में उस वक्त जबरदस्त अकाल पड़ा था। सारे किसान और कारोबारी परेशान थे। इसे देखते हुए उस समय अगहनी जुमा पढ़ी गई। इसके बाद चारों तरफ खुशहाली फैल गई। तभी से यह परंपरा चली आ रही है। यहां पूरे पूर्वांचल से लोग नमाज अदा करने और किसान गन्ना बेचने आते हैं। इरफान अहमद ने कहा कि आज हमारे लूम (मुर्री) बंद रखते हैं। सभी नमाज पढ़ते हैं। बाईसी के सरदार और सभी महतो देश की मौजूदा हालात पर चर्चा करते हैं।
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पुलकोहना के आसपास मेले जैसा माहौल रहा। बुजुर्ग इकरामुद्दीन ने बताया कि अगहनी जुमे की नमाज अकबर के जमाने से हो रही है। पार्षद हाजी वकास के अनुसार अगहन माह की नमाज कब शुरू हुई इसका कोई लिखित इतिहास नहीं मिलता है। मगर सन 1600 से यह नमाज होती आ रही है। बुजुर्गों के अनुसार बनारस में उस वक्त जबरदस्त अकाल पड़ा था। सारे किसान और कारोबारी परेशान थे। इसे देखते हुए उस समय अगहनी जुमा पढ़ी गई। इसके बाद चारों तरफ खुशहाली फैल गई। तभी से यह परंपरा चली आ रही है। यहां पूरे पूर्वांचल से लोग नमाज अदा करने और किसान गन्ना बेचने आते हैं। इरफान अहमद ने कहा कि आज हमारे लूम (मुर्री) बंद रखते हैं। सभी नमाज पढ़ते हैं। बाईसी के सरदार और सभी महतो देश की मौजूदा हालात पर चर्चा करते हैं।
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