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होटल खाली, टूरिस्ट ट्रांसपोर्टर बेचने लगे गाड़ी
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कोरोना काल में पर्यटन उद्योग बदहाल है। सितंबर-अक्तूबर माह में होटल खाली हैं। टूरिस्ट ट्रांसपोर्टरों का हाल यह है कि अब रोड टैक्स भरना पहाड़ सरीखा लग रहा है। औने-पौने दाम में गाड़ी बेचने की जुगत में लग गए हैं। टूरिस्ट गाइडों पर ऐसी मार पड़ी कि दूसरे काम-धाम में लग गए। 6 महीने से बुकिंग न मिलने के कारण टूर एंड ट्रैवेल एजेंट अपने खर्चे कम करने को लेकर स्टाफ की संख्या में कटौती कर रहे हैं। पर्यटन उद्यमियों के अनुसार कोरोना काल में लगभग 3000 करोड़ का झटका लगा है।
शहर में 50 बड़े होटल, 1000 मध्यम-छोटे होटल, 600 गेस्ट हाउस और अनगिनत होम स्टे भी हैं। छावनी सहित शहर के विभिन्न क्षेत्रों के होटल में पर्यटकों से भरे रहते थे। हर माह 10 से 15 विदेशी तो 30 से 40 की संख्या में दक्षिण भारतीय पर्यटकों की बुकिंग एक होटल में रहती थी। कई गेस्ट हाउस तो महीने भर तक दक्षिण भारतीयों से फुल रहते थे। अब सब खाली चल रहे हैं। घाट किनारे होटलों में पीक सीजन में मुंहमांगी कीमत देकर पर्यटक ठहरते थे। अब 5 से 10 प्रतिशत ही कारोबार रह गया है।
पर्यटन कारोबारियों के अनुसार जब तक इंटरनेशनल विमान और रेलवे सेवा बहाल नहीं होगी तब तक स्थिति ऐसी ही रहेगी। शहर भ्रमण करने वाले टूरिस्टों की संख्या पिछले साल 2019 में 67 लाख, 97 हजार थी। जिसमें 3.50 लाख विदेशी और 64 लाख 47 हजार 47 हजार 775 पर्यटक शामिल थे। विदेशी पर्यटक कम से कम 10 हजार की खरीदारी वाराणसी से करते हैं और घरेलू पर्यटक 4 से 5 हजार की खरीदारी करते हैं। साड़ी, सिल्क फैब्रिक्स, पीतल व तांबे के बर्तन, गुलाबी मीनाकारी, कालीन, दरी, लकड़ी के खिलौने आदि का भी पर्यटन से सीधा जुड़ाव है।
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बड़े टूर एजेंट भी बदहाल
बड़े टूर एंड ट्रैवेल एजेंट लगभग 50 हैं। अन्य छोटे में 500 से अधिक हैं। सभी का कारोबार ठप है। पहले जहां 20-25 बुकिंग घरेलू और 5 से 7 बुकिंग इंटरनेशनल की करते थे, अब सब शून्य है। सिर्फ मेडिकल से संबंधित लोग ही सफर कर रहे हैं। इस तरह बड़ी मार इस सेक्टर पर पड़ी है। 50 लाख से एक करोड़ की सालाना टर्नओवर करने वाले एजेंट अब अपने खर्चे को लेकर चिंतित है। स्टाफ 10 से 4 कर दिए हैं। हाल यह है कि सप्ताह में जो बुकिंग होती थी, अब वह महीने में हो रही है।
टूरिस्ट ट्रांसपोर्टरों की हालत भी खस्ता
टूरिस्ट ट्रांसपोर्टरों की हालत तो बहुत दयनीय हो गई है। शहर में 600 टूरिस्ट वाहन हैं, जिनसे हजारों परिवार जुड़े हैं। 6 माह से वाहन खड़े हैं और अब तो टूरिस्ट भी नहीं आ रहे हैं। हर माह रोड टैक्स, बैंक किस्त, इंश्योरेंस, चालकों की तनख्वाह और ऊपर से परिवार संभालने में ट्रांसपोर्टर तबाह हो गया है। औने पौने दाम में वाहनों की बिक्री तक की नौबत आ गई है। इन वाहनों का इस्तेमाल विदेशी अधिक करते थे।
टूरिस्ट गाइडों पर भी कोरोना की मार
टूरिस्ट गाइडों की हालत खराब है। शहर में रजिस्टर्ड 121 गाइड हैं। जबकि बगैर रजिस्टर्ड हजारों की संख्या में है। इस समय यूरोपियन, स्पेनिश पर्यटकों से बनारस भर जाता था। लेकिन इस समय हालात एकदम खराब है। किसी तरह गाइड गुजारा कर रहे हैं। टूरिस्ट गाइड एसोसिएशन के अध्यक्ष शैलेश त्रिपाठी ने बताया कि अंतरराष्ट्रीय विमान सेवाएं नहीं शुरू होंगी तो हजारों परिवार प्रभावित होंगे। दशाश्वमेध घाट के नाविक बाबू साहनी ने बताया कि घाट किनारे के लोग तो पर्यटकों पर ही निर्भर रहते हैं। 500 से 700 नाविकों और परिवार की माली हालत बिगड़ गई है।
