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Varanasi News: काशी में निभाई जाएगी पुरी पीठ की परंपरा, प्रभु को लगेगा रसगुल्ले और खाजा का भोग; होगी डोली पूजा

Fri, 10 Jul 2026 12:14 AM IST
Aman Vishwakarma अमर उजाला नेटवर्क, वाराणसी।
अमर उजाला नेटवर्क, वाराणसी। Published by: Aman Vishwakarma Updated Fri, 10 Jul 2026 12:14 AM IST
सार

Rathyatra Mela Varanasi: रथयात्रा मेले में काशी में पुरी पीठ की परंपरा निभाई जाएगी। मेले के पहले और अंतिम दिन प्रभु को रसगुल्ले, खाजा सहित पारंपरिक राग-भोग अर्पित किया जाएगा। पीठ के प्रतिनिधि डोली की विधिवत पूजा करेंगे। धार्मिक परंपराओं के अनुरूप शुभारंभ और समापन की तैयारियां पूरी कर ली गई हैं।

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Varanasi tradition Puri Peeth observed in Kashi Rasgullas and Khaja offered deity Doli worshipped
रथयात्रा मेले में लगी भक्तों की भीड़। (सांकेतिक तस्वीर) - फोटो : अमर उजाला

विस्तार

Varanasi News: भगवान जगन्नाथ के रथयात्रा उत्सव में पहली बार पुरी शंकराचार्य पीठ की परंपरा निभाई जाएगी। पीठ की ओर से इस बार राग-भोग लगेगा। रसगुल्ले और खाजा का भोग लगेगा। भोग ग्रहण करने के बाद अस्सी स्थित जगन्नाथ मंदिर से भगवान डोली पर निकलेंगे और काशीवासियों को दर्शन देंगे। 

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रथयात्रा मेले के समापन के बाद इसी पीठ का भोग ग्रहण कर वापस मंदिर में प्रवेश करेंगे। डोली की पूजा और सफाई भी परंपरा का निर्वाह किया जाएगा। तीन दिवसीय रथयात्रा मेला 16 जुलाई से शुरू होगा।
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ओडिशा के पुरी में स्थापित भगवान जगन्नाथ की कई परंपराएं काशी में प्रतीकात्मक रूप से निभाई जाती हैं। पुरी में निभाई जाने वाली एक खास परंपरा है पुरी पीठ के भगवान को लगाए जाने वाला राग-भोग। ये परंपरा पुरी पीठ के शंकराचार्य ने शुरू की थी। 

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पहली बार अस्सी स्थित जगन्नाथ मंदिर के पास स्थित पुरी पीठ की शाखा पूर्वाम्नाय श्री दक्षिणामूर्ति मठ में निभाई जाएगी। मठ के प्रधान दंडी संन्यासी स्वामी वनवैभवारण्य सरस्वती ने बताया कि राग-भोग की परंपरा काशी में कायम करने की ट्रस्ट श्री जगन्नाथ जी से अनुमति मांगी गई थी। इसकी स्वीकृति मिल गई है।

वहां की परंपरा के अनुसार भगवान की डोली यात्रा निकलने से पहले उन्हें रसगुल्ले और खाजा का भोग लगाया जाएगा। वहीं, रथयात्रा के अंतिम दिन 18 जुलाई को रथारूढ़ भगवान की वापसी के दिन (19 जुलाई को भोर में) भगवान रसगुल्ले का भोग ग्रहण करेंगे। इसके बाद अस्सी स्थित मंदिर में प्रवेश करेंगे। 

स्वामी वनवैभवारण्य सरस्वती ने बताया कि भगवान की डोली यात्रा के पूर्व पुरी की परंपरा के अनुसार रथ की शंकराचार्य पूजा करते हैं। यहां मठ की ओर से पूजा कराई जाएगी। प्रभु के डोली में बैठने के पहले डोली की सफाई कर गंगाजल का छिड़काव किया जाएगा।

ट्रस्ट के सचिव शैलेष त्रिपाठी ने बताया कि पुरी पीठ के शंकराचार्य जगद्गुरु स्वामी निश्चलानंद सरस्वती ने अप्रैल में 10 दिनों तक काशी प्रवास किया था। पूर्वाम्नाय श्री दक्षिणामूर्ति मठ में उनकी अगुवाई में मठ में दक्षिणामूर्ति मंदिर के जीर्णोद्धार के अनुष्ठान हुए थे।

14 को परवल से बने जूस का भगवान को लगेगा भोग
मंदिर के पुजारी पं. राधेश्याम पांडेय ने बताया कि भगवान के 14 दिनों तक अज्ञातवास के बाद 14 जुलाई को परवल से बनी हर तरह की सामग्री का भगवान को भोग लगाया जाएगा। परवल के जूस का भी भोग लगेगा। इसके बाद वह दर्शन देंगे। 15 जुलाई को पूड़ी, सब्जी, मिष्ठान आदि का भोग लगेगा। डोली यात्रा के रथयात्रा पहुंचने के बाद प्रमुख रूप से पेड़े का भोग लगेगा। रथयात्रा मेले के दौरान तीन दिन अलग-अलग तरह की सब्जी-पूड़ी, नानखटाई आदि का भोग लगेगा। अंतिम दिन कटहल की सब्जी का भोग लगता है।

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