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वाराणसी: गंगा के एक लीटर पानी में सात माइक्रोप्लास्टिक कण, सरायमोहाना सबसे ज्यादा प्रदूषित; चिंताजनक रिपोर्ट

Fri, 30 Oct 2026 11:19 AM IST
Aman Vishwakarma हिमांशु अस्थाना, अमर उजाला नेटवर्क, वाराणसी।
हिमांशु अस्थाना, अमर उजाला नेटवर्क, वाराणसी। Published by: Aman Vishwakarma Updated Fri, 30 Oct 2026 11:19 AM IST
सार

गंगा के पानी में माइक्रोप्लास्टिक कणों की मौजूदगी सामने आई है। एक लीटर पानी में औसतन सात माइक्रोप्लास्टिक कण मिले हैं। सरायमोहाना सबसे ज्यादा प्रदूषित मिला। दशाश्वमेध घाट के पास एक लीटर पानी में चार से पांच, जबकि मार्कंडेय महादेव घाट के पास दो से तीन माइक्रोप्लास्टिक कण पाए गए। इससे गंगा के प्रदूषण को लेकर चिंता बढ़ी है।

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Varanasi Seven microplastic particles found one litre Ganga water Saraymohana most polluted area concerning
माइक्रोप्लास्टिक का खतरा। - फोटो : अमर उजाला डिजिटल्

विस्तार

काशी में गंगा के पानी में माइक्रोप्लास्टिक प्रदूषण की मौजूदगी सामने आई है। घाटों से लिए गए पानी के नमूनों की जांच में सरायमोहना घाट पर एक लीटर पानी में माइक्रोप्लास्टिक के सात कण मिले हैं। दशाश्वमेध घाट पर इनकी संख्या चार से पांच कण प्रति लीटर दर्ज की गई। 

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वहीं, शूलटंकेश्वर महादेव घाट पर सबसे कम 0.5 से एक कण प्रति लीटर मिला। जांच के अनुसार, काशी में गंगा के पानी में औसतन 1.5 से 2.5 माइक्रोप्लास्टिक कण प्रति लीटर मौजूद हैं। मार्कंडेय महादेव घाट के पास इनकी संख्या दो से तीन कण प्रति लीटर पाई गई है। 
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माइक्रोप्लास्टिक के बढ़ते खतरे को देखते हुए गंगा में इसकी निगरानी के लिए राष्ट्रीय स्तर पर पहल हुई है। भारत सरकार की ओर से पिछले महीने पांच मिलीमीटर तक के माइक्रोप्लास्टिक प्रदूषण की निगरानी के लिए नया प्रोटोकॉल जारी किया गया था। 

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इसके बाद बृहस्पतिवार को नई दिल्ली स्थित राष्ट्रीय स्वच्छ गंगा मिशन (एनएमसीजी) के कार्यालय में निगरानी टीम की पहली बैठक हाइब्रिड मोड में हुई। इसमें गंगा में माइक्रोप्लास्टिक के स्रोत, उसकी मात्रा और जलीय पारिस्थितिकी तंत्र पर पड़ने वाले प्रभावों का आकलन करने पर चर्चा हुई। इस पहल में बीएचयू, आईआईटी रुड़की समेत आठ संस्थानों के वैज्ञानिक शामिल हैं।

बीएचयू के पर्यावरणविद डॉ. कृपा राम ने काशी में गंगा के पानी में माइक्रोप्लास्टिक की मौजूदगी पर रिपोर्ट तैयार की है। उनके अनुसार, सरायमोहना घाट पर सबसे ज्यादा सात कण प्रति लीटर मिले। दशाश्वमेध घाट पर चार से पांच, मार्कंडेय महादेव घाट पर दो से तीन और गड़वाघाट पर एक से 1.8 कण प्रति लीटर दर्ज किए गए। शूलटंकेश्वर महादेव घाट पर इनकी संख्या सबसे कम रही।

हॉटस्पॉट और प्रदूषण के स्रोतों की होगी पहचान
डॉ. कृपा राम ने बताया कि पांच मिलीमीटर से छोटे प्लास्टिक कणों को माइक्रोप्लास्टिक कहा जाता है। गंगा में इनकी मौजूदगी और इनके स्रोतों की पहचान करना जरूरी है। निगरानी अभियान के तहत प्रदूषण के हॉटस्पॉट, माइक्रोप्लास्टिक के बहाव के रास्तों और इसके संभावित प्रभावों का पता लगाया जाएगा। इसके लिए गंगा में माइक्रोप्लास्टिक की नियमित निगरानी का तंत्र विकसित किया जाएगा, ताकि प्रदूषण को नियंत्रित करने के लिए प्रभावी कदम उठाए जा सकें।

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