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शहर में 50 बड़े होटल, 1000 मध्यम-छोटे होटल, 600 गेस्ट हाउस और अनगिनत होम स्टे भी हैं। छावनी सहित शहर के विभिन्न क्षेत्रों के होटल में पर्यटकों से भरे रहते थे। हर माह 10 से 15 विदेशी तो 30 से 40 की संख्या में दक्षिण भारतीय पर्यटकों की बुकिंग एक होटल में रहती थी। कई गेस्ट हाउस तो महीने भर तक दक्षिण भारतीयों से फुल रहते थे। अब सब खाली चल रहे हैं। घाट किनारे होटलों में पीक सीजन में मुंहमांगी कीमत देकर पर्यटक ठहरते थे। अब 5 से 10 प्रतिशत ही कारोबार रह गया है।
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पर्यटन कारोबारियों के अनुसार जब तक इंटरनेशनल विमान और रेलवे सेवा बहाल नहीं होगी तब तक स्थिति ऐसी ही रहेगी। शहर भ्रमण करने वाले टूरिस्टों की संख्या पिछले साल 2019 में 67 लाख, 97 हजार थी। जिसमें 3.50 लाख विदेशी और 64 लाख 47 हजार 47 हजार 775 पर्यटक शामिल थे। विदेशी पर्यटक कम से कम 10 हजार की खरीदारी वाराणसी से करते हैं और घरेलू पर्यटक 4 से 5 हजार की खरीदारी करते हैं। साड़ी, सिल्क फैब्रिक्स, पीतल व तांबे के बर्तन, गुलाबी मीनाकारी, कालीन, दरी, लकड़ी के खिलौने आदि का भी पर्यटन से सीधा जुड़ाव है।
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बड़े टूर एजेंट भी बदहाल
बड़े टूर एंड ट्रैवेल एजेंट लगभग 50 हैं। अन्य छोटे में 500 से अधिक हैं। सभी का कारोबार ठप है। पहले जहां 20-25 बुकिंग घरेलू और 5 से 7 बुकिंग इंटरनेशनल की करते थे, अब सब शून्य है। सिर्फ मेडिकल से संबंधित लोग ही सफर कर रहे हैं। इस तरह बड़ी मार इस सेक्टर पर पड़ी है। 50 लाख से एक करोड़ की सालाना टर्नओवर करने वाले एजेंट अब अपने खर्चे को लेकर चिंतित है। स्टाफ 10 से 4 कर दिए हैं। हाल यह है कि सप्ताह में जो बुकिंग होती थी, अब वह महीने में हो रही है।
टूरिस्ट ट्रांसपोर्टरों की हालत भी खस्ता
टूरिस्ट ट्रांसपोर्टरों की हालत तो बहुत दयनीय हो गई है। शहर में 600 टूरिस्ट वाहन हैं, जिनसे हजारों परिवार जुड़े हैं। 6 माह से वाहन खड़े हैं और अब तो टूरिस्ट भी नहीं आ रहे हैं। हर माह रोड टैक्स, बैंक किस्त, इंश्योरेंस, चालकों की तनख्वाह और ऊपर से परिवार संभालने में ट्रांसपोर्टर तबाह हो गया है। औने पौने दाम में वाहनों की बिक्री तक की नौबत आ गई है। इन वाहनों का इस्तेमाल विदेशी अधिक करते थे।
टूरिस्ट गाइडों पर भी कोरोना की मार
टूरिस्ट गाइडों की हालत खराब है। शहर में रजिस्टर्ड 121 गाइड हैं। जबकि बगैर रजिस्टर्ड हजारों की संख्या में है। इस समय यूरोपियन, स्पेनिश पर्यटकों से बनारस भर जाता था। लेकिन इस समय हालात एकदम खराब है। किसी तरह गाइड गुजारा कर रहे हैं। टूरिस्ट गाइड एसोसिएशन के अध्यक्ष शैलेश त्रिपाठी ने बताया कि अंतरराष्ट्रीय विमान सेवाएं नहीं शुरू होंगी तो हजारों परिवार प्रभावित होंगे। दशाश्वमेध घाट के नाविक बाबू साहनी ने बताया कि घाट किनारे के लोग तो पर्यटकों पर ही निर्भर रहते हैं। 500 से 700 नाविकों और परिवार की माली हालत बिगड़ गई है